यूपी में ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़े को लिव-इन में रहने की अनुमति, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस सुरक्षा का दिया आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में एक ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़े को लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहने की अनुमति देते हुए पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया। जानिए कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्ति और एक अन्य वयस्क के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण प्रदान किया है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि उनके परिवारजन या कोई अन्य व्यक्ति उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

लखनऊ: भारत में LGBTQ+ अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले में Allahabad High Court ने ट्रांसजेंडर और समलैंगिक जोड़े को लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहने की अनुमति दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों बालिग हैं और अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं, इसलिए उनके जीवन में परिवार या किसी अन्य व्यक्ति का हस्तक्षेप असंवैधानिक होगा।

कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार का खतरा हो तो उन्हें तुरंत सुरक्षा प्रदान की जाए। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को मजबूती देने वाला माना जा रहा है।

मामला क्या है?

यह मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों वयस्क हैं और स्वेच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके परिवार से ही उन्हें जान-माल का खतरा है। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की मांग करने के बावजूद कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए उनके संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने का पूर्ण अधिकार है। परिवार, समाज या राज्य इस निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले Navtej Singh Johar v. Union of India का उल्लेख किया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को असंवैधानिक घोषित करते हुए समलैंगिक संबंधों को वैध माना गया था।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे संबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत संरक्षित हैं।

परिवार को हस्तक्षेप से रोका

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि एक बार जब दो वयस्क अपनी इच्छा से साथ रहने का निर्णय ले लेते हैं, तो परिवार या किसी अन्य व्यक्ति को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई अधिकार नहीं है। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे। कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार की धमकी या उत्पीड़न का सामना करना पड़े, तो वे संबंधित पुलिस आयुक्त या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) से संपर्क कर सकते हैं। पुलिस को तत्काल सुरक्षा उपलब्ध करानी होगी।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी याचिकाकर्ता की उम्र को लेकर संदेह हो, तो पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत ऑसिफिकेशन टेस्ट या अन्य वैध माध्यमों से उम्र का सत्यापन कर सकती है। हालांकि, यदि कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, तो पुलिस को अनावश्यक या जबरन कार्रवाई से बचना होगा।

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