अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोध में उत्तराखंड के पर्यावरण में बड़े बदलाव सामने आए हैं। 1992 से 2022 के बीच बर्फीला क्षेत्र 1,640.82 वर्ग किमी घटा, जबकि निर्मित क्षेत्र बढ़कर 526.35 वर्ग किमी हो गया।
देहरादून: उत्तराखंड में पिछले तीन दशकों के दौरान बर्फीले क्षेत्र में बड़ी कमी दर्ज की गई है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार 1992 से 2022 के बीच बर्फ से ढका क्षेत्र 1,640.82 वर्ग किलोमीटर घटा, जबकि इसी अवधि में निर्मित क्षेत्र करीब 13 गुना बढ़ गया। अध्ययन में बदलते हिम आवरण को भविष्य के जल संकट से भी जोड़ा गया है।
तीन दशक में सिमटा बर्फ का दायरा
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों, जलवायु आंकड़ों और GIS तकनीक की मदद से उत्तराखंड में भूमि आवरण में हुए बदलाव का अध्ययन किया। इसके लिए 1992, 2002, 2012 और 2022 के आंकड़ों की तुलना की गई।
अध्ययन में पाया गया कि 1992 में राज्य का करीब 14,951.98 वर्ग किलोमीटर हिस्सा बर्फ से ढका था। 2012 तक यह क्षेत्र घटकर 8,864.64 वर्ग किलोमीटर रह गया। 2022 में बर्फीले क्षेत्र का आंकड़ा 13,311.16 वर्ग किलोमीटर रहा। यानी तीन दशक में 1,640.82 वर्ग किलोमीटर बर्फ का क्षेत्र कम हुआ।

शोधकर्ताओं के अनुसार ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ के आवरण में बदलाव का असर प्राकृतिक जलचक्र पर पड़ सकता है। हिम क्षेत्र में कमी का प्रभाव नदियों के प्रवाह और निचले इलाकों में पानी की उपलब्धता पर पड़ने की आशंका है।
कंक्रीट का विस्तार करीब 13 गुना बढ़ा
उत्तराखंड में जहां बर्फीले क्षेत्र में कमी दर्ज हुई, वहीं मानवीय निर्माण का दायरा तेजी से बढ़ा। 1992 में राज्य का निर्मित क्षेत्र केवल 40.66 वर्ग किलोमीटर था, जो 2022 में बढ़कर 526.35 वर्ग किलोमीटर हो गया।
इस तरह तीन दशकों में निर्मित क्षेत्र में करीब 13 गुना वृद्धि हुई। सड़कों, मकानों और व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार ने प्राकृतिक जमीन पर दबाव बढ़ाया है।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान खुले क्षेत्र में भी वृद्धि हुई। खुली भूमि 1992 में 7,078.02 वर्ग किलोमीटर थी, जो 2022 में बढ़कर 8,749.27 वर्ग किलोमीटर हो गई।
वनस्पति क्षेत्र में कमी, जल क्षेत्र बढ़ा
अध्ययन में वन क्षेत्र के आंकड़ों में बड़ा बदलाव नहीं दिखा। 1992 में वन क्षेत्र 28,493.05 वर्ग किलोमीटर था, जबकि 2022 में यह 28,535.37 वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया।
इसके विपरीत वनस्पति क्षेत्र में कमी आई। 1992 में यह 2,710.77 वर्ग किलोमीटर था, जो 2022 में घटकर 2,126.53 वर्ग किलोमीटर रह गया।
इसी अवधि में जल क्षेत्र 208.52 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 234.32 वर्ग किलोमीटर दर्ज हुआ। शोध में सामने आए ये आंकड़े उत्तराखंड में प्राकृतिक आवरण और मानव निर्मित क्षेत्र के बीच बदलते संतुलन की तस्वीर पेश करते हैं।
हिम आवरण में बदलाव भविष्य के जल संकट का संकेत
उत्तराखंड के लिए बर्फ का आवरण केवल पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता से जुड़ा विषय नहीं है। हिम क्षेत्र में होने वाले बदलाव का सीधा संबंध जल संसाधनों से माना जाता है। बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी पहाड़ी नदियों और निचले क्षेत्रों की जल उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऐसे में लंबे समय तक बर्फीले क्षेत्र में कमी जारी रहने पर जलचक्र, नदी प्रवाह और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर बढ़ते निर्माण से पहाड़ी पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है। अध्ययन के आंकड़े उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित करते हैं।











