सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिका पर अगले हफ्ते सुनवाई के लिए सहमति जताई, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा भारत निर्वाचन आयोग की शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं।
CEC: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज से जुड़ी एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह सुनवाई करेगा। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग के नाम पर कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या भागीदारी के बिना लिए गए। याचिकाकर्ता ने यह सवाल भी उठाया है कि संविधान और कानून के तहत निर्वाचन आयोग को मिले सामूहिक अधिकारों का इस्तेमाल क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले कर सकते हैं।
मामला मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने आया। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की, जिसके बाद अदालत ने इसे अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
राकेश कुमार सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की है। इसमें मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके अधिकारों का इस्तेमाल सामूहिक रूप से किया जाना चाहिए। याचिका में आरोप है कि आयोग के नाम पर कुछ निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना लिए गए।
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे करीब 14 मामलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि, इन दावों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।
SIR प्रक्रिया भी याचिका के केंद्र में
याचिका में मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े फैसलों और कदमों पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अगर SIR जैसे महत्वपूर्ण फैसले निर्वाचन आयोग के सामूहिक निर्णय के बजाय किसी एक पदाधिकारी के स्तर पर लिए गए हों, तो उनकी संवैधानिक वैधता की जांच जरूरी है।
याचिका में अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल किस तरीके से किया जाना चाहिए।
'Quo Warranto' की मांग क्या है?
याचिका में Quo Warranto यानी ‘अधिकार-पृच्छा’ रिट की मांग भी की गई है। इस तरह की याचिका में अदालत किसी सार्वजनिक पद पर अधिकार रखने वाले व्यक्ति से यह स्पष्ट करने को कह सकती है कि वह किस कानूनी अधिकार के आधार पर उस पद की शक्तियों का इस्तेमाल कर रहा है। राकेश कुमार सिंह की याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त से यह बताने की मांग की गई है कि उन्होंने किन संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत उन शक्तियों का इस्तेमाल किया, जिन्हें याचिकाकर्ता के अनुसार पूरे निर्वाचन आयोग में निहित माना जाना चाहिए।
इसके अलावा याचिका में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने से अंतरिम रूप से रोकने और संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच कराने जैसी राहतों की भी मांग की गई है।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
मामले में एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि चुनाव आयोग ने SIR से जुड़े फैसलों को लेकर अलग रुख रखा है। रिपोर्टों के अनुसार, आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित फैसले सभी चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे। आयोग ने यह भी कहा है कि चुनाव आयुक्तों के बीच अलग-अलग टिप्पणियां या आपत्तियां होना अपने आप में किसी फैसले के अंतिम रूप से असहमति वाला होने का प्रमाण नहीं है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई में याचिका में लगाए गए आरोपों के साथ-साथ निर्वाचन आयोग के रुख और संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होंगे।











