पश्चिम बंगाल SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता का अधिकार मतदान न करने पर समाप्त नहीं होता। यदि किसी को सूची से हटाया गया है, तो वह ट्रिब्यूनल में अपील कर दोबारा शामिल हो सकता है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में SIR मामले की सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने मतदाता अधिकार और वोटिंग प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश मतदान नहीं कर पाया है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसका वोटिंग का अधिकार हमेशा के लिए खत्म हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मतदाता को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया जाता है और वह इस चुनाव में मतदान नहीं कर पाता है, तो उसके पास अधिकार है कि वह इस फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल में अपील करे। अगर पीआर ट्रिब्यूनल यह फैसला करता है कि उस व्यक्ति को लिस्ट में शामिल किया जाना चाहिए, तो उसे दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल किया जाएगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया उन लोगों पर भी लागू होगी, जिन्हें पहले वोटर लिस्ट में शामिल किया गया था लेकिन बाद में किसी कारण से बाहर कर दिया गया। इस निर्णय से यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी व्यक्ति को मतदान न करने के कारण उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
SIR आपत्तियों का निपटारा और प्रक्रिया
इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि SIR में कुल 60 लाख आपत्तियों में से लगभग 47 लाख आपत्तियों का निपटारा 31 मार्च तक किया जा चुका है। प्रतिदिन लगभग 1.75 लाख से 2 लाख आपत्तियों पर विचार किया जा रहा है और सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस डेटा की सराहना की और कहा कि यह प्रक्रिया काफी व्यवस्थित और पारदर्शी ढंग से चल रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सॉफ्टवेयर में मतदाताओं की डिटेल का ऐसा स्ट्रक्चर है जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वोटर लिस्ट में शामिल क्यों किया गया या बाहर क्यों रखा गया।
कोर्ट की टिप्पणियां
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट से प्राप्त तथ्यों और आंकड़ों पर भरोसा है। जस्टिस बागची ने कहा कि किसी व्यक्ति को लिस्ट में शामिल करने या बाहर करने के कारणों की स्पष्ट जानकारी उसे उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया कि चुनाव प्रक्रिया किस सूची के आधार पर होगी और सभी नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार का सम्मान किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि वोटिंग का अधिकार हर व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है और किसी को भी अपने मत का प्रयोग करने का अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
मतदाता अधिकार का संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मतदान न कर पाने के बावजूद मतदाता का अधिकार समाप्त नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति को सूची से हटाया गया है और वह इसके खिलाफ अपील करता है, तो उसे न्याय मिलने की संभावना है। यह निर्णय मतदाता अधिकार की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना होगा कि सभी मतदाता अपने अधिकार का प्रयोग कर सकें। मतदाता सूची को पारदर्शी और तकनीकी रूप से सटीक रखना जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की त्रुटि या गलतफहमी से मतदाता प्रभावित न हो।









