सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अरावली मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अवैध खनन से क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हो सकती है। अरावली क्षेत्र में खनन और उससे जुड़े मुद्दों की व्यापक और समग्र जांच के लिए एक्सपर्ट कमिटी का गठन किया जाएगा।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन और उससे होने वाली अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने खनन के मुद्दों की समग्र जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति (Expert Committee) गठित करने का आदेश दिया है। इस समिति को 4 हफ्ते के भीतर ऐसे विशेषज्ञों के नाम सुझाने होंगे, जो खनन और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अनुभव रखते हों।
सुप्रीम कोर्ट की हिदायतें
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि अरावली क्षेत्र में खनन से अपूर्व और स्थायी नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और कोर्ट सलाहकार के. परमेश्वर से कहा कि वे चार हफ्ते में ऐसे पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के नाम सुझाएं, जिन्हें खनन के क्षेत्र में विशेषज्ञता हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गठित कमेटी कोर्ट के निर्देशन और निगरानी में कार्य करेगी।

कमेटी का उद्देश्य और काम
एक्सपर्ट कमेटी का मुख्य कार्य होगा कि वह खनन के प्रभाव और नियंत्रण उपायों की व्यापक समीक्षा करे। कोर्ट ने विशेष रूप से कमेटी से यह सवाल उठाया कि:
- क्या पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के अंतराल वाले इलाकों में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है?
- यदि हां, तो इसके लिए सटीक मानक और नियम क्या होंगे ताकि पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता पर असर न पड़े?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर कमेटी की विशेषज्ञ रिपोर्ट में शामिल होंगे। रिपोर्ट तैयार होने के बाद ही खनन संबंधी किसी भी निर्णय पर अंतिम राय दी जाएगी।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केवल खनन तक ही सीमित नहीं रहते हुए प्रदूषण नियंत्रण पर भी जोर दिया। कोर्ट ने दिल्ली सरकार, नगर निगम और NCR के राज्यों की एजेंसियों से पूछा कि प्रदूषण कब तक कम किया जाएगा। साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण निगरानी संस्था (CAQM) के लॉन्ग टर्म उपायों को लागू करने की एक्शन टेकन रिपोर्ट 4 हफ्ते में पेश करने को कहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब कोई आपत्ति स्वीकार नहीं की जाएगी।
अरावली पहाड़ियों में खनन विवाद नए नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों पर खनन की अनुमति दी गई थी। इस आदेश के बाद पूरे देश में 100 मीटर की परिभाषा और खनन की अनुमति को लेकर विवाद बढ़ गया।











