अमेरिका ने ईरान पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई, सुप्रीम लीडर बोले- ट्रम्प ने मजबूरी में किया समझौता

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्ति समझौते के बाद अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाई गई। ईरानी सुप्रीम लीडर ने कहा कि ट्रम्प ने ‘मजबूरी में’ यह समझौता किया।

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्ति समझौते के बाद अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटा दी गई। ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने कहा कि डोनाल्ड ट्रम्प ने दबाव और मजबूरी में यह समझौता किया। दोनों देशों के बीच आगे वार्ता जारी रहेगी।

वॉशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व में महीनों तक चले तनाव और सैन्य संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने क्षेत्रीय राजनीति को नई दिशा दे दी है। समझौते के लागू होते ही अमेरिका ने ईरान पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करने की घोषणा कर दी, जबकि ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस समझौते पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने "मजबूरी और दबाव" में आकर यह समझौता किया।

दोनों देशों के बीच हुए इस समझौते को मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि समझौते के कई पहलुओं को लेकर अभी भी राजनीतिक बहस जारी है और क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं।

अमेरिका ने हटाई नौसैनिक नाकेबंदी

समझौते के लागू होने के बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की कि राष्ट्रपति के निर्देशानुसार ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त कर दी गई है। इसके तहत अब ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले और वहां से निकलने वाले जहाजों की आवाजाही पर पहले जैसी रोक नहीं रहेगी।

हालांकि अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र में कुछ युद्धपोत और नौसैनिक संसाधन तैनात रहेंगे ताकि समझौते की शर्तों के पालन की निगरानी की जा सके और किसी भी संभावित सुरक्षा चुनौती का सामना किया जा सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार को राहत मिल सकती है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है।

खामेनेई की पहली सार्वजनिक प्रतिक्रिया

समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने पहली बार सार्वजनिक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक स्तर पर उनकी सोच इस समझौते के पक्ष में नहीं थी, लेकिन राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने उन्हें भरोसा दिलाया कि ईरान के राष्ट्रीय हितों और जनता के अधिकारों की पूरी रक्षा की जाएगी।

खामेनेई ने कहा कि उन्होंने समझौते को मंजूरी इसलिए दी क्योंकि उन्हें विश्वास दिलाया गया कि किसी भी बातचीत में ईरान की संप्रभुता और रणनीतिक हितों से समझौता नहीं किया जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष वार्ताएं जारी रह सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि ईरान अमेरिकी दृष्टिकोण या नीतियों को स्वीकार कर रहा है।

अमेरिका ने ईरान पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई, सुप्रीम लीडर बोले- ट्रम्प ने मजबूरी में किया समझौता

ट्रम्प पर साधा निशाना

अपने बयान में खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि ट्रम्प ने समझौता कराने के लिए हर संभव दबाव और कूटनीतिक साधनों का उपयोग किया।

ईरानी नेतृत्व का मानना है कि लंबे संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण अमेरिका पर भी समाधान खोजने का दबाव बढ़ रहा था। इसी संदर्भ में खामेनेई ने कहा कि समझौता किसी एक पक्ष की जीत नहीं बल्कि परिस्थितियों की आवश्यकता का परिणाम है।

हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इन टिप्पणियों पर सीधे प्रतिक्रिया नहीं दी है।

14 प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है समझौता

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता 14 प्रमुख बिंदुओं पर आधारित बताया जा रहा है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए खुला रखना है।

समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और अपने परमाणु कार्यक्रम को निर्धारित सीमाओं के भीतर रखेगा। इसके अलावा ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए लगभग 300 अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय कोष का प्रावधान भी शामिल है।

हालांकि अमेरिका को इस कोष में प्रत्यक्ष योगदान देना अनिवार्य नहीं होगा। आर्थिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और संस्थाओं की भागीदारी की संभावना जताई जा रही है।

60 दिनों में अंतिम समझौते का लक्ष्य

समझौते के तहत दोनों देशों ने अधिकतम 60 दिनों के भीतर एक व्यापक और स्थायी समझौते तक पहुंचने की प्रतिबद्धता जताई है। आवश्यकता पड़ने पर इस अवधि को दोनों पक्षों की सहमति से बढ़ाया भी जा सकता है।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार आने वाले हफ्तों में तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर कई दौर की बातचीत आयोजित की जाएगी। इन बैठकों में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में संभावित राहत, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी।

स्विट्जरलैंड में होगी अगली वार्ता

हालांकि औपचारिक हस्ताक्षर समारोह को रद्द कर दिया गया है, फिर भी अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधियों की स्विट्जरलैंड में बैठक होने की संभावना बनी हुई है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि समझौते के लागू होने के साथ ही वार्ता का नया चरण शुरू हो चुका है। उन्होंने संकेत दिया कि तकनीकी चर्चाओं के लिए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जल्द स्विट्जरलैंड जा सकता है।

व्हाइट हाउस ने भी पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखने की तैयारी की जा रही है।

अमेरिका में समझौते को लेकर राजनीतिक विवाद

इस समझौते को लेकर अमेरिका के भीतर भी मतभेद सामने आए हैं। कई रिपब्लिकन नेताओं ने इसकी आलोचना की है और इसे अमेरिकी विदेश नीति की बड़ी गलती बताया है।

आलोचकों का तर्क है कि समझौते से ईरान को आर्थिक राहत मिल सकती है जबकि उसके क्षेत्रीय प्रभाव को पूरी तरह सीमित नहीं किया गया है। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि इससे भविष्य में अन्य देश भी दबाव की रणनीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।

हालांकि ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते की सभी शर्तों का पालन करेगा।

इजराइल के साथ मतभेद भी उभरे

समझौते के बाद अमेरिका और इजराइल के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद भी सामने आए हैं। इजराइल के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने समझौते की आलोचना की है और इसे सुरक्षा दृष्टि से जोखिमपूर्ण बताया है।

इसके जवाब में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि क्षेत्रीय सुरक्षा केवल सैन्य कार्रवाई से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि दीर्घकालिक शांति के लिए कूटनीतिक समाधान आवश्यक हैं।

वेंस ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका अपने सहयोगियों का समर्थन जारी रखेगा, लेकिन सभी पक्षों को शांति प्रक्रिया का सम्मान करना होगा।

मध्य पूर्व की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौता आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व की राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति को प्रभावित कर सकता है। यदि अगले 60 दिनों में व्यापक समझौता सफलतापूर्वक तैयार हो जाता है, तो यह क्षेत्र में स्थिरता लाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक साबित हो सकता है।

हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इजराइल, हिज्बुल्लाह, क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। इसके बावजूद दोनों देशों का वार्ता की मेज पर बने रहना इस बात का संकेत है कि संघर्ष की जगह कूटनीति को प्राथमिकता देने की कोशिश की जा रही है।

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