अमेरिका के केंद्रीय बैंक Federal Reserve ने लगातार पांचवीं मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला किया है। 29 जुलाई को समाप्त हुई बैठक के बाद फेडरल रिजर्व ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर को 3.50% से 3.75% के दायरे में बरकरार रखा।
बिजनेस न्यूज़: अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) ने अपनी नवीनतम मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखने का फैसला किया है। लगातार पांचवीं बैठक में फेड ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर को 3.50% से 3.75% के दायरे में बरकरार रखा है। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
फेडरल रिजर्व का यह कदम केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर दुनिया भर के वित्तीय बाजारों, निवेश प्रवाह और उभरती अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से भारत, पर भी पड़ सकता है।
महंगाई पर फेड की सतर्क नजर
फेडरल रिजर्व ने स्पष्ट किया है कि वह महंगाई को अपने दीर्घकालिक 2% लक्ष्य तक लाने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि हाल के महीनों में मुद्रास्फीति में कुछ नरमी देखने को मिली है, लेकिन केंद्रीय बैंक अभी भी सतर्क रुख अपनाए हुए है। अमेरिका में वार्षिक महंगाई दर लगभग 3.5% के आसपास बनी हुई है, जो फेड के लक्ष्य से काफी ऊपर है। नीति निर्माताओं का मानना है कि जल्दबाजी में ब्याज दरों में कटौती करने से महंगाई फिर से बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि भी फेड के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। ऊर्जा लागत बढ़ने से परिवहन और उत्पादन खर्च बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर उपभोक्ता कीमतों पर पड़ता है।
फेड के भीतर भी दिखी राय में भिन्नता
बैठक के दौरान फेडरल रिजर्व के कुछ सदस्यों ने ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की कटौती का समर्थन किया। उनका तर्क था कि लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं और निवेश पर दबाव डाल सकती हैं। हालांकि, बहुमत ने मौजूदा परिस्थितियों में दरों को स्थिर रखना अधिक उचित माना।
नीति निर्माताओं का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच किसी भी जल्दबाजी वाले फैसले से आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। यह निर्णय दर्शाता है कि फेड फिलहाल विकास और महंगाई नियंत्रण के बीच संतुलन बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए क्या संकेत?
ब्याज दरों को स्थिर रखने का निर्णय वैश्विक निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। जब अमेरिका में दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक अधिक रिटर्न की तलाश में उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं। लेकिन दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं होने से वैश्विक पूंजी प्रवाह अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है। इससे एशिया और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शेयर बाजारों को समर्थन मिलने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फेड का यह रुख निवेशकों को यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक अभी आर्थिक वृद्धि को नुकसान पहुंचाने वाले आक्रामक कदम उठाने के पक्ष में नहीं है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
फेडरल रिजर्व का फैसला भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी ब्याज दरें बढ़तीं, तो भारतीय बाजारों से विदेशी निवेश निकलने का जोखिम बढ़ सकता था। दरों को स्थिर रखने से भारतीय शेयर बाजारों में स्थिरता बनी रहने की संभावना है। इसके अलावा, भारतीय रुपया भी दबाव से बच सकता है। आमतौर पर अमेरिकी ब्याज दरों में वृद्धि होने पर डॉलर मजबूत होता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। मौजूदा निर्णय से रुपये को अपेक्षाकृत स्थिर रहने में मदद मिल सकती है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए भी यह राहत की बात हो सकती है। यदि अमेरिका में दरें तेजी से बढ़तीं, तो RBI पर भी महंगाई और पूंजी प्रवाह को संतुलित करने के लिए सख्त मौद्रिक नीति अपनाने का दबाव बढ़ सकता था।











