अरावली पर्वतमाला को बचाने की लड़ाई के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा तैयार करने वाली हाई पावर कमेटी (HPC) को सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने की निर्धारित अंतिम तारीख बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया।
Aravalli Hills Supreme Court: अरावली पर्वतमाला की नई और सर्वमान्य परिभाषा तय करने की प्रक्रिया एक अहम चरण में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई पावर कमेटी (HPC) को सुझाव और आपत्तियां भेजने की समयसीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बार-बार समयसीमा बढ़ाने से प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक खिंच सकती है। अदालत ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि जिन लोगों के पास कोई महत्वपूर्ण आपत्ति या सुझाव है, वे अपनी बात कमेटी के सामने रख सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने HPC को अरावली के संरक्षण और भविष्य में खनन को नियंत्रित करने के लिए एक समान वैज्ञानिक परिभाषा तैयार करने का जिम्मा दिया है। कमेटी को अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त 2026 तक अदालत में सौंपनी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट रिपोर्ट और उससे जुड़े सुझावों पर आगे विचार करेगा।
क्यों महत्वपूर्ण है अरावली की नई परिभाषा?
अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक है। यह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, अरावली क्षेत्र मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल रिचार्ज, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अरावली में लंबे समय से अवैध खनन, भूमि परिवर्तन और अन्य मानवीय गतिविधियों को लेकर चिंता जताई जाती रही है। अलग-अलग राज्यों में अरावली की पहचान के अलग मानदंड होने के कारण संरक्षण और खनन नियंत्रण को लेकर कानूनी जटिलताएं भी पैदा हुईं। सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य ऐसी समान परिभाषा तैयार करना है, जिससे संरक्षण संबंधी नियमों को पूरे क्षेत्र में अधिक स्पष्ट तरीके से लागू किया जा सके।
100 मीटर वाली परिभाषा पर क्यों उठा विवाद?

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए ऐसी परिभाषा को मंजूरी दी थी, जिसमें स्थानीय भू-आकृति से कम से कम 100 मीटर ऊंची संरचनाओं को आधार माना गया था। इस फैसले के बाद पर्यावरणविदों और अन्य हितधारकों ने चिंता जताई कि इससे कई छोटे पहाड़ी भू-भाग संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं।
29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने नवंबर के फैसले को फिलहाल रोकते हुए इस पूरे मुद्दे पर नए सिरे से व्यापक विशेषज्ञ अध्ययन की जरूरत बताई। अदालत ने स्वतंत्र विशेषज्ञ राय, हितधारकों से परामर्श और प्रस्तावित परिभाषा के पर्यावरणीय प्रभाव का विस्तृत मूल्यांकन करने पर जोर दिया।
गुजरात के आदिवासी समुदाय ने क्या आपत्ति जताई?
11 अगस्त की समयसीमा बढ़ाने की मांग वरिष्ठ अधिवक्ता देबाशीष भरुका की ओर से की गई थी। उनका कहना था कि गुजरात के अरावली क्षेत्रों में रहने वाले कई आदिवासी समुदायों तक HPC की सार्वजनिक प्रक्रिया प्रभावी ढंग से नहीं पहुंची। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ऑनलाइन माध्यम से सुझाव मांगने की प्रक्रिया डिजिटल रूप से कम सक्षम या दूरदराज के समुदायों के लिए बाधा बन सकती है।
अरावली पर काम कर रहे कुछ पर्यावरण समूहों और स्थानीय समुदायों ने भी सार्वजनिक परामर्श की अवधि और पहुंच को लेकर सवाल उठाए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, HPC ने जुलाई में सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की थीं और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए 21 दिनों की अवधि निर्धारित की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने समय बढ़ाने से क्यों किया इनकार?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत न्यायिक आदेश के जरिए समयसीमा नहीं बढ़ाएगी। पीठ ने आशंका जताई कि समय बढ़ाने का इस्तेमाल कुछ हित समूह प्रक्रिया को लंबा खींचने के लिए कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले उसके काम की टुकड़ों में आलोचना करने के बजाय पूरी रिपोर्ट का इंतजार करना उचित होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों के लिए अपनी बात रखने का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है। अदालत ने संकेत दिया कि संबंधित पक्ष अपनी आपत्तियां और सुझाव कमेटी के समक्ष रख सकते हैं। कमेटी द्वारा किसी आपत्ति पर विचार नहीं किए जाने की स्थिति में संबंधित पक्ष आगे सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।












