वाराणसी MLC चुनाव में BJP की दोनों सीटों पर हार, नई काशी टीम और बड़े नेताओं की रणनीति पर उठे सवाल

वाराणसी MLC चुनाव में भाजपा को शिक्षक और स्नातक दोनों सीटों पर हार मिली। सपा की जीत के बाद नई काशी टीम और बड़े नेताओं की चुनावी रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं

यूपी एमएलसी चुनाव में भाजपा ने 11 में से छह सीटें जीती हैं, लेकिन वाराणसी की शिक्षक और स्नातक दोनों सीटें सपा के खाते में गईं। इस हार के बाद काशी क्षेत्र की नई भाजपा टीम और उसकी चुनावी तैयारियों पर सवाल उठने लगे हैं।

वाराणसी: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच वाराणसी के एमएलसी नतीजों ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी ने दोनों सीटों पर जीत के लिए संगठन के पदाधिकारियों से लेकर मंत्री, विधायक और स्थानीय नेताओं तक को चुनाव प्रचार में उतारा था। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी अपने दोनों मौजूदा एमएलसी की सीटें बचाने में कामयाब रही। अब चर्चा इस बात की है कि भाजपा की नई क्षेत्रीय टीम मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने में कहां चूक गई।

वाराणसी में भाजपा की तैयारी पर भारी पड़ी सपा

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी विजेता पार्टी बनकर सामने आई है। उसे छह सीटों पर सफलता मिली, जबकि समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतीं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नतीजे भाजपा की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। वाराणसी खंड स्नातक सीट से सपा के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा उम्मीदवार केदारनाथ सिंह को हराया। आशुतोष सिन्हा को 55,046 वोट मिले, जबकि केदारनाथ सिंह को 35,114 वोट मिले। दोनों उम्मीदवारों के बीच करीब 20 हजार मतों का अंतर रहा।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी सपा के लाल बिहारी यादव ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार डॉ. प्रमोद मिश्रा को हराया। इस तरह सपा ने वाराणसी की दोनों सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा।

वाराणसी MLC चुनाव में दोहरी हार से भाजपा को झटका, नई काशी टीम के कामकाज पर उठे सवाल

वाराणसी की शिक्षक और स्नातक एमएलसी सीटों पर समाजवादी पार्टी ने फिर जीत दर्ज की है। भाजपा ने चुनाव में पूरी ताकत लगाई थी, लेकिन नतीजे उसके पक्ष में नहीं आए। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी पार्टी के लिए यह हार संगठन की समीक्षा का कारण बन गई है। भाजपा के लिए काशी की दोनों एमएलसी सीटों पर मिली हार कई सवाल छोड़ गई है। चुनाव से पहले पार्टी ने खूब बैठकें कीं। मंत्री, विधायक और स्थानीय पदाधिकारी भी मैदान में उतरे। इसके बावजूद शिक्षक और स्नातक मतदाताओं का भरोसा जीतने में भाजपा सफल नहीं हो सकी। 

खास बात यह है कि संगठन में हाल ही में किए गए बदलावों के बाद यह पहला बड़ा चुनावी इम्तिहान था। ऐसे में हार की चर्चा उम्मीदवारों तक सीमित न रहकर नई टीम के कामकाज तक पहुंच गई है।

नई टीम के सामने शुरुआत में ही मुश्किल

भाजपा ने 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए काशी क्षेत्र में संगठन की जिम्मेदारियां बदली थीं। अशोक चौरसिया को क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया। प्रदीप अग्रहरि को महानगर अध्यक्ष और राम सकल पटेल को जिलाध्यक्ष की कमान मिली। पार्टी को उम्मीद थी कि नई टीम पुराने कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाएगी। एमएलसी चुनाव में भी संगठन की सक्रियता दिखाने का मौका था, लेकिन नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे।

चुनाव के दौरान पदाधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। कार्यकर्ताओं से मतदाताओं तक पहुंचने और उम्मीदवारों के लिए समर्थन जुटाने को कहा गया था। अब हार के बाद चर्चा इस बात की है कि जमीनी स्तर पर इन कोशिशों का कितना असर हुआ।

