क्या एक अकेला इंसान, बिना किसी मशीन या बड़ी मदद के, पत्थर के विशाल पहाड़ का सीना चीर सकता है? सुनने में यह असंभव लगता है। लेकिन, बिहार के एक छोटे से गाँव में एक ऐसा शख्स हुआ जिसने अपने अटूट हौसले और प्रेम की ताकत से इस असंभव को संभव कर दिखाया। यह कहानी है 'माउंटन मैन' दशरथ मांझी की, जिनके जज्बे के आगे पहाड़ को भी झुकना पड़ा।
मुख्य कहानी
बिहार के गया जिले के पास एक छोटा और बहुत पिछड़ा हुआ गाँव है गेहलौर। इस गाँव और नजदीकी शहर वजीरगंज (जहाँ अस्पताल और बाजार थे) के बीच में एक विशाल, पथरीला पहाड़ खड़ा था। यह पहाड़ एक दीवार की तरह था। गाँव वालों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी इस पहाड़ का लगभग 55 किलोमीटर लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ता था।
इसी गाँव में दशरथ मांझी नाम का एक बहुत गरीब मजदूर रहता था। वह अपनी पत्नी फाल्गुनी देवी से बेहद प्यार करता था।
साल 1959 की बात है। एक दिन, दशरथ पहाड़ के दूसरी तरफ मजदूरी कर रहा था। उसकी पत्नी उसके लिए दोपहर का खाना और पानी लेकर उसी संकरे और खतरनाक पहाड़ी रास्ते से आ रही थी। अचानक उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे गिरकर बुरी तरह घायल हो गई।
दशरथ को खबर मिली, तो वह भागा-भागा आया। उसकी पत्नी दर्द से तड़प रही थी और उसकी हालत बहुत गंभीर थी। उसे तुरंत अस्पताल ले जाने की जरूरत थी। लेकिन, बीच में वह विशाल पहाड़ खड़ा था। उस पहाड़ का चक्कर लगाकर अस्पताल पहुँचने में बहुत देर हो गई। समय पर इलाज न मिल पाने के कारण दशरथ की गोद में ही उसकी पत्नी ने दम तोड़ दिया।
अपने प्यार को इस तरह खोने के बाद दशरथ मांझी अंदर से टूट गए, लेकिन इस गहरे दुख ने उनके अंदर एक ऐसी आग जला दी जिसने इतिहास रच दिया। उन्होंने उस पहाड़ को देखा, जो उनकी पत्नी की मौत का कारण बना था, और कसम खाई, 'जब तक तुझे तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।'
उन्होंने ठान लिया कि वे इस पहाड़ के बीच से रास्ता बनाएंगे, ताकि जो उनके साथ हुआ, वह भविष्य में किसी और के साथ न हो।
दशरथ मांझी के पास न पैसा था, न कोई मशीन। उन्होंने सिर्फ एक 'छेनी और हथौड़ा' उठाया और अकेले ही उस विशाल पहाड़ से भिड़ गए।
गाँव के लोग उन्हें देखकर हंसते थे। लोग कहते, 'यह दशरथ अपनी पत्नी के गम में पागल हो गया है। भला एक अकेला, दुबला-पतला आदमी छेनी-हथौड़े से पहाड़ कैसे तोड़ सकता है?'
लेकिन दशरथ ने किसी की नहीं सुनी। उन्हें न भूख की परवाह थी, न प्यास की, न लोगों के ताानों की। गर्मी हो, कड़ाके की सर्दी हो या बरसात, वे दिन-रात बस छेनी-हथौड़े से पत्थर पर चोट करते रहे। उनके हाथों में छाले पड़ गए, खून बहा, लेकिन उनका हथौड़ा नहीं रुका।
एक साल नहीं, दो साल नहीं, बल्कि पूरे 22 साल (1960 से 1982 तक) उनका यह अकेला संघर्ष चलता रहा।
आखिरकार, एक आदमी के अटूट जज्बे और जिद्द के आगे उस घमंडी पहाड़ को हार माननी पड़ी। 22 साल की अथक मेहनत के बाद, दशरथ मांझी ने पहाड़ के बीचों-बीच 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा रास्ता बना दिया।
जिस दूरी को तय करने में पहले लोगों को कई घंटे लगते थे, अब वह दूरी सिमटकर कुछ ही किलोमीटर की रह गई। जो लोग कल तक उन्हें 'पागल' कहते थे, आज वही लोग उन्हें 'माउंटन मैन' (पहाड़ पुरुष) कहकर उनके सामने नतमस्तक थे।
सीख
दशरथ मांझी की यह सच्ची कहानी हमें सिखाती है कि इंसान की इच्छाशक्ति (Willpower) से बढ़कर दुनिया में कोई ताकत नहीं है। यदि हम किसी काम को करने की ठान लें और उसे पूरा करने के लिए अपना सब कुछ झोंक दें, तो बड़ी से बड़ी बाधा चाहे वह पत्थर का पहाड़ ही क्यों न हो रास्ते से हट जाती है। कभी यह मत सोचो कि तुम अकेले हो और तुम्हारे साधन सीमित हैं; एक अकेला इंसान भी अगर जिद्द पकड़ ले, तो वह दुनिया बदल सकता है।













