विशेष विधानसभा सत्र में स्पीच पर असहमति, कर्नाटक सरकार-राज्यपाल के बीच विवाद तेज

विशेष विधानसभा सत्र में स्पीच पर असहमति, कर्नाटक सरकार-राज्यपाल के बीच विवाद तेज

कर्नाटक में विशेष विधानसभा सत्र के दौरान सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव बढ़ गया। राज्यपाल ने स्पीच के कुछ पैराग्राफ पर असहमति जताई। अगर समाधान नहीं निकला तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है।

Karnataka: कर्नाटक में साल के पहले विधानसभा सत्र से पहले राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव सामने आया है। यह विवाद विशेष सत्र के दौरान पढ़ी जाने वाली स्पीच की कॉपी को लेकर है। इस मामले में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अगर हल नहीं निकला तो मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा सकता है।

विशेष सत्र और मनरेगा बिल पर चर्चा

कर्नाटक में इस साल का पहला विधानसभा सत्र खास इसलिए है क्योंकि इसे सामान्य बजट सत्र के बजाय विशेष सत्र के रूप में बुलाया गया है। कांग्रेस सरकार ने इस सत्र को मनरेगा कानून में किए गए केंद्र सरकार के बदलावों पर चर्चा के लिए बुलाया है। सरकार का उद्देश्य किसानों, ग्रामीण और राज्य की विकास परियोजनाओं को लेकर उठ रही परेशानियों पर ध्यान दिलाना है।

सत्र के पहले दिन परंपरा के अनुसार राज्यपाल थावरचंद गहलोत को संयुक्त संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया। इसी अवसर के लिए सरकार ने उन्हें स्पीच की कॉपी भेजी।

स्पीच कॉपी में क्या था लिखा

सरकार की ओर से भेजी गई स्पीच में नए G राम G बिल की खामियों का जिक्र किया गया था। इसके अलावा भद्रा परियोजना में केंद्र की ओर से वित्तीय मदद में देरी और GST को लेकर गैर BJP शासित राज्यों के साथ होने वाले भेदभाव को भी उठाया गया था। सरकार ने इसमें यह स्पष्ट किया कि यह मुद्दे राज्य की जनता और विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।

स्पीच की भाषा में केंद्र और राज्य के बीच चल रहे संघर्ष को भी उजागर किया गया था। इसका उद्देश्य विधानसभा और जनता को जानकारी देना था।

राज्यपाल की असहमति

स्पीच पढ़ने के बाद राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने चीफ सेक्रेटरी को बताया कि स्पीच के 11 पैराग्राफ ऐसे हैं जो केंद्र और राज्य के बीच संघर्ष को बढ़ा सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इन पैराग्राफ को हटाया जाए ताकि विवाद न बढ़े।

हालांकि, राज्य सरकार ने इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। सरकार ने बताया कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली हाई लेवल कमिटी ने स्पीच की समीक्षा की है और तकनीकी या मामूली बदलाव संभव हैं, लेकिन पैराग्राफ को हटाया नहीं जा सकता। इसके बाद राज्यपाल ने संयुक्त संबोधन में आने से असहमति जताई।

सुप्रीम कोर्ट का विकल्प

कर्नाटक सरकार के पास अब एक विकल्प है। सूत्रों के अनुसार, सरकार ने एडवोकेट जनरल शशि किरण शेट्टी को दिल्ली भेजा है। अगर राज्यपाल संयुक्त संबोधन में नहीं आते हैं, तो सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।

यह मामला संवैधानिक अधिकार और विधानसभा प्रक्रिया के बीच टकराव की मिसाल बन सकता है। कोर्ट में जाने पर यह तय होगा कि क्या राज्यपाल सत्र के दौरान स्पीच में बदलाव करने का अधिकार रखते हैं या नहीं।

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