I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, कपिल सिब्बल ने CBI जांच पर उठाए सवाल

पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी और ED के I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। कपिल सिब्बल ने CBI जांच के लिए अदालत के आदेश की जरूरत पर सवाल उठाए।

ममता बनर्जी और ED के I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। कपिल सिब्बल ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल की नई सरकार खुद मामला CBI को सौंप सकती है। ED ने स्वतंत्र जांच की मांग की है।

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच चल रहे I-PAC विवाद में गुरुवार, 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मामला जनवरी 2026 में कोलकाता स्थित राजनीतिक सलाहकार कंपनी I-PAC के दफ्तर पर ED की तलाशी के दौरान कथित रुकावट डालने से जुड़ा है। केंद्रीय जांच एजेंसी इस घटना की जांच CBI से कराने की मांग कर रही है, जबकि ममता बनर्जी की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल ने इस मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को गैरजरूरी बताया।

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में अब सरकार बदल चुकी है। पहले जिन परिस्थितियों का हवाला देकर ED ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, वे अब पहले जैसी नहीं हैं। सिब्बल ने तर्क दिया कि राज्य सरकार के पास किसी मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने की कानूनी प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है। 

उन्होंने सवाल किया कि जब मौजूदा राज्य सरकार स्वयं यह फैसला ले सकती है, तो उसी काम के लिए सुप्रीम कोर्ट से अलग आदेश क्यों मांगा जा रहा है। उनका कहना था कि अदालत को इस मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ED सरकार नहीं चला रही है

कपिल सिब्बल की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में सरकार बदलने और ED की भूमिका को लेकर टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि भले ही पश्चिम बंगाल में सरकार बदल गई हो, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय की स्थिति पहले जैसी ही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ED कोई सरकार नहीं चला रही है।

इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह सवाल उठाया कि सरकार बदलने मात्र से केंद्रीय जांच एजेंसी की शिकायत और उसके कानूनी अधिकारों का मुद्दा समाप्त हो जाता है या नहीं। सुनवाई में इस बात पर भी चर्चा हुई कि ED की याचिका पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में विचार किया जा सकता है या मामले को किसी अन्य कानूनी प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

क्या है I-PAC और ED के बीच पूरा विवाद?

यह मामला 8 जनवरी 2026 का है। उस दिन ED ने कथित कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में कोलकाता स्थित I-PAC के कार्यालय और कंपनी के निदेशक प्रतीक जैन से जुड़े परिसरों पर तलाशी ली थी। I-PAC लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के चुनावी अभियानों से जुड़ी राजनीतिक सलाहकार कंपनी रही है। ED का आरोप है कि तलाशी चलने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचीं और जांच में बाधा डाली।

एजेंसी का दावा है कि अधिकारियों को अपना काम पूरा करने से रोका गया और कुछ दस्तावेज तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी वहां से हटा दिए गए। हालांकि, ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों का विरोध करती रही हैं।

ED ने सरकारी तंत्र के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया

प्रवर्तन निदेशालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया कि तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार के अधिकारियों ने उसकी वैधानिक जांच में दखल दिया। एजेंसी का कहना है कि एक केंद्रीय जांच संस्था के अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से काम करने से रोकना गंभीर मामला है। ED ने मांग की कि घटना में ममता बनर्जी और राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की कथित भूमिका की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।

इसी आधार पर CBI जांच का अनुरोध किया गया है। एजेंसी ने यह मुद्दा भी उठाया कि यदि किसी मुख्यमंत्री या राज्य सरकार के अधिकारियों पर ही जांच रोकने का आरोप हो, तो शिकायत की निष्पक्ष जांच किस तरह सुनिश्चित की जाएगी।

अप्रैल की सुनवाई में अदालत ने जताई थी चिंता

22 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई मुख्यमंत्री किसी वैधानिक जांच में अनुचित हस्तक्षेप करता है, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन पर गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि केवल केंद्र और राज्य के बीच विवाद बताकर ऐसे आरोपों की जांच से बचा नहीं जा सकता।

हालांकि, अदालत की यह टिप्पणी आरोपों की गंभीरता और कानूनी प्रश्नों से जुड़ी थी। इसे ममता बनर्जी के खिलाफ अपराध साबित होने का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

ममता बनर्जी की ओर से आरोपों का किया गया विरोध

ममता बनर्जी और उनकी कानूनी टीम का कहना रहा है कि I-PAC के कार्यालय में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव अभियान से जुड़ी गोपनीय जानकारी रखी गई थी। उनका पक्ष है कि राजनीतिक दल के संवेदनशील दस्तावेजों की सुरक्षा जरूरी थी और ED की कार्रवाई के समय को लेकर भी सवाल उठते हैं।

कपिल सिब्बल पहले भी यह तर्क दे चुके हैं कि ED को कानूनी प्रक्रिया के उपलब्ध विकल्प अपनाने चाहिए और सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की आवश्यकता पर विचार होना चाहिए। दूसरी ओर, ED का दावा है कि उसकी तलाशी राजनीतिक गतिविधियों के लिए नहीं, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग की जांच से संबंधित थी।

सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर नजर

गुरुवार की सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत को यह तय करना है कि ED की याचिका पर आगे किस तरह का आदेश दिया जाए और क्या कथित जांच में बाधा डालने की घटना की जांच CBI को सौंपने का निर्देश जरूरी है।

फैसला सुरक्षित रखने का मतलब है कि अदालत ने सभी पक्षों को सुन लिया है, लेकिन अभी अंतिम आदेश नहीं सुनाया है। इस मामले में आगे का रास्ता सुप्रीम कोर्ट के आदेश से स्पष्ट होगा।

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