उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की रणनीति में अंतर नजर आ रहा है। कांग्रेस जहां जल्द से जल्द सीटों के बंटवारे को तय करने के पक्ष में है, वहीं सपा अभी जमीनी स्थिति का आकलन करने के लिए और समय लेना चाहती है।
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत अभी किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंची है। दोनों दल गठबंधन को मजबूत बनाए रखने के साथ-साथ अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति को भी मजबूत करना चाहते हैं। ऐसे में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला दोनों पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
सपा का जोर जहां उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर है, वहीं कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को आधार बनाकर ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। दोनों दलों ने चुनाव से पहले अपने स्तर पर आंतरिक सर्वे भी कराए हैं। इन सर्वे के नतीजों ने सीट बंटवारे की बातचीत को और पेचीदा बना दिया है।
कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर नजर बनाए हुए
कांग्रेस के आंतरिक आकलन में उत्तर प्रदेश की 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों को पार्टी के लिए मजबूत या जीतने योग्य माना गया है। इसी आधार पर कांग्रेस सीट शेयरिंग में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की एक प्रमुख रणनीति यह भी बताई जा रही है कि वह प्रदेश के लगभग हर जिले में कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़ना चाहती है, ताकि संगठन की मौजूदगी पूरे राज्य में दिखाई दे।
कांग्रेस का तर्क 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके प्रदर्शन से भी जुड़ा है। पार्टी का मानना है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन को विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक ताकत में बदला जा सकता है। इसी वजह से कांग्रेस अब गठबंधन में पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली भूमिका चाहती है।
सपा 111 जीती सीटों पर समझौता नहीं करना चाहती
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी अपनी जीती हुई विधानसभा सीटों को लेकर बेहद सतर्क नजर आ रही है। पार्टी का रुख है कि 2022 में जीती गई 111 सीटों पर सपा खुद चुनाव लड़ेगी। इन सीटों पर मौजूदा विधायकों को दोबारा मैदान में उतारने की तैयारी भी की जा रही है। सपा की रणनीति में स्थानीय जातीय समीकरण और उम्मीदवार की जीतने की क्षमता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी चाहती है कि सीट और संभावित उम्मीदवार का नाम पहले से स्पष्ट हो, ताकि गठबंधन में सीट तय करते समय स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखा जा सके।
सपा के भीतर यह भी माना जा रहा है कि कांग्रेस के साथ मिलकर उन नेताओं के खिलाफ रणनीति बनाई जा सकती है, जिन्होंने पार्टी छोड़कर दूसरे राजनीतिक विकल्पों का रुख किया है। ऐसे उम्मीदवारों को हराने के लिए दोनों दलों के संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया जा सकता है।

कांग्रेस को 75 से 80 सीटें देने का फॉर्मूला
सीटों के बंटवारे को लेकर सपा की ओर से कांग्रेस के लिए करीब 75 से 80 सीटों का विकल्प सामने आने की चर्चा है। इससे पहले सपा कांग्रेस को 2022 के विधानसभा चुनाव में अपने अन्य सहयोगियों को दी गई सीटों के आसपास ही हिस्सेदारी देने की तैयारी में थी, जो 60 से कम थी। बदले राजनीतिक हालात में कांग्रेस के लिए सीटों की संख्या बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।
हालांकि, दोनों दलों के बीच अंतिम समझौता उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों और प्रत्येक सीट पर जीत की संभावनाओं के आकलन के बाद ही होने की संभावना है।
2024 का PDA समीकरण दोहराना सबसे बड़ी चुनौती
सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा चुनाव में किस तरह दोहराया जाए। दोनों दलों ने पिछली सफलता में PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था। हालांकि, विधानसभा चुनाव का राजनीतिक माहौल लोकसभा चुनाव से अलग हो सकता है।
मतदाताओं की प्राथमिकताएं और राजनीतिक मुद्दे समय के साथ बदलते हैं। गठबंधन के सामने युवा मतदाताओं, महिलाओं और पहली बार राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय हो रही नई पीढ़ी तक पहुंच बनाने की चुनौती भी है।
युवा वोटरों पर दोनों दलों की नजर
कांग्रेस नेता राहुल गांधी युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। दूसरी ओर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी युवाओं और महिला मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में यूपी चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ दोनों दलों को सीट बंटवारे पर ऐसा समझौता करना होगा, जिससे गठबंधन में असंतोष न बढ़े, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपने-अपने मजबूत क्षेत्रों और सामाजिक आधार को भी सुरक्षित रखना होगा।











