न्यूयॉर्क के मेयर चुनाव में जोहरान ममदानी की जीत का असर अब यूरोप की राजनीति में भी दिखाई देने लगा है। ममदानी के अभियान में महंगाई, बढ़ते किराए और रोजमर्रा की बढ़ती लागत को प्रमुख मुद्दा बनाया गया था। उनका संदेश था कि न्यूयॉर्क को आम लोगों के लिए अधिक किफायती बनाया जाए।
बर्लिन: अब यूरोप के कई वामपंथी और प्रगतिशील राजनीतिक नेता भी इसी तरह के मुद्दों को अपने चुनावी अभियानों के केंद्र में ला रहे हैं। जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और नीदरलैंड में महंगे मकान, बढ़ता किराया और आम परिवारों पर बढ़ते खर्च का दबाव राजनीतिक बहस का अहम हिस्सा बन चुका है। सबसे उल्लेखनीय उदाहरण जर्मनी की राजधानी बर्लिन का है, जहां वामपंथी पार्टी की नेता एलिफ एराल्प ने महंगे आवास और किराए को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया। उनके प्रदर्शन के बाद जर्मन मीडिया में उनकी तुलना ‘बर्लिन की ममदानी’ से की जा रही है।
यूरोप के अन्य देशों में भी वामपंथी नेता आवास संकट को लेकर नई रणनीति अपना रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि ममदानी की जीत ने यूरोपीय वामपंथी राजनीति को आम लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियों के इर्द-गिर्द चुनावी संदेश तैयार करने के लिए नया संदर्भ दिया है।
बर्लिन में सस्ते घरों के वादे से एलिफ एराल्प को बढ़त
यूरोप में ममदानी से सबसे अधिक तुलना जर्मनी की एलिफ एराल्प से की जा रही है। 45 वर्षीय एराल्प पेशे से वकील हैं और तुर्की मूल के परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता 1980 के तुर्की सैन्य तख्तापलट के बाद जर्मनी आए थे।
एराल्प 2017 में जर्मनी की वामपंथी पार्टी द लिंक से जुड़ी थीं। हाल में हुए बर्लिन चुनाव में उनकी पार्टी ने महंगे शहर और बढ़ते किराए को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया। एराल्प ने बर्लिन में निजी कंपनियों के स्वामित्व वाले करीब 2.2 लाख मकानों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने की मांग की। इस मुद्दे को चुनावी समर्थन मिला और द लिंक को करीब 25.7 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए।
इस प्रदर्शन के साथ द लिंक चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। हालांकि, सरकार बनाने के लिए उसे अन्य दलों के साथ गठबंधन करना होगा। बर्लिन के नतीजों ने यह दिखाया कि आवास और किराया जैसे सीधे रोजमर्रा के मुद्दे बड़े शहरों में मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं।
ब्रिटेन में पर्यावरण के साथ महंगे घर का मुद्दा
ब्रिटेन में ग्रीन पार्टी के नेता जैक पोलांस्की की राजनीति में भी ममदानी की शैली की झलक दिखाई देती है। ग्रीन पार्टी पारंपरिक रूप से पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुद्दों पर केंद्रित रही है, लेकिन पोलांस्की ने पार्टी के राजनीतिक एजेंडे का दायरा बढ़ाया है।
पोलांस्की महंगाई, महंगे मकान, बढ़ते किराए, रोजमर्रा की लागत और अमीर वर्ग पर अधिक कर लगाने जैसे मुद्दों को पर्यावरणीय राजनीति से जोड़ते हैं। वह इस रणनीति को ‘इको-पॉपुलिज्म’ कहते हैं।
सोशल मीडिया भी उनकी राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पोलांस्की ने बताया है कि उनकी वीडियो टीम ममदानी की वीडियो बनाने वाली टीम से सुझाव और तरीके सीख रही है।
पोलांस्की इस समय लंदन की होलबॉर्न सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के सांसद पद से हटने के बाद यहां 8 अक्टूबर को उपचुनाव होना है।
दो साल पहले हुए चुनाव में ग्रीन पार्टी को इस सीट पर केवल 10 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि, कुछ सर्वेक्षणों में इस बार पार्टी को करीब 40 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान लगाया गया है।
स्पेन में आवास संकट बना राजनीतिक विस्फोट का कारण
स्पेन में महंगे घर और बढ़ते किराए का मुद्दा भी तेजी से राजनीतिक महत्व हासिल कर रहा है। पिछले महीने मैड्रिड में 87 वर्षीय मारिकर्मेन अबास्कल को उस घर से बाहर निकाला गया, जिसमें वह करीब 70 वर्षों से रह रही थीं।
इस घटना के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए और आवास संकट को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ गया। यह मामला स्पेन में बढ़ती आवास समस्या का प्रतीक बन गया।
