ब्रिक्स सम्मेलन के समापन के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सम्मेलन में बनी सहमतियां विकसित भारत 2047 की जरूरतों को कितना पूरा कर पाएंगी।
नई दिल्ली: BRICS Summit को भारत की आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति के लिहाज से अहम पड़ाव माना जा रहा है। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच वैश्विक आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, सीमा पार भुगतान और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार जैसे मुद्दों पर सहमति बनी। अब चुनौती इन घोषणाओं को वास्तविक आर्थिक अवसरों में बदलने की है।
विशेषज्ञों के अनुसार, BRICS के मंच पर बनी सहमतियां तभी विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में प्रभावी योगदान दे पाएंगी, जब उनका असर निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार के स्तर पर दिखाई दे।
BRICS देशों को भारत के लिए बड़ा बाजार बनाने की चुनौती
भारत के सामने BRICS की आर्थिक क्षमता का इस्तेमाल अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए करना बड़ी प्राथमिकता होगी। चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ा है, लेकिन व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 155.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जबकि भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक रहा।
यह स्थिति बताती है कि केवल व्यापार बढ़ना पर्याप्त नहीं है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि BRICS देशों के साथ व्यापार में भारतीय उत्पादों की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़े। इंजीनियरिंग उत्पाद, दवाइयां, ऑटो कंपोनेंट, कृषि उत्पाद और डिजिटल सेवाएं ऐसे क्षेत्र हैं, जहां भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत कर सकती हैं।
स्थानीय मुद्रा में कारोबार से घट सकती है डॉलर पर निर्भरता
BRICS में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और सीमा पार भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है। इससे सदस्य देशों के बीच व्यापार में डॉलर पर निर्भरता कम करने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, फिलहाल इसे अमेरिकी डॉलर के पूर्ण विकल्प के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। स्थानीय मुद्रा में व्यापार का विस्तार तभी प्रभावी होगा, जब भुगतान प्रणाली आसान, सुरक्षित और व्यापक स्तर पर स्वीकार्य बने। इससे भारतीय कारोबारियों के लिए कुछ मुद्रा जोखिम कम हो सकते हैं और सीमा पार लेनदेन को अधिक सुविधाजनक बनाया जा सकता है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका भी महत्वपूर्ण

BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक के जरिए बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग बढ़ाने की संभावना भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यदि इस माध्यम से भारत में सड़क, ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य विकास परियोजनाओं को प्रतिस्पर्धी दरों पर वित्त मिल पाता है, तो पूंजी की लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इसके लिए घोषणाओं को तेजी से परियोजनाओं में बदलना जरूरी होगा। निवेश की वास्तविक राशि, परियोजनाओं की गति और उनके आर्थिक परिणाम ही इस पहल की सफलता तय करेंगे।
ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों पर बढ़ेगा फोकस
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए ऊर्जा सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता बेहद अहम है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा और आधुनिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के विस्तार के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति भारत की रणनीतिक जरूरत है। BRICS देशों के साथ सहयोग भारत को इन क्षेत्रों में वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत और निवेश के अवसर दे सकता है। इसी तरह ऊर्जा सहयोग से वैश्विक बाजार में कीमतों और आपूर्ति में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
जयशंकर ने बताई सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने BRICS Summit को सफल बताते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अलग-अलग मत रखने वाले देशों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं था। उन्होंने पश्चिम एशिया के तनाव को सम्मेलन के दौरान सबसे जटिल मुद्दों में से एक बताया। जयशंकर के अनुसार, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के अलग-अलग दृष्टिकोण के बावजूद भारत की कूटनीतिक कोशिशों से सदस्य देशों के बीच साझा रुख बनाने में सफलता मिली।
सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। इसमें शांति, सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और आम नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया।












