कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य किए जाने की चर्चा पर व्यावहारिक सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को गाने में करीब 52 सेकंड लगते हैं, जबकि ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का है।
Vande Mataram Controversy: राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य किए जाने की चर्चा के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसके व्यावहारिक पक्ष पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे लोगों में असहजता पैदा हो या इसका उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाए।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य रूप से गाने के प्रस्ताव को लेकर अपनी चिंता सोशल मीडिया के जरिए जाहिर की। थरूर का कहना है कि दोनों गीतों के पूरे संस्करण को सरकारी कार्यक्रमों में शामिल करने से कार्यक्रमों की अवधि बढ़ सकती है और लोगों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना व्यावहारिक चुनौती बन सकता है।
वंदे मातरम् को लेकर क्या है नया विवाद?
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ लंबे समय से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत को लेकर हाल के दिनों में राजनीतिक और सार्वजनिक बहस तेज हुई है। सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रगीत की भूमिका को लेकर नए नियमों और प्रस्तावों के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। स्वतंत्रता दिवस 2026 के समारोह को लेकर भी ‘वंदे मातरम्’ को विशेष महत्व दिए जाने की बात सामने आई है।
इसी पृष्ठभूमि में थरूर ने कहा कि वह राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों का सम्मान करते हैं। हालांकि, उनका सवाल यह है कि इनके सम्मान को सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाते समय मानवीय व्यवहार और व्यावहारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
शशि थरूर ने समय को लेकर उठाया सवाल
थरूर ने अपने तर्क में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को गाने में लगने वाले समय का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, ‘जन गण मन’ को पूरा करने में करीब 52 सेकंड लगते हैं, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण में लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का समय लग सकता है। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि कुछ राज्यों में कार्यक्रमों की शुरुआत राज्यगीत से करने की परंपरा या निर्णय भी सामने आया है। ऐसे में यदि राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राज्यगीत को एक साथ कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाता है तो लोगों को कई मिनट तक खड़े रहना पड़ सकता है।
थरूर ने इसी व्यावहारिक पहलू को लेकर सवाल उठाया कि क्या हर सरकारी कार्यक्रम की शुरुआत और समाप्ति पर दर्शकों से लंबे समय तक सम्मान की मुद्रा में खड़े रहने की अपेक्षा करना उचित होगा।

‘क्या सम्मान के लिए कानून बनाया जा सकता है?’
शशि थरूर का मुख्य तर्क यह है कि किसी राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान के प्रति सम्मान केवल कानूनी बाध्यता से पैदा नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशंका जताई कि यदि लोगों पर इसे लंबे और अनिवार्य प्रोटोकॉल के रूप में लागू किया गया, तो इसके पीछे मौजूद भावनात्मक उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। उनके अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान स्वाभाविक रूप से पैदा होना अधिक प्रभावी है।
अगर लोगों को बार-बार लंबे समय तक खड़े रहने या पूरे गीत को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य किया जाएगा, तो कुछ लोगों में सम्मान के बजाय असहजता या विरोध की भावना भी पैदा हो सकती है।
वंदे मातरम् पर बढ़ी राजनीतिक बहस
‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक बहस केवल इसके गायन तक सीमित नहीं है। इसके इतिहास, राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका और आधुनिक भारत में इसके इस्तेमाल को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच विचारों में अंतर रहा है। थरूर ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर नहीं, बल्कि उसे लागू करने के तरीके को लेकर है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा बनाए रखने के साथ-साथ नियमों को व्यावहारिक और लोगों की सहज भागीदारी के अनुकूल बनाना भी जरूरी है।
उन्होंने चिंता जताई कि राष्ट्रगीत के सम्मान को बढ़ाने की कोशिश यदि अत्यधिक औपचारिक या बाध्यकारी बन गई, तो इसका परिणाम अपेक्षा के विपरीत हो सकता है। यही वजह है कि उन्होंने सरकार और नीति निर्माताओं से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत बताई है।











