ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध में अमेरिका को बड़ा हवाई नुकसान हुआ है। 42 एयरक्राफ्ट और ड्रोन तबाह हो गए हैं। युद्ध पर भारी खर्च हुआ है और होर्मुज स्ट्रेट तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार प्रभावित हो रहा है।
ईरान/अमेरिका वॉर: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी तनाव को लेकर एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा है। अमेरिकी कांग्रेस से जुड़ी रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि ईरान के खिलाफ चलाए गए कथित ऑपरेशन ‘एपिक फ्यूरी’ में अमेरिका को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी सेना के कुल 42 एयरक्राफ्ट और ड्रोन या तो पूरी तरह नष्ट हो गए या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए।
F-35 समेत कई फाइटर जेट को नुकसान का दावा
रिपोर्ट में कहा गया है कि नुकसान झेलने वाले विमानों में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भी शामिल हैं। इनमें एक F-35 स्टील्थ फाइटर जेट, चार F-15E स्ट्राइक ईगल और एक A-10 थंडरबोल्ट-II शामिल बताए गए हैं।
इसके अलावा 11 अन्य सैन्य विमान भी या तो नष्ट हुए या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए होने का दावा किया गया है। हालांकि अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से विस्तृत रूप में नहीं की गई है।
ड्रोन फ्लीट को सबसे ज्यादा नुकसान
रिपोर्ट में सबसे बड़ा नुकसान ड्रोन कैटेगरी में बताया गया है। कुल 25 ड्रोन नष्ट या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने की बात कही गई है।
इनमें शामिल हैं:
- 24 MQ-9 रीपर ड्रोन
- 1 MQ-4C ट्राइटन ड्रोन
MQ-9 रीपर को अमेरिका का प्रमुख निगरानी और स्ट्राइक ड्रोन माना जाता है, जिसका उपयोग कई वैश्विक सैन्य अभियानों में किया जाता रहा है। ऐसे में इनकी क्षति को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2.81 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा युद्ध खर्च
रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे सैन्य अभियान में अमेरिका का कुल खर्च लगभग 2.81 लाख करोड़ रुपये (लगभग 33–34 अरब डॉलर) तक पहुंच गया है। यह खर्च सैन्य तैनाती, हथियारों के उपयोग, लॉजिस्टिक्स और ऑपरेशनल गतिविधियों पर हुआ बताया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह आंकड़े सही हैं तो यह हाल के वर्षों में अमेरिका के सबसे महंगे क्षेत्रीय सैन्य अभियानों में से एक हो सकता है।
ईरान में सत्ता परिवर्तन की कथित योजना का दावा
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका और इज़राइल की रणनीति केवल ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को कमजोर करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें राजनीतिक बदलाव यानी सत्ता परिवर्तन की योजना भी शामिल थी।

रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि पूर्व ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को संभावित नए नेतृत्व के रूप में देखा गया था। हालांकि इस दावे पर न तो अमेरिका और न ही इज़राइल ने आधिकारिक पुष्टि की है।
कथित तीन चरणों वाली रणनीति
रिपोर्ट में एक कथित योजना का भी जिक्र किया गया है, जिसमें तीन चरण बताए गए:
पहला चरण
तेज हवाई हमले, ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाना और क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा देना।
दूसरा चरण
देश में अराजकता जैसी स्थिति पैदा करना ताकि ईरानी सरकार के नियंत्रण को कमजोर दिखाया जा सके।
तीसरा चरण
तेल, गैस और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर दबाव डालकर राजनीतिक परिवर्तन की स्थिति तैयार करना।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भी उतार-चढ़ाव देखा गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत एक समय 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई।
विश्लेषकों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा बना हुआ है, क्योंकि दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से तेल परिवहन पर निर्भर है।
होर्मुज स्ट्रेट बना रणनीतिक केंद्र
ईरान और उसके आसपास के समुद्री मार्गों को लेकर तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 24 घंटों में दर्जनों तेल टैंकर और मालवाहक जहाजों ने ईरानी अनुमति से होर्मुज स्ट्रेट पार किया।
इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात (UAE) अपनी नई तेल पाइपलाइन परियोजना पर काम तेज कर रहा है, जिसका उद्देश्य होर्मुज पर निर्भरता कम करना है।
अमेरिका की कड़ी चेतावनी और राजनीतिक बयान
अमेरिकी प्रशासन की ओर से ईरान को लेकर सख्त रुख जारी है। व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान परमाणु समझौते की शर्तों पर सहमत नहीं होता है, तो उसे “आधुनिक इतिहास में अभूतपूर्व सैन्य कार्रवाई” का सामना करना पड़ सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान दिया है कि ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान हुआ है और अब आगे की कार्रवाई या समझौते का विकल्प खुला है।
अमेरिकी संसद में युद्ध शक्तियों पर बहस
अमेरिकी सीनेट में एक प्रस्ताव पारित किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियों को सीमित करने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी वोट दिया है।
यदि यह प्रस्ताव कानून बनता है, तो ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक होगी।
मानवीय सहायता और अंतरराष्ट्रीय चिंता
गाजा में मानवीय सहायता से जुड़े एक फाउंडेशन की फंडिंग और गतिविधियों की भी जांच शुरू हो गई है। आरोप है कि राहत वितरण के दौरान सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने क्षेत्र में मानवीय स्थिति को लेकर चिंता जताई है और संभावित खाद्य संकट की चेतावनी दी है।











