लंदन में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान सूर्यकांत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) को अंतरराष्ट्रीय कानून के सामने उभरती हुई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया।
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक महत्वपूर्ण और व्यापक चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि एआई अब केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं रहा, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय व्यवस्था के सामने उभरती सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है।
ब्रिटेन के लंदन स्थित बर्कबेक, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में “Artificial Intelligence and International Law” विषय पर दिए गए व्याख्यान में CJI सूर्यकांत ने कहा कि आने वाले वर्षों में लिए जाने वाले कानूनी और नीतिगत निर्णय यह तय करेंगे कि तकनीक, शक्ति, स्वतंत्रता और न्याय के बीच संतुलन कैसे स्थापित होगा।
“तकनीक न अच्छी है, न बुरी—निर्भर करता है इसके उपयोग पर”
अपने संबोधन में CJI ने स्पष्ट किया कि तकनीक अपने आप में न तो सकारात्मक होती है और न ही नकारात्मक। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि समाज इसे किस प्रकार के कानूनी, राजनीतिक और नैतिक ढांचे में उपयोग करता है। उन्होंने कहा, “कानून की भूमिका तकनीकी प्रगति को रोकना नहीं है और न ही उसके सामने बिना प्रश्न खड़े हुए समर्पण करना है। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी शक्ति संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक वैधता और मानवीय गरिमा के प्रति जवाबदेह बनी रहे।”
CJI सूर्यकांत ने कहा कि एआई आज शासन, व्यापार, रक्षा, संचार, सार्वजनिक प्रशासन और न्यायिक प्रक्रियाओं तक को प्रभावित कर रहा है। सरकारें अब एल्गोरिदम आधारित प्रणालियों का उपयोग कल्याण योजनाओं के वितरण, आव्रजन जांच, सीमा सुरक्षा, वित्तीय नियमन और पुलिसिंग जैसे क्षेत्रों में कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य क्षेत्र में स्वायत्त प्रणालियों का विकास तेजी से बढ़ रहा है, जबकि अदालतें एआई आधारित साक्ष्यों, डिजिटल रिकॉर्ड और स्वचालित निर्णय प्रक्रियाओं से जुड़े नए कानूनी सवालों का सामना कर रही हैं।

न्याय व्यवस्था के लिए अवसर भी है एआई
CJI ने यह भी माना कि एआई केवल चुनौती नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए एक बड़ा अवसर भी है। यदि इसका उपयोग मानव निगरानी और जिम्मेदारी के साथ किया जाए तो यह कानूनी शोध, केस प्रबंधन, दस्तावेज़ों के वर्गीकरण, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और न्यायिक मिसालों के विश्लेषण जैसे कार्यों में अत्यंत उपयोगी साबित हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इससे न्यायिक प्रक्रियाओं की गति बढ़ सकती है और आम नागरिकों तक न्याय की पहुंच अधिक प्रभावी हो सकती है। CJI सूर्यकांत ने अपने व्याख्यान में अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय कानून भौगोलिक सीमाओं और संप्रभु राज्यों की संरचना पर आधारित रहा है, लेकिन एआई इन अवधारणाओं को चुनौती दे रहा है।
उन्होंने बताया कि एआई मॉडल कई देशों के डेटा पर प्रशिक्षित होते हैं, वैश्विक स्तर पर कंप्यूटिंग संसाधनों का उपयोग करते हैं और किसी भी देश के नागरिकों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि मौजूदा कानूनी ढांचा इस नई तकनीकी वास्तविकता को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं।
“इस दशक के निर्णय तय करेंगे भविष्य”
अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में CJI ने कहा कि यह दशक निर्णायक साबित होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तकनीकी प्रणालियों में जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो न्याय और जिम्मेदारी की मूल अवधारणा कमजोर हो सकती है। उन्होंने कहा, “एआई का भविष्य केवल तकनीकी विकास से नहीं, बल्कि मानवता द्वारा चुने गए कानूनी और नैतिक विकल्पों से तय होगा। सबसे बड़ी चुनौती तकनीक को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय प्रक्रिया में जवाबदेही बनी रहे।”











