अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर इजराइल अलग-थलग? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टिप्पणी से नई बहस

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजराइल की आलोचना करते हुए कहा कि हर समस्या का समाधान सैन्य कार्रवाई नहीं है। अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर नई बहस छिड़ी।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के साथ हुए शांति समझौते का विरोध कर रहे इजराइली नेताओं को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्याएं हल नहीं होतीं और इजराइल को अपने सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका पर भरोसा रखना चाहिए।

वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अंतरिम शांति समझौते ने पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) की भू-राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। समझौते के बाद पहली बार अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सार्वजनिक रूप से उन इजराइली नेताओं की आलोचना की है जो इस डील का विरोध कर रहे हैं। वेंस का बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में युद्धविराम लागू हो चुका है और अमेरिका तथा ईरान के बीच आगे की वार्ताओं की तैयारी जारी है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान अमेरिका-इजराइल संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है कि वॉशिंगटन अब क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने की कोशिश कर रहा है।

जेडी वेंस ने क्या कहा?

पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि इजराइल के कुछ नेता मौजूदा परिस्थितियों की वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि वह स्वयं प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार का हिस्सा होते, तो अमेरिका जैसे सबसे बड़े सहयोगी की नीतियों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने से बचते।

वेंस ने कहा कि वर्तमान समय में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया के उन नेताओं में शामिल हैं जो इजराइल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इसके बावजूद इजराइली सरकार के कुछ सदस्य लगातार अमेरिकी कूटनीतिक प्रयासों की आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्विर और वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए कहा कि केवल सैन्य शक्ति के भरोसे दीर्घकालिक समाधान नहीं निकाला जा सकता। वेंस ने सवाल उठाया, “एक ऐसा देश जिसकी आबादी लगभग 90 लाख है, उसके पास हर चुनौती का जवाब केवल सैन्य कार्रवाई नहीं हो सकता। आखिर दूसरा विकल्प क्या है?”

अमेरिका-ईरान शांति समझौता क्या है?

अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों तक चले तनाव, सैन्य टकराव और कूटनीतिक बातचीत के बाद एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष को समाप्त करना और भविष्य की व्यापक वार्ता के लिए आधार तैयार करना है।

इस समझौते के तहत युद्धविराम लागू किया गया है तथा दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच आगे की तकनीकी और राजनीतिक बातचीत का रास्ता खोला गया है। शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में दोनों पक्षों के अधिकारियों के बीच पहली औपचारिक बैठक प्रस्तावित है, जिसमें समझौते के क्रियान्वयन पर चर्चा की जाएगी।

ट्रम्प का दावा: “ईरान लगभग बिना शर्त झुका”

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है। उन्होंने दावा किया कि युद्ध और आर्थिक दबाव के कारण ईरान को समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। ट्रम्प के अनुसार, यह समझौता लगभग “बिना शर्त आत्मसमर्पण” जैसा है और इससे अमेरिका की वैश्विक शक्ति का प्रदर्शन हुआ है। हालांकि, इस दावे को लेकर अमेरिका के भीतर भी बहस छिड़ी हुई है।

अमेरिका में भी उठ रहे हैं सवाल

अमेरिका के कई रिपब्लिकन नेताओं ने इस समझौते की आलोचना की है। पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस समेत कुछ नेताओं का कहना है कि यह समझौता ईरान के प्रति अत्यधिक नरम रुख दर्शाता है। आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक प्रतिबंधों में संभावित ढील से ईरान को अरबों डॉलर की राहत मिल सकती है, जिससे अमेरिका की रणनीतिक बढ़त कमजोर होगी। वहीं समझौते के समर्थकों का कहना है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की तुलना में कूटनीतिक समाधान अधिक प्रभावी और टिकाऊ साबित हो सकता है।

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ईरान की प्रतिक्रिया: भरोसा अभी भी सीमित

ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने स्वीकार किया कि वह शुरुआत में अमेरिका के साथ समझौते के पक्ष में नहीं थे। हालांकि राष्ट्रपति मसूद पजशकियान के आश्वासन के बाद उन्होंने इसे मंजूरी दी।

खामेनेई ने कहा कि अमेरिका पर पूर्ण विश्वास नहीं किया जा सकता और समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वॉशिंगटन अपने वादों का कितना पालन करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका अतिरिक्त शर्तें थोपने की कोशिश करता है तो ईरान उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। उधर ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने चेतावनी दी है कि किसी भी तरह के समझौता उल्लंघन का “कड़ा जवाब” दिया जाएगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हो रही गतिविधियां

समझौते का सबसे तत्काल प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर दिखाई दिया है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही तेज हो गई है। सऊदी अरब सहित कई देशों के तेल टैंकर सुरक्षित रूप से इस मार्ग से गुजर रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल आपूर्ति को लेकर बनी चिंताओं में कुछ कमी आई है। इसके अलावा अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकेबंदी को भी समाप्त करने की घोषणा की है। हालांकि अमेरिकी नौसेना क्षेत्र में निगरानी बनाए रखेगी ताकि समझौते की शर्तों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

इजराइल और लेबनान मोर्चे पर तनाव बरकरार

हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच शांति प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन इजराइल और लेबनान के बीच तनाव अभी समाप्त नहीं हुआ है। इजराइली सेना ने दक्षिणी लेबनान में अपनी तैनाती जारी रखने का संकेत दिया है। हाल के हमलों में कई लोगों की मौत की खबरें भी सामने आई हैं। इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्रीय संघर्ष के सभी आयाम अभी पूरी तरह नियंत्रित नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजराइल और उसके पड़ोसी देशों के बीच तनाव जारी रहता है, तो अमेरिका-ईरान समझौते के सकारात्मक प्रभाव सीमित हो सकते हैं।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्यों बना विवाद का केंद्र?

ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले दो दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय रहा है। ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है। दूसरी ओर अमेरिका और इजराइल को आशंका है कि इसका उपयोग परमाणु हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। 2015 के परमाणु समझौते में ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित रखने पर सहमति जताई थी। 

लेकिन 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद ईरान ने संवर्धन स्तर बढ़ाना शुरू कर दिया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, हाल के वर्षों में ईरान 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन कर रहा था, जो नागरिक उपयोग की जरूरतों से कहीं अधिक है, हालांकि यह परमाणु हथियारों के लिए आवश्यक स्तर से अभी भी नीचे है।

आगे क्या?

अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली आगामी वार्ताएं इस शांति प्रक्रिया की सफलता तय करेंगी। यदि दोनों पक्ष समझौते की शर्तों का पालन करते हैं, तो पश्चिम एशिया में वर्षों से जारी तनाव को कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

हालांकि इजराइल की सुरक्षा चिंताएं, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय संघर्ष अभी भी बड़े प्रश्न बने हुए हैं। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि यह समझौता स्थायी शांति की शुरुआत है या केवल अस्थायी विराम।

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