सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT में कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने ट्रिब्यूनल की स्वायत्तता पर सवाल उठाते हुए अध्यक्षों को भर्ती का अधिकार देने और नियमित नियुक्तियों की व्यवस्था बनाने पर जोर दिया।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के कामकाज में सरकारी दखल पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने इन संस्थाओं की प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। अदालत ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों के पास होना चाहिए, ताकि संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम कर सकें।
NCLT में नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट नाराज, कॉर्पोरेट मंत्रालय के दखल पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT में कर्मचारियों की भर्ती को लेकर कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल को अपने कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रशासन से जुड़े फैसले खुद लेने की आजादी मिलनी चाहिए। सुनवाई में संविदा कर्मचारियों की नौकरी और खाली पदों का मुद्दा भी सामने आया।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में कर्मचारियों की कमी और भर्ती व्यवस्था का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुनवाई के दौरान कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो गए। गुरुवार, 29 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मंत्रालय के बढ़ते दखल पर नाराजगी जताई।
अदालत का कहना था कि ट्रिब्यूनल के रोजमर्रा के प्रशासन और कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े अधिकार उसके अध्यक्ष के पास होने चाहिए। मंत्रालय की तरफ से हर फैसले पर नियंत्रण रखने की कोशिश संस्था की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
कॉर्पोरेट मंत्रालय के कामकाज पर कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत के सामने NCLT में कर्मचारियों की कमी, बुनियादी सुविधाओं की स्थिति और निजी कंपनियों के जरिए होने वाली भर्तियों का मुद्दा रखा गया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय ट्रिब्यूनल के प्रशासन पर पूरा नियंत्रण रखना चाहता है। उन्होंने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। अदालत का मानना था कि NCLT और NCLAT जैसी संस्थाओं को अपना काम स्वतंत्र रूप से करने देना चाहिए।
पीठ ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के पास रहना जरूरी है। हालांकि, यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान की गई थी। मामले में अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
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छह साल से नौकरी कर रहे कर्मचारियों का क्या होगा?
मामले में संविदा कर्मचारियों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि NCLT में कर्मचारियों की भर्ती का जिम्मा एक निजी कंपनी को दिया गया है। नई व्यवस्था लागू होने पर पहले से काम कर रहे कई कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है। अरोड़ा ने अदालत को बताया कि कुछ कर्मचारियों को एक या दो नवंबर से काम छोड़ने के लिए कहा जा सकता है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो करीब छह साल से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनका कहना था कि इतने लंबे समय तक काम करने वाले कर्मचारियों को अचानक हटाना उचित नहीं होगा।
उन्होंने यह भी बताया कि संविदा कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों की तरह मकान किराया भत्ता और महंगाई भत्ता नहीं मिलता। इसके बावजूद वे लंबे समय से ट्रिब्यूनल का काम संभाल रहे हैं। अरोड़ा ने भर्ती नियमों का हवाला देते हुए कहा कि उनमें नियमितीकरण का प्रावधान है। ऐसे में कर्मचारियों को बिना उचित प्रक्रिया अपनाए हटाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ हो सकता है। उन्होंने मांग की कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष की मंजूरी के बिना किसी कर्मचारी की नौकरी समाप्त न की जाए।
निजी कंपनियों से भर्ती कराने पर भी उठे सवाल
कर्मचारियों की बात सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने निजी ठेकेदारों के जरिए होने वाली भर्ती पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि न्यायिक संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। केवल निजी कंपनी के माध्यम से नियुक्ति कर देने से यह जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। मुख्य न्यायाधीश ने मुंबई के एक पुराने मामले का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वहां संविदा कर्मचारी महत्वपूर्ण मूल दस्तावेज लेकर चले गए थे। इस मामले में पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ी थी।
अदालत ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति ऐसी व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, जिसमें ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष का प्रशासनिक नियंत्रण बना रहे। हालांकि, पीठ ने मौजूदा संविदा कर्मचारियों को नौकरी से हटाने पर तत्काल रोक नहीं लगाई। अदालत ने माना कि इस मामले को केवल कर्मचारियों की नौकरी तक सीमित रखने के बजाय पूरी भर्ती व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है।
NCLT में 253 पद खाली, नियमित भर्ती पर जोर
सुनवाई में कर्मचारियों की कमी के आंकड़े भी सामने आए। NCLT में प्रशासनिक कर्मचारियों के कुल 320 नियमित पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 67 पर कर्मचारी काम कर रहे हैं। बाकी 253 पद खाली पड़े हैं। इस स्थिति को देखते हुए अदालत ने फिलहाल दूसरे सरकारी विभागों से अनुभवी कर्मचारियों को प्रतिनियुक्ति पर लाने का सुझाव दिया। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से नियमित भर्ती कराने की बात कही गई। भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) या कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की मदद लेने का विकल्प भी रखा गया।
पीठ ने NCLT और NCLAT के अध्यक्षों से कहा कि वे अगले चार सप्ताह के भीतर कर्मचारियों, भवनों और दूसरी जरूरी सुविधाओं की मांग से जुड़ा प्रस्ताव तैयार करें। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को भी इन जरूरतों को सरकार के सामने रखने के लिए कहा गया है। अब इस मामले में आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। खासकर उन संविदा कर्मचारियों के लिए, जिनकी नौकरी पर खतरा बना हुआ है। अदालत भर्ती व्यवस्था में किस तरह के बदलाव का रास्ता तय करती है, इस पर भी नजर रहेगी।










