सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दलील दी कि देशभर में विधानसभा अध्यक्षों द्वारा अयोग्यता से जुड़े मामलों पर फैसला लेने में देरी हो रही है, जिससे दल-बदल को बढ़ावा मिल सकता है।
नई दिल्ली: विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों में विधानसभा अध्यक्षों द्वारा फैसले में देरी के मुद्दे पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पश्चिम बंगाल के 10 बागी तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों से जुड़े मामले में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के लिए समय-सीमा तय करने की मांग की। हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के लिए समय-सीमा निर्धारित करने से पहले न्यायपालिका को भी यह देखना चाहिए कि वह खुद मामलों के निपटारे के लिए निर्धारित समय का कितना पालन करती है।
पश्चिम बंगाल के 10 विधायकों का मामला
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा के 10 विधायकों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, इन विधायकों के खिलाफ 8 जुलाई को अयोग्यता की याचिकाएं दायर की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश के तहत तीन महीने की अवधि 8 अक्टूबर को पूरी हो रही है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि विधानसभा अध्यक्ष इस समय-सीमा के भीतर क्या निर्णय लेते हैं।
सोमवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि विधानसभा अध्यक्ष Keisham Meghachandra Singh मामले में तय कानूनी सिद्धांतों और ढांचे के अनुरूप उचित निर्णय लेंगे। पीठ ने इस स्तर पर अध्यक्ष पर अविश्वास जताने का कोई कारण नहीं माना।
कपिल सिब्बल ने उठाया फैसलों में देरी का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने दलील दी कि विधायकों की अयोग्यता से जुड़े मामलों में देरी एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा है। उन्होंने पहले के शिवसेना मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में फैसला लंबा खिंचने से दल-बदल से जुड़े विवादों पर असर पड़ सकता है।सिब्बल का तर्क था कि यदि स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए स्पष्ट समय-सीमा दी जाए, तो संवैधानिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित रहने से रोका जा सकता है। उनका यह तर्क दल-बदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर की भूमिका और निर्णय लेने की समय-सीमा को लेकर चल रही व्यापक बहस से भी जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका को भी आत्ममंथन की बात कही

सिब्बल की दलील पर पीठ ने न्यायपालिका की अपनी कार्यप्रणाली का भी संदर्भ दिया। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि किसी दूसरी संवैधानिक संस्था को समय-सीमा के निर्देश देने से पहले अदालत को खुद भी “आईना” देखना चाहिए। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि ऐसे कई मामले हैं जिन्हें न्यायपालिका को तेजी से निपटाना चाहिए और इस मोर्चे पर अदालत से भी चूक होती है।
इस टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज में समयबद्धता की बात करते समय न्यायपालिका अपनी भूमिका और लंबित मामलों की स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहती है।
स्पीकर पर भरोसा जताया कोर्ट ने
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि उसके पास यह मानने का पर्याप्त आधार है कि विधानसभा अध्यक्ष संबंधित फैसले में पहले से स्थापित कानूनी सिद्धांतों से परिचित हैं। अदालत को उम्मीद है कि अध्यक्ष निर्धारित कानूनी ढांचे के भीतर उचित निर्णय लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे। यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब दल-बदल विरोधी कानून के तहत स्पीकर की भूमिका पर देशभर में कानूनी बहस जारी है।
जुलाई 2026 में भी कपिल सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची से जुड़े एक अलग मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी थी कि मौजूदा व्यवस्था में विलय के प्रावधान का इस्तेमाल अयोग्यता से बचने के लिए किया जा सकता है। उस मामले में अदालत ने केंद्र से जवाब मांगा था।










