यूपी में फॉरेंसिक लैब की कमी पर हाई कोर्ट ने जताई चिंता, चार सप्ताह में मांगा जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी में 13 फॉरेंसिक लैब को अपर्याप्त बताया। अदालत ने जांच सुविधाओं पर निदेशक से चार सप्ताह में जवाब मांगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश में फॉरेंसिक जांच प्रयोगशालाओं की कम संख्या पर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य की आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से मौजूदा व्यवस्था को अपर्याप्त बताते हुए फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक से चार सप्ताह में विस्तृत जवाब मांगा है।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अपराधों की वैज्ञानिक जांच से जुड़ी सुविधाओं को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि इतने बड़े राज्य में एक राज्य स्तरीय और 12 क्षेत्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं पर्याप्त नहीं हैं। अधिवक्ता पीयूष गुप्ता की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की पीठ ने फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

उत्तर प्रदेश में सिर्फ 13 फॉरेंसिक लैब, हाई कोर्ट ने उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश में आपराधिक मामलों की वैज्ञानिक जांच के लिए उपलब्ध प्रयोगशालाओं की संख्या को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत के सामने पेश जानकारी के अनुसार, प्रदेश में फिलहाल एक राज्य स्तरीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला और 12 क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं हैं। न्यायालय का मानना है कि राज्य की बड़ी आबादी और क्षेत्रफल को देखते हुए यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान फॉरेंसिक जांच से जुड़ी मौजूदा सुविधाओं और रिपोर्ट तैयार होने में लगने वाले समय पर ध्यान दिया। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले में अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी।

अपराध की जांच में फॉरेंसिक रिपोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हत्या, दुष्कर्म और अन्य गंभीर मामलों में घटनास्थल से जुटाए गए वैज्ञानिक साक्ष्यों की जांच के लिए प्रयोगशालाओं की जरूरत पड़ती है। प्रयोगशालाओं पर काम का दबाव बढ़ने से रिपोर्ट मिलने में देरी हो सकती है, जिसका असर आगे की कानूनी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

जनहित याचिका में नई लैब बनाने और जांच की समयसीमा तय करने की मांग

यह मामला अधिवक्ता पीयूष गुप्ता की ओर से दाखिल जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में राज्य सरकार को नई फॉरेंसिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने और वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में जांच के लिए भेजे गए नमूनों की रिपोर्ट तय समय में उपलब्ध होनी चाहिए। इसके लिए सरकार को एक मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार करके अधिसूचित करनी चाहिए।

प्रस्तावित व्यवस्था में प्रयोगशाला को नमूना मिलने से लेकर उसकी जांच पूरी होने और रिपोर्ट संबंधित अधिकारी तक पहुंचाने की अधिकतम समयसीमा निर्धारित करने की मांग की गई है। अलग-अलग प्रकार की जांच के लिए अलग समय तय करने का सुझाव दिया गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि किसी कारण से जांच तय समय में पूरी नहीं हो पाती है, तो संबंधित अधिकारी को देरी का कारण लिखित रूप में दर्ज करना चाहिए। इसके अलावा लंबित मामलों की नियमित समीक्षा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी नियुक्त करने की मांग भी की गई है।

फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी से प्रभावित हो सकती है मुकदमों की सुनवाई

याचिका में वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट आने में देरी का मुद्दा भी उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि कई आपराधिक मामलों में फॉरेंसिक रिपोर्ट महत्वपूर्ण साक्ष्य होती है। समय पर रिपोर्ट नहीं मिलने से पुलिस जांच और अदालत में मुकदमे की सुनवाई प्रभावित हो सकती है।

खासतौर पर उन मामलों में समयबद्ध जांच की मांग की गई है, जिनमें आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं। याचिकाकर्ता ने गंभीर अपराधों के मामलों में जांच रिपोर्ट को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 193(2) के तहत कुछ यौन अपराधों की जांच दो महीने के भीतर पूरी करने का प्रावधान है। याचिका में ऐसे मामलों की फॉरेंसिक जांच भी समय पर सुनिश्चित करने की व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी का भी उल्लेख किया। इसमें विभिन्न राज्यों में फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की उपलब्धता से जुड़े आंकड़े शामिल थे।

चार सप्ताह में जवाब, नवंबर के आखिर में अगली सुनवाई

हाई कोर्ट ने फिलहाल राज्य की फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक से विस्तृत जवाब मांगा है। इसमें प्रयोगशालाओं की उपलब्धता और जांच से जुड़ी व्यवस्थाओं पर सरकार का पक्ष सामने आने की उम्मीद है।

अदालत ने अभी नई प्रयोगशालाएं खोलने या जांच की निश्चित समयसीमा लागू करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है। ये मांगें जनहित याचिका में उठाई गई हैं, जिन पर आगे सुनवाई होनी है।

मामले की अगली सुनवाई नवंबर के अंतिम सप्ताह में निर्धारित है। इस दौरान निदेशक की ओर से दाखिल जवाब के आधार पर अदालत आगे के निर्देश दे सकती है।

प्रदेश में वैज्ञानिक जांच की सुविधाएं बढ़ाने का मुद्दा अपराध की जांच और न्यायिक प्रक्रिया दोनों से जुड़ा है। ऐसे में इस मामले में हाई कोर्ट की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण रहेगी।

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