इजरायल के संसदीय चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी है, लेकिन किसी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। अब गादी आइसेनकोट और नेतन्याहू की सरकार बनाने की कोशिशों में अरब पार्टियों की भूमिका अहम हो सकती है।
यरुशलम: इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं, लेकिन अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यह अभी तय नहीं है। मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं। हालांकि, उनका गठबंधन बहुमत से पीछे रह गया है। दूसरी तरफ पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट भी सरकार बनाने की कोशिश में हैं। अब सभी की नजर गठबंधन की बातचीत और 10 नवंबर को नई संसद के शपथ ग्रहण पर है।
नेतन्याहू सबसे आगे, लेकिन सरकार बनाने के लिए कम पड़ गईं सीटें
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। चुनाव आयोग की ओर से जारी नतीजों के मुताबिक, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 27 सीटें मिली हैं। वहीं, उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट की यशार पार्टी ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की है। नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास कुल 53 सीटें हैं। इसमें लिकुड के साथ धार्मिक और दक्षिणपंथी दल शामिल हैं।
दूसरी तरफ आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट के पास 48 सीटें हैं। इनमें यशार, नफ्ताली बेनेट की ब्याचाद, डेमोक्रेट्स और एविग्डोर लिबरमैन की यिसरायल बेतेनु शामिल हैं। इस चुनाव में अरब पार्टियों का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा है। जॉइंट लिस्ट को 11 और मंसूर अब्बास की राआम पार्टी को 8 सीटें मिली हैं। दोनों के पास कुल 19 सांसद हैं। यही वजह है कि सरकार गठन को लेकर अरब दलों का समर्थन सबसे ज्यादा चर्चा में है।
अरब पार्टियों के समर्थन से आइसेनकोट बन सकते हैं प्रधानमंत्री?
आइसेनकोट के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने गठबंधन के लिए बहुमत जुटाना है। अगर उनके 48 सांसदों को जॉइंट लिस्ट और राआम के सभी 19 सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो यह संख्या 67 तक पहुंच जाएगी। इस तरह वे बहुमत के जरूरी आंकड़े को पार कर सकते हैं। हालांकि, यह समीकरण कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, राजनीतिक तौर पर उतना नहीं है। विपक्ष में शामिल कुछ दक्षिणपंथी पार्टियां अरब दलों के साथ सरकार बनाने के खिलाफ हैं। ऐसे में आइसेनकोट को सभी सहयोगियों को साथ रखना मुश्किल हो सकता है।
हिब्रू यूनिवर्सिटी के अकॉर्ड सेंटर के एक सर्वे में विपक्षी गठबंधन की चार प्रमुख पार्टियों के 61 प्रतिशत समर्थकों ने राआम को शामिल करके सरकार बनाने का समर्थन किया है। वहीं, 20 प्रतिशत ने दोबारा चुनाव, 12 प्रतिशत ने नेतन्याहू के साथ बारी-बारी से प्रधानमंत्री बनने की व्यवस्था और 7 प्रतिशत ने अति-रूढ़िवादी पार्टियों के साथ गठबंधन का विकल्प चुना।
यह सर्वे बताता है कि विपक्षी मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सरकार बदलने के लिए अरब पार्टियों के साथ सहयोग को स्वीकार कर सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला राजनीतिक दलों के नेताओं को ही लेना होगा।
![]()
नई सरकार बनाने के लिए चार रास्तों पर नजर
सरकार बनाने का पहला रास्ता नेतन्याहू के लिए विपक्षी खेमे की कुछ दक्षिणपंथी पार्टियों को अपने साथ जोड़ना है। अगर वे कम से कम आठ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो उनके पास बहुमत होगा। हालांकि, चुनाव में उनके खिलाफ उतरने वाली पार्टियों को मनाना आसान नहीं होगा। दूसरा रास्ता आइसेनकोट के लिए अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाना है।
वह इन दलों को सरकार में शामिल कर सकते हैं या बाहर से समर्थन लेकर अल्पमत सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए विपक्षी सहयोगियों की सहमति भी जरूरी होगी। तीसरा विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार का है। इसमें नेतन्याहू और आइसेनकोट के साथ दूसरे प्रमुख दल भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि, आइसेनकोट ने चुनाव में खुद को नेतन्याहू के विकल्प के तौर पर पेश किया था। ऐसे में उनके साथ सरकार बनाना राजनीतिक रूप से मुश्किल फैसला होगा।
चौथी संभावना दोबारा चुनाव कराने की है। अगर कोई भी नेता सरकार बनाने में सफल नहीं होता और गठबंधन की कोशिशें नाकाम हो जाती हैं, तो देश को एक और चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
10 नवंबर को क्या होगा, कब मिलेगा नया प्रधानमंत्री?
इजरायल के चुनावी कार्यक्रम के मुताबिक, अंतिम नतीजे 4 नवंबर को राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को सौंपे जाने हैं। इसके बाद सरकार गठन की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। नई नेसेट का शपथ ग्रहण 10 नवंबर को निर्धारित है। हालांकि, 10 नवंबर को ही नए प्रधानमंत्री की ताजपोशी होना जरूरी नहीं है। सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति किसी ऐसे नेता को जिम्मेदारी सौंप सकते हैं, जिसके बहुमत जुटाने की संभावना सबसे अधिक हो। इसके बाद गठबंधन की बातचीत और संसद का विश्वास हासिल करने की प्रक्रिया पूरी होगी।









