अमेरिका में 3 नवंबर के मिडटर्म चुनाव से पहले अर्ली वोटिंग जारी है। रॉयटर्स-इप्सोस सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी को रिपब्लिकन से ज्यादा समर्थन मिला है। उधर, ट्रम्प प्रशासन की राज्यों से संवेदनशील वोटर डेटा मांगने की कार्रवाई पर विवाद बढ़ रहा है।
वॉशिंगटन: अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल गरमा गया है। देश के कई राज्यों में अर्ली वोटिंग जारी है और बड़ी संख्या में मतदाता चुनाव के तय दिन से पहले ही वोट डाल रहे हैं। इस बीच रॉयटर्स-इप्सोस के सर्वे में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के मुकाबले ज्यादा समर्थन मिला है। दूसरी तरफ ट्रम्प प्रशासन की ओर से राज्यों के मतदाताओं की निजी जानकारी मांगने को लेकर कानूनी विवाद बढ़ गया है। चुनाव में अब कुछ ही दिन बचे हैं और दोनों पार्टियां मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए प्रचार कर रही हैं।
अर्ली वोटिंग में मतदाताओं की बढ़ी भागीदारी
अमेरिका में चुनाव की निर्धारित तारीख से पहले मतदान करने की व्यवस्था को अर्ली वोटिंग कहा जाता है। इसके तहत मतदाता अपने राज्य के नियमों के अनुसार मतदान केंद्र पर जाकर या डाक के जरिए वोट डाल सकते हैं।
इस बार भी बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक इस सुविधा का इस्तेमाल कर रहे हैं। शुरुआती रिपोर्टों में करीब चार करोड़ लोगों के मतदान करने का दावा किया गया है। हालांकि, 30 अक्टूबर तक इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। अर्ली वोटिंग का उद्देश्य उन लोगों को मतदान का अवसर देना है, जो नौकरी, यात्रा या दूसरे कारणों से चुनाव वाले दिन मतदान केंद्र नहीं पहुंच सकते।
सर्वे में डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन से ज्यादा समर्थन
अमेरिकी चुनाव को लेकर जारी रॉयटर्स-इप्सोस सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिली है। 19 अक्टूबर को प्रकाशित सर्वे में 47 प्रतिशत लोगों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों और 35 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन करने की बात कही थी। हालांकि, ये आंकड़े सर्वे में शामिल लोगों की राय दिखाते हैं। इन्हें अर्ली वोटिंग में पड़े वास्तविक वोटों का परिणाम नहीं माना जा सकता।
अमेरिका में मतदान गुप्त होता है। इसलिए चुनाव के दिन से पहले केवल मतदान करने वालों की पार्टी से जुड़ी जानकारी के आधार पर वास्तविक नतीजों की पुष्टि नहीं हो सकती।
ट्रम्प प्रशासन ने राज्यों से क्यों मांगा वोटर डेटा?
चुनाव से पहले ट्रम्प प्रशासन ने मतदाता पंजीकरण की जांच को लेकर कई राज्यों से विस्तृत जानकारी मांगी है। अमेरिकी न्याय विभाग ने मतदाता सूचियों के साथ जन्मतिथि, पते, ड्राइविंग लाइसेंस और सोशल सिक्योरिटी नंबर से जुड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश की है।
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प्रशासन का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य चुनाव में केवल पात्र अमेरिकी नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना और गैर-नागरिकों के अवैध मतदान को रोकना है। हालांकि, कई राज्यों ने मतदाताओं की गोपनीयता और डेटा सुरक्षा का हवाला देते हुए पूरी जानकारी देने पर आपत्ति जताई है।
30 राज्यों से जुड़े कानूनी विवाद पर बढ़ी बहस
मतदाता डेटा की मांग को लेकर अमेरिकी न्याय विभाग और कई राज्य सरकारों के बीच अदालतों में विवाद चल रहा है। अप्रैल 2026 में दाखिल एक राज्य सरकार की कानूनी याचिका के अनुसार, संघीय सरकार ने 30 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी के खिलाफ मतदाता डेटा उपलब्ध नहीं कराने को लेकर मुकदमे दायर किए थे।
आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में संवेदनशील जानकारी एकत्र करने से नागरिकों की निजता प्रभावित हो सकती है। कुछ संगठनों ने आशंका जताई है कि इस डेटा के गलत इस्तेमाल से मतदाताओं को परेशानी हो सकती है। हालांकि, ट्रम्प प्रशासन द्वारा विरोधी मतदाताओं को निशाना बनाने की किसी योजना की पुष्टि नहीं हुई है।
महंगाई और रोजगार बने चुनाव के बड़े मुद्दे
मिडटर्म चुनाव में अर्थव्यवस्था भी अहम मुद्दा बनी हुई है। मतदाता महंगाई, रोजमर्रा के खर्च, रोजगार और सरकारी आर्थिक नीतियों को लेकर अपनी राय रख रहे हैं। रॉयटर्स-इप्सोस के अक्टूबर सर्वे में ट्रम्प की कुल लोकप्रियता 31 प्रतिशत दर्ज की गई थी। बड़ी संख्या में लोगों ने उनके कामकाज से असहमति जताई।
इमिग्रेशन नीति भी चुनावी चर्चा का हिस्सा है। रिपब्लिकन पार्टी सीमा सुरक्षा और अवैध प्रवास रोकने पर जोर दे रही है, जबकि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार आर्थिक नीतियों और प्रशासन की जवाबदेही जैसे मुद्दे उठा रहे हैं।
ओबामा और कमला हैरिस भी चुनाव प्रचार में सक्रिय
डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस चुनाव प्रचार में भाग ले रहे हैं। ओबामा ने कई राज्यों में पार्टी उम्मीदवारों के समर्थन में सभाएं की हैं। वहीं, 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प के खिलाफ उम्मीदवार रहीं कमला हैरिस भी पार्टी के प्रचार अभियान से जुड़ी हैं।
दूसरी तरफ राष्ट्रपति ट्रम्प रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में लगातार चुनावी कार्यक्रम कर रहे हैं। दोनों पार्टियों की कोशिश प्रतिनिधि सभा और सीनेट में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने की है।
रिपब्लिकन पार्टी हारी तो क्या राष्ट्रपति रहेंगे ट्रम्प?
मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होता। इसमें अमेरिकी कांग्रेस की सभी 435 प्रतिनिधि सभा सीटों और सीनेट की लगभग एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है। इसलिए रिपब्लिकन पार्टी के कांग्रेस में बहुमत गंवाने पर भी डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। उनका मौजूदा कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। हालांकि, यदि विपक्ष किसी सदन पर नियंत्रण हासिल करता है, तो प्रशासन के लिए नए कानून और बजट प्रस्ताव पारित कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कांग्रेस की समितियां सरकारी फैसलों की जांच भी कर सकती हैं। महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए प्रतिनिधि सभा में बहुमत और राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। फिलहाल अमेरिका की राजनीति में सबसे अहम सवाल यह है कि 3 नवंबर के मतदान के बाद कांग्रेस में दोनों दलों की स्थिति क्या होगी।









