UCC पर जस्टिस संजय करोल का बयान, बोले- धर्मनिरपेक्षता और संविधान की भावना समझनी है तो बिहार में छठ देखिए

पूर्व जस्टिस संजय करोल ने UCC को समय की जरूरत बताया। कहा कि धर्मनिरपेक्षता और संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना समझनी है तो बिहार की छठ पूजा देखिए।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय करोल ने समान नागरिक संहिता को समय की जरूरत बताया है। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बिहार की छठ पूजा को सामाजिक एकता और धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 44 पर अपनी राय रखी।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर बड़ा बयान दिया है। बुधवार, 28 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश में धर्मनिरपेक्षता और संविधान की भावना को समझने के लिए बिहार की छठ पूजा देखनी चाहिए। उनके मुताबिक, इस पर्व में अलग-अलग समुदायों के लोग बिना भेदभाव के एक साथ आते हैं। उन्होंने समान नागरिक संहिता को मौजूदा समय की जरूरत भी बताया।

छठ पूजा को बताया सामाजिक एकता का उदाहरण

भारत कलेक्टिव फाउंडेशन की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कानूनी संवाद में जस्टिस संजय करोल ने बिहार में बिताए अपने कार्यकाल का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग जगहों पर काम करने के दौरान उन्हें भारतीय समाज को करीब से समझने का मौका मिला। बिहार के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि यहां छठ पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहती। इस पर्व में विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।

उन्होंने लोगों से कहा कि यदि धर्मनिरपेक्षता को जमीनी स्तर पर समझना है, तो बिहार जाकर छठ का आयोजन देखना चाहिए। पटना में गंगा के किनारे होने वाली पूजा का उदाहरण देते हुए उन्होंने लोगों के बीच आपसी सहयोग और सामाजिक मेलजोल की बात कही। जस्टिस करोल के मुताबिक, भारतीय समाज में संविधान के मूल्यों की झलक रोजमर्रा की जिंदगी और सांस्कृतिक परंपराओं में भी देखने को मिलती है।

समान नागरिक संहिता पर क्या बोले पूर्व जज?

जस्टिस संजय करोल ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश की मौजूदा जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर खुलकर बातचीत होनी चाहिए और अलग-अलग विचारों को सुनना जरूरी है। उन्होंने माना कि समान नागरिक संहिता को लेकर लोगों की राय अलग हो सकती है। कुछ लोग इसे कानून में समानता और राष्ट्रीय एकता की दिशा में कदम मानते हैं। वहीं, दूसरे पक्ष को चिंता है कि इससे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर असर पड़ सकता है।

पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि इतने विविधताओं वाले देश में इस विषय पर गंभीर चर्चा जरूरी है। उनके मुताबिक, पूरे देश के लिए समान नागरिक कानून की व्यवस्था बनाने में केंद्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए। उन्होंने अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नागरिक संहिता लागू करने की व्यावहारिक चुनौतियों का भी जिक्र किया।

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संविधान का अनुच्छेद 44 क्या कहता है?

भारतीय संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत शामिल हैं। इसी हिस्से में अनुच्छेद 44 का उल्लेख किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य भारत के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। समान नागरिक संहिता का संबंध विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और पारिवारिक संपत्ति जैसे नागरिक मामलों के कानूनों से है।

फिलहाल देश में इन विषयों पर अलग-अलग समुदायों के लिए विभिन्न व्यक्तिगत कानून लागू हैं। UCC का उद्देश्य इन मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। हालांकि, अनुच्छेद 44 नीति निर्देशक सिद्धांत है। इसका अर्थ यह नहीं कि देश में समान नागरिक संहिता अपने आप लागू हो जाती है। इसके लिए संबंधित कानून बनाने की प्रक्रिया जरूरी होती है।

कार्यक्रम में दूसरे कानूनी विशेषज्ञों ने भी रखी राय

दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार और उत्तराखंड की UCC मसौदा समिति के सदस्य मनु गौर सहित कई कानूनी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। मनु गौर ने विवाह और व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद अंतर का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश में समान नागरिक अधिकारों को लेकर व्यापक चर्चा जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोमी चाको ने अलग-अलग राज्यों में UCC लागू करने से जुड़ी परेशानियों पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, यदि राज्यों के कानून अलग-अलग होंगे, तो निवास स्थान बदलने जैसी स्थितियों से कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। कार्यक्रम में महिलाओं के अधिकार, व्यक्तिगत कानूनों और सामाजिक विविधता से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत हुई।

पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं संजय करोल

जस्टिस संजय करोल हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गरली गांव से आते हैं। उन्होंने अपने न्यायिक करियर में हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा और बिहार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। वह नवंबर 2019 से फरवरी 2023 तक पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। इस दौरान उन्होंने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से जुड़ी जिम्मेदारियां भी संभालीं। इसके बाद 6 फरवरी 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वह 22 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त हुए।

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