शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया मुलाकात के बाद पंजाब की सियासत में नए समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दोनों नेताओं की मुलाकात को करीब छह साल बाद BJP और SAD के बीच रिश्तों में संभावित नरमी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
Punjab Politics: पंजाब की राजनीति में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता करीब सात दशक पुराना है। यह संबंध हमेशा एक जैसा नहीं रहा। कभी दोनों दल वैचारिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस के खिलाफ साथ आए, तो कभी सत्ता और राजनीतिक हितों ने उन्हें करीब किया। 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर गठबंधन टूटने के बाद दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं।
अब शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया मुलाकात ने पंजाब की सियासत में संभावित गठबंधन की चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। हालांकि, बीजेपी की ओर से फिलहाल पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दिए गए हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी कह चुके हैं कि बीजेपी का गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है।
इसके बावजूद गठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों की रणनीति पर नजर बनी हुई है।
1952 में पहली बार साथ आए जनसंघ और अकाली दल
अकाली दल और बीजेपी के रिश्ते की शुरुआत मौजूदा बीजेपी से पहले भारतीय जनसंघ के दौर में हुई थी। 1952 में दोनों दलों ने कांग्रेस के मुकाबले के लिए साथ आने की कोशिश की। हालांकि, भाषा और पंजाब के पुनर्गठन जैसे मुद्दों पर दोनों की विचारधारा अलग थी। अकाली दल पंजाबी भाषा और पंजाबी सूबे की मांग को प्रमुखता देता था, जबकि जनसंघ हिंदी को लेकर अलग रुख रखता था। 1957 से 1966 के बीच पंजाबी सूबे की मांग के दौरान दोनों दलों के बीच मतभेद और स्पष्ट हुए।
पंजाब के पुनर्गठन के बाद 1967 में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए दोनों दल फिर साथ आए और सरकार बनाई। हालांकि, यह गठबंधन ज्यादा लंबा नहीं चला। भाषा नीति और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र जैसे मुद्दों पर मतभेद के बाद 1970 में जनसंघ ने प्रकाश सिंह बादल सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
आपातकाल ने फिर बढ़ाई नजदीकी

1975 से 1977 के आपातकाल के दौरान कांग्रेस विरोध ने अकाली दल और जनसंघ को एक बार फिर करीब ला दिया। 1977 में जनता पार्टी, जिसमें जनसंघ के नेता भी शामिल थे, और अकाली दल ने पंजाब में मिलकर सरकार बनाई। जनता पार्टी के टूटने के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। इसके बाद पंजाब में बीजेपी और अकाली दल के बीच नए राजनीतिक समीकरण बनने लगे।
1997 से मजबूत हुआ अकाली-BJP गठबंधन
दोनों दलों के रिश्ते में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1996 के मोगा घोषणा-पत्र के बाद आया। अकाली दल ने खुद को व्यापक ‘पंजाबियत’ की राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया। इसके बाद 1997 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी ने औपचारिक गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा। इस गठबंधन ने 1997 में सत्ता हासिल की और बाद में 2007 तथा 2012 में भी दोनों पार्टियां मिलकर पंजाब में सरकार बनाने में सफल रहीं। करीब 23 वर्षों तक यह गठबंधन राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण ताकत बना रहा।
2020 में कृषि कानूनों ने तोड़ा गठबंधन
अकाली दल और बीजेपी की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक साझेदारी को 2020 में बड़ा झटका लगा। केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में व्यापक आंदोलन के बीच अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया। पार्टी की नेता हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा भी दिया।
इसके बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ने की राह पकड़ी। पुराने गठबंधन में विधानसभा चुनाव के दौरान अकाली दल आमतौर पर 94 और बीजेपी 23 सीटों पर उम्मीदवार उतारती थी। लोकसभा में भी दोनों के बीच सीटों का बंटवारा तय था।
2024 लोकसभा चुनाव में अलग-अलग उतरे
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल पंजाब में अलग-अलग मैदान में उतरे। बीजेपी राज्य में अपना खाता नहीं खोल सकी, जबकि अकाली दल को सिर्फ बठिंडा सीट पर जीत मिली। इस प्रदर्शन ने दोनों दलों के सामने अपनी चुनावी रणनीति पर दोबारा विचार करने की चुनौती खड़ी की। अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर सवाल है कि क्या पुराना अकाली-BJP गठबंधन फिर लौटेगा? बीजेपी के कुछ नेता अकेले चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, जबकि गठबंधन समर्थक धड़ा मानता है कि दोनों दलों के साथ आने से चुनावी फायदा हो सकता है।