इसके बाद संसद में सरकार के आवास संबंधी प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला। खबर के अनुसार, इस राजनीतिक घटनाक्रम के बीच प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने 29 नवंबर को समय से पहले आम चुनाव कराने की घोषणा की।
स्पेन का घटनाक्रम यह दर्शाता है कि आवास संकट अब केवल सामाजिक या आर्थिक समस्या नहीं रह गया है। घर की उपलब्धता और किराए का सवाल सीधे राजनीतिक समर्थन और सरकार की स्थिरता से जुड़ रहा है।

पेरिस में 60 हजार सस्ते घर बनाने का लक्ष्य
फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी आवास की ऊंची कीमतें और बढ़ता किराया राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा हैं। समाजवादी पार्टी से जुड़े इमैनुएल ग्रेगोयर इसी साल पेरिस के मेयर चुने गए हैं।
ग्रेगोयर की राजनीति में किफायती आवास का मुद्दा प्रमुख है। वह पेरिस में अधिक सस्ते घर बनाने, खाली पड़े मकानों का उपयोग लोगों के लिए करने और किराए पर नियंत्रण बढ़ाने की बात करते हैं।
उनकी सरकार का लक्ष्य 60 हजार नए सस्ते घर बनाने का है।
ममदानी की जीत से पहले ही फ्रांस के कुछ वामपंथी नेता उनके अभियान से सीखने की बात कर चुके थे। खास तौर पर आम लोगों के आर्थिक दबाव को सरल और सीधे राजनीतिक संदेश में बदलने की उनकी शैली पर यूरोपीय नेताओं की नजर रही है।
नीदरलैंड में आवास संकट ने बदली चुनावी राजनीति
नीदरलैंड में भी घरों की कमी और बढ़ते किराए ने चुनावी राजनीति को प्रभावित किया है। 2025 के राष्ट्रीय चुनाव में डी66 के नेता रॉब येटन ने आवास संकट को अपने अभियान का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया।
उस समय नीदरलैंड में करीब 4 लाख घरों की कमी बताई गई थी। घर खरीदना महंगा हो चुका था और किराए में लगातार बढ़ोतरी हो रही थी। ऐसे में मतदाताओं के लिए महंगाई के साथ-साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया कि उन्हें किफायती घर कब मिलेगा।
डी66 ने हर साल 1 लाख नए घर बनाने और 10 नई टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव रखा था।
चुनाव में पार्टी को इसका लाभ मिला। डी66 वर्ष 2023 में मिली 9 सीटों से बढ़कर 2025 में 26 सीटों तक पहुंच गई और देश की प्रमुख पार्टियों में शामिल हो गई।
ममदानी मॉडल में क्या खास है?
जोहरान ममदानी की राजनीति का एक प्रमुख पहलू यह रहा कि उन्होंने जटिल आर्थिक समस्याओं को आम मतदाता की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश किया। किराया कितना है, घर कितना महंगा है, भोजन और परिवहन पर कितना खर्च हो रहा है—ऐसे सवाल उनके अभियान के केंद्र में रहे।
यही वजह है कि यूरोप के कुछ नेता भी अब वैचारिक बहस के साथ-साथ सीधे आर्थिक मुद्दों को चुनावी संदेश का आधार बना रहे हैं।
इस रणनीति में आवास संकट केवल शहरी नियोजन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि मजदूर वर्ग, युवा, किराएदार परिवारों और मध्यम वर्ग की आर्थिक चिंता से जुड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।
यूरोप के वामपंथ के लिए नया राजनीतिक रास्ता?
बर्लिन, लंदन, पेरिस, मैड्रिड और नीदरलैंड के उदाहरण बताते हैं कि किफायती आवास और जीवन-यापन की लागत यूरोपीय राजनीति में तेजी से महत्वपूर्ण हो रही है। हालांकि, इन सभी देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं और प्रत्येक नेता की रणनीति को सीधे ममदानी मॉडल कहना उचित नहीं होगा। नीदरलैंड में आवास संकट ममदानी की जीत से पहले ही बड़ा चुनावी मुद्दा था, जबकि अन्य जगहों पर भी किफायती आवास की राजनीति पहले से मौजूद रही है।
फिर भी ममदानी की जीत ने यह दिखाया है कि बढ़ती जीवन-यापन लागत को सरल भाषा में चुनावी मुद्दा बनाकर व्यापक मतदाता समूह तक पहुंच बनाई जा सकती है।
यूरोप में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सस्ते घर, किराए पर नियंत्रण और महंगाई जैसे मुद्दे कितने लंबे समय तक राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रहते हैं। अगर यह रणनीति अलग-अलग देशों में चुनावी सफलता दिलाती है, तो ममदानी की जीत को यूरोपीय वामपंथ की बदलती राजनीतिक शैली के एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।













