उत्तर दा पुत्तर रिव्यू: अंधविश्वास और विज्ञान के बीच उलझी जिंदगी की मनोरंजक कहानी

उत्तर दा पुत्तर मूवी रिव्यू पढ़ें। अन्नू कपूर और पवन मल्होत्रा की यह फैमिली कॉमेडी अंधविश्वास बनाम विज्ञान की दिलचस्प कहानी को मनोरंजक अंदाज में पेश करती है।

अन्नू कपूर स्टारर 'उत्तर दा पुत्तर' एक फैमिली कॉमेडी-ड्रामा है, जो अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच के बीच संघर्ष को मनोरंजक अंदाज में दिखाती है। दमदार अभिनय, हल्का हास्य और सकारात्मक संदेश के साथ फिल्म दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करती है।

मूवी रिव्यु: अन्नू कपूर की वापसी वाली फिल्म 'उत्तर दा पुत्तर' एक ऐसी फैमिली कॉमेडी-ड्रामा है, जो मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश देने की कोशिश करती है। निर्देशक रविंदर सिवाच की यह फिल्म अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच के बीच चलने वाले संघर्ष को हास्य, भावनाओं और पारिवारिक रिश्तों के माध्यम से प्रस्तुत करती है। कहानी का केंद्र एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर पर है, जो छात्रों को तर्क और विज्ञान पढ़ाता है, लेकिन अपनी निजी जिंदगी में हर फैसला वास्तु, शकुन-अपशकुन और टोने-टोटकों के आधार पर लेता है। यही विरोधाभास फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है।

कहानी: विज्ञान पढ़ाने वाला प्रोफेसर क्यों करता है अंधविश्वास पर भरोसा?

फिल्म की शुरुआत प्रोफेसर साई राम टुटेजा के किरदार से होती है, जिन्हें अन्नू कपूर ने निभाया है। प्रोफेसर टुटेजा का विश्वास है कि जीवन की हर समस्या का समाधान सही दिशा, वास्तु और शुभ संकेतों में छिपा है। वह अपने परिवार के लिए ऐसा घर तलाशते हैं, जो उनके अनुसार पूरी तरह वास्तु के नियमों पर खरा उतरता हो। हालांकि, नए घर में प्रवेश के तुरंत बाद एक अप्रत्याशित घटना सब कुछ बदल देती है। एक पुराना सीलिंग फैन गिरने से उनके ससुर और साले घायल हो जाते हैं। 

यह घटना परिवार के भीतर तनाव पैदा करती है और उनकी पत्नी गिन्नी, जो लगातार उनके अंधविश्वास से परेशान रहती है, घर छोड़ने का फैसला कर लेती है। इसके बाद प्रोफेसर टुटेजा अपनी बिखरी हुई जिंदगी को दोबारा संवारने और पत्नी को वापस लाने की कोशिश में निकल पड़ते हैं। इस सफर में कई दिलचस्प किरदार उनकी जिंदगी में आते हैं, जिनकी मौजूदगी फिल्म में हास्य और नए मोड़ जोड़ती है।

अभिनय: अनुभवी कलाकारों ने संभाली पूरी फिल्म

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी स्टार कास्ट है। अन्नू कपूर ने प्रोफेसर टुटेजा के किरदार को बेहद सहजता और विश्वसनीयता के साथ निभाया है। उनकी कॉमिक टाइमिंग, संवाद अदायगी और भावनात्मक दृश्यों में संतुलन फिल्म को मजबूती देता है। कई दृश्यों में उनका अभिनय फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता है। पवन मल्होत्रा अपने किरदार में प्रभावशाली नजर आते हैं। 

उनका हास्य स्वाभाविक लगता है और अन्नू कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री कई दृश्यों को यादगार बनाती है। रुखसार रहमान ने प्रोफेसर की पत्नी गिन्नी के रूप में संयमित अभिनय किया है। वहीं बृजेंद्र काला, इश्तियाक खान, नितिन अरोड़ा, जीवेशु अहलूवालिया, राजेंद्र सेठी और सुमित गुलाटी ने अपने-अपने किरदारों में अच्छी मौजूदगी दर्ज कराई है।