बड़े नेताओं के प्रचार का भी नहीं मिला फायदा

वाराणसी में भाजपा का राजनीतिक आधार मजबूत माना जाता है। जिले की सभी आठ विधानसभा सीटों पर उसके विधायक हैं। स्थानीय स्तर पर पार्टी के पास जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क भी है। एमएलसी चुनाव में प्रदेश सरकार के मंत्री, विधायक, महापौर और वरिष्ठ पदाधिकारी सक्रिय रहे। बैठकों के अलावा मतदाताओं से सीधे संपर्क करने पर जोर दिया गया। इसके बाद भी भाजपा दोनों सीटें नहीं जीत पाई।

अब पार्टी के सामने यह समझने की चुनौती है कि इतने नेताओं की मौजूदगी और संगठन की तैयारी के बाद भी शिक्षक और स्नातक मतदाता उसके साथ क्यों नहीं आए। खासकर उन इलाकों में, जहां पार्टी अपनी पकड़ मजबूत मानती रही है।

वाराणसी MLC चुनाव में BJP की दोनों सीटों पर हार, नई काशी टीम और बड़े नेताओं की रणनीति पर उठे सवाल

स्नातक सीट पर इस बार हार का अंतर और बढ़ा

स्नातक सीट का नतीजा भाजपा के लिए ज्यादा चिंता बढ़ाने वाला है। वर्ष 2020 में समाजवादी पार्टी के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को 3,850 वोटों से हराया था। इस बार जीत का अंतर बढ़कर करीब 20 हजार वोट तक पहुंच गया। यानी पिछली बार के मुकाबले इस चुनाव में दोनों उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर काफी बढ़ गया। यह बात भाजपा के लिए समीक्षा का बड़ा मुद्दा बन सकती है।

शिक्षक सीट पर भी सपा के लाल बिहारी यादव ने अपनी पकड़ बनाए रखी। भाजपा समर्थित डॉ. प्रमोद मिश्रा को संगठन का साथ मिला, लेकिन वह जीत हासिल नहीं कर सके। दोनों सीटें सपा के पास पहले भी थीं। इस बार भी परिणाम नहीं बदलने से साफ है कि भाजपा इन दोनों मतदाता वर्गों में अपनी स्थिति मजबूत करने में सफल नहीं हुई।

उम्मीदवार तय करने में देरी भी बनी मुद्दा

हार के बाद भाजपा के काशी क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया ने उम्मीदवारों के चयन में देरी को एक बड़ी वजह बताया है। उनके मुताबिक, शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में मतदाता सूची तैयार कराने से लेकर एक-एक मतदाता से संपर्क करना जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए पर्याप्त समय चाहिए।

यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि इन चुनावों में सामान्य विधानसभा चुनाव की तरह सभी मतदाता वोट नहीं डालते। शिक्षक और स्नातक वर्ग के पंजीकृत मतदाता ही मतदान करते हैं। इसलिए उम्मीदवारों को पहले से तैयारी और लगातार संपर्क की जरूरत होती है।

2027 के चुनाव से पहले भाजपा के लिए बढ़ी चुनौती

वाराणसी की सभी आठ विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इसके बाद भी शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। स्थानीय विधायक और दूसरे जनप्रतिनिधि लोगों के बीच जाते रहे हैं। जनसुनवाई भी होती है और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी दी जाती है। मगर इस चुनाव में भाजपा अपने उम्मीदवारों के लिए जरूरी वोट नहीं जुटा सकी।

हालांकि, एमएलसी चुनाव के नतीजों से विधानसभा चुनाव की तस्वीर तय नहीं होती। दोनों चुनावों में वोट देने वाले लोग अलग हैं। प्रचार और मतदाताओं तक पहुंचने का तरीका भी अलग होता है। अब 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक है। ऐसे में भाजपा के लिए जरूरी होगा कि उम्मीदवार समय से तय हों और पुराने कार्यकर्ताओं को भी पूरी जिम्मेदारी मिले। मतदाताओं से संपर्क केवल चुनाव के दिनों तक सीमित न रहे, इस पर भी पार्टी को काम करना होगा।

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