वाराणसी में श्रीविद्यामठ से चतुरंगिणी सेना की शुरुआत, सनातनों के लिए अभिभावक और सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य

वाराणसी के श्रीविद्यामठ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने चतुरंगिणी सेना की घोषणा की। उद्देश्य हिंदू समाज की रक्षा, निर्भयता और धार्मिक संतुलन बनाए रखना है।

वाराणसी में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 'चतुरंगिणी सेना' बनाई। यह सेना हिंदू समाज, गौ-ब्राह्मण और निर्बल सनातनों की सुरक्षा के लिए समर्पित होगी। नौ स्तर, चार अंग और बीस विभाग के साथ यह समाज में भय और असुरक्षा समाप्त करेगी।

UP News: वाराणसी के श्रीविद्यामठ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 'चतुरंगिणी सेना' के गठन की घोषणा की है। इसका मुख्य उद्देश्य गौ-ब्राह्मण और निर्बल सनातनों की रक्षा करना तथा हिंदू समाज में भय को समाप्त करना है। स्वामी ने बताया कि आज के बदलाव और चुनौतीपूर्ण समय में केवल शास्त्र-चर्चा पर्याप्त नहीं है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े सनातनों और धर्म-प्रतीकों की सुरक्षा के लिए यह सेना आवश्यक है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भगवान परशुराम के अमर संकल्प 'गवां दुःखमपाकर्तुं शस्त्रं जग्राह भार्गवः' को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने कहा कि यह सेना पूरी तरह से धर्म-रक्षा और समाज की सुरक्षा के लिए समर्पित होगी।

अभय और अभिभावकत्व का संकल्प

स्वामी ने कहा कि चतुरंगिणी सेना का उद्देश्य प्रत्येक सनातनी की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यह सेना सनातनों के लिए अभिभावक (Guardian) का काम करेगी और समाज में भय को समूल समाप्त करेगी। स्वामी ने आश्वस्त किया कि जब समाज को यह विश्वास होगा कि उसके पीछे एक संगठित और प्रशिक्षित बल खड़ा है, तो वे निर्भय होकर धर्म के मार्ग पर अडिग रहेंगे।

स्वामी ने बताया कि सेना का उद्देश्य केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में जागरूकता, नैतिक बल और शास्त्र-शस्त्र की मर्यादा में शक्ति का समन्वय भी सुनिश्चित करेगी।

चतुरंगिणी सेना की संरचना

सेना का संचालन प्राचीन भारतीय सैन्य विज्ञान के आधार पर नौ स्तरीय पदानुक्रम में होगा। इसके शीर्ष पर परमाध्यक्ष होंगे, जिनके अधीन तीन सर्वाध्यक्ष, सह सर्वाध्यक्ष और संयुक्त सर्वाध्यक्ष (पुरुष, स्त्री और तृतीय लिंग के प्रतिनिधि) सामाजिक और धार्मिक संतुलन बनाएंगे।

नौ स्तरीय पदानुक्रम में पत्तिपाल, सेनामुखपति, गुल्मपति, गणपाल, वाहिनीपति, पृतनापति, चमुपति, अनीकिनीपति और महासेनापति शामिल होंगे। प्रत्येक अधिकारी का विशेष प्रोटोकॉल और जिम्मेदारी होगी।

चार अंग और बीस विभाग

सेना को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए चार प्रमुख अंग बनाए गए हैं- मनबल, तनबल, धनबल और जनबल। प्रत्येक अंगाध्यक्ष के अधीन पांच-पांच विभाग होंगे, जिससे कुल बीस विभाग बनेंगे।

  1. मनबल के अंतर्गत संत, विद्वान, पुरोहित, वकील और मीडिया विभाग शामिल होंगे। ये बौद्धिक मोर्चे को संभालेंगे और रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।
  2. तनबल के तहत मल्ल, लाठी, परशु, खड्ग और गन के माध्यम से प्रत्यक्ष सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। यह सेना का सक्रिय और युद्धक भाग होगा।
  3. जनबल में विभिन्न श्रेणियों के स्वयंसेवक होंगे, जो धार्मिक सेवा और सामाजिक गतिविधियों में लगे रहेंगे। इनके कार्यकाल में सार्वकालिक, वार्षिक, मासिक, साप्ताहिक और दैनिक कार्य शामिल होंगे।
  4. धनबल का मुख्य कार्य सेना के पोषक और संसाधन उपलब्ध कराना है। इसमें प्रकट दाता, अप्रकट दाता, भूमि, भवन और वस्तु दाता शामिल होंगे। धनबल प्रत्यक्ष सैन्य टुकड़ी का हिस्सा नहीं होगा, बल्कि सेना के संचालन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने वाला 'पृष्ठ-स्तंभ' होगा।

पत्तिपाल: सबसे बुनियादी कार्यकारी इकाई

सेना की सबसे छोटी और बुनियादी कार्यकारी इकाई पत्तिपाल होगी। पत्तिपाल दस योद्धाओं की टुकड़ी का नेतृत्व करेंगे, जिसमें मनबल, तनबल और जनबल का मिश्रण शामिल होगा। यह इकाई स्थानीय स्तर पर रक्षा और सामाजिक गतिविधियों का संचालन करेगी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि पत्तिपाल और उनकी टुकड़ियां सनातन धर्म के आत्मसम्मान और रक्षा का अभेद्य दुर्ग बनेंगी। यह संगठन शास्त्र और शस्त्र दोनों के संतुलन में कार्य करेगा और किसी भी आक्रामक या आततायी को प्रभावी तरीके से प्रत्युत्तर देगा।

सेना का उद्देश्य

चतुरंगिणी सेना का मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज में भय को समाप्त करना और धर्म-प्रतीकों की रक्षा करना है। स्वामी ने कहा कि इस सेना के माध्यम से समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोग भी निर्भय होकर धर्म के मार्ग पर अडिग रह सकेंगे।

स्वामी ने यह भी कहा कि चतुरंगिणी सेना सिर्फ सैन्य बल नहीं है, बल्कि यह समाज में नैतिक, बौद्धिक और वित्तीय समर्थन का एक संगठित रूप है। इसके माध्यम से सनातनों की सुरक्षा, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को भी बढ़ावा मिलेगा।

सेना के शीर्ष पदों पर नियुक्त सर्वाध्यक्ष और संयुक्त सर्वाध्यक्ष समाज और धर्म के संतुलन का कार्य करेंगे। ये पद पुरुष, स्त्री और तृतीय लिंग के प्रतिनिधियों के माध्यम से समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेंगे। इस संरचना का उद्देश्य समाज में समानता और न्याय को बनाए रखना है।

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