निर्देशन और लेखन: मनोरंजन के साथ संदेश देने की कोशिश

निर्देशक रविंदर सिवाच की यह पहली फीचर फिल्म है, लेकिन निर्देशन में आत्मविश्वास दिखाई देता है। फिल्म अपनी मुख्य कहानी पर केंद्रित रहती है और अनावश्यक भटकाव से बचती है। लेखक संदीप कपूर ने दिल्ली के मध्यमवर्गीय परिवारों की जीवनशैली, स्थानीय बोली और सामाजिक सोच को कहानी में सहज रूप से शामिल किया है। विज्ञान पढ़ाने वाले व्यक्ति का अंधविश्वास में डूबा होना एक दिलचस्प विचार है, जिसे मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म उपदेश देने के बजाय घटनाओं और हास्य के जरिए अपना संदेश पहुंचाती है।

तकनीकी पक्ष: दिल्ली का माहौल स्क्रीन पर जीवंत

सिनेमैटोग्राफी फिल्म की जरूरत के अनुरूप है। दिल्ली की गलियां, कोचिंग सेंटर और आम परिवारों का परिवेश वास्तविकता के करीब महसूस होता है। कैमरा वर्क और फ्रेमिंग कहानी के साथ सहज रूप से आगे बढ़ते हैं। एडिटिंग भी संतुलित है, जिससे फिल्म की गति बनी रहती है। कॉमिक दृश्यों की टाइमिंग अच्छी है और बैकग्राउंड स्कोर हास्य के प्रभाव को बढ़ाता है। संगीत कहानी पर हावी नहीं होता बल्कि उसे आगे बढ़ाने में मदद करता है।

फिल्म की खूबियां

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अनोखा विषय है। अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच के बीच संघर्ष को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाया गया है। पारिवारिक मनोरंजन, साफ-सुथरी कॉमेडी और अनुभवी कलाकारों का अभिनय इसे हर उम्र के दर्शकों के लिए उपयुक्त बनाता है। फिल्म रिश्तों, विश्वास और तर्क के बीच संतुलन बनाने का संदेश भी देती है, जो इसे सामान्य कॉमेडी फिल्मों से अलग बनाता है।

कहां रह जाती है कमजोर?

पहले हाफ की तुलना में दूसरा भाग थोड़ा अनुमानित महसूस होता है। कुछ घटनाएं पहले से समझ में आने लगती हैं। इसके अलावा कुछ हास्य दृश्य जरूरत से ज्यादा बढ़े हुए लग सकते हैं, जो हर दर्शक की पसंद के अनुरूप नहीं होंगे। हालांकि ये कमियां फिल्म के समग्र मनोरंजन पर बहुत बड़ा असर नहीं डालतीं।

क्या देखनी चाहिए यह फिल्म?

यदि आप ऐसी फैमिली फिल्म देखना चाहते हैं जिसमें हल्की-फुल्की कॉमेडी, भावनात्मक पल और एक सकारात्मक सामाजिक संदेश हो, तो 'उत्तर दा पुत्तर' एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। यह फिल्म मनोरंजन के साथ यह सवाल भी उठाती है कि इंसान की सफलता उसकी मेहनत तय करती है या फिर भाग्य और अंधविश्वास।दमदार अभिनय, संतुलित निर्देशन और पारिवारिक माहौल के कारण यह फिल्म एक सहज और मनोरंजक सिनेमाई अनुभव देती है। 

जो दर्शक साफ-सुथरी फैमिली एंटरटेनर पसंद करते हैं, उन्हें यह फिल्म निराश नहीं करेगी। अन्नू कपूर स्टारर 'उत्तर दा पुत्तर' एक फैमिली कॉमेडी-ड्रामा है, जो अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच के बीच संघर्ष को मनोरंजक अंदाज में दिखाती है। दमदार अभिनय, हल्का हास्य और सकारात्मक संदेश के साथ फिल्म दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करती है।

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