अयोध्या में सर्किल रेट 83 हजार, PWD दे रहा 10 हजार: किसान हाईकोर्ट पहुंचे तो अफसरों को फटकार

अयोध्या में जमीन के सर्किल रेट और PWD के मुआवजे की दर में बड़ा अंतर सामने आया। किसान हाईकोर्ट पहुंचे तो अधिकारियों के रवैये पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।
अयोध्या में सर्किल रेट 83 हजार, PWD दे रहा 10 हजार: किसान हाईकोर्ट पहुंचे तो अफसरों को फटकार
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अयोध्या में सड़क निर्माण के लिए जमीन के मुआवजे को लेकर किसानों और सरकारी विभाग के बीच विवाद का मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन का सर्किल रेट करीब 83 हजार रुपये निर्धारित है, जबकि लोक निर्माण विभाग यानी PWD की ओर से अधिग्रहित जमीन के बदले करीब 10 हजार रुपये की दर बताई जा रही है। मुआवजे की दर में इस बड़े अंतर को लेकर किसानों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान मामले में सरकारी अधिकारियों के रवैये पर न्यायालय ने नाराजगी जताई और अधिकारियों को फटकार लगाई।

मामला जमीन के मूल्यांकन और उसके बदले किसानों को मिलने वाले मुआवजे से जुड़ा है। किसानों की मुख्य आपत्ति यह है कि जिस जमीन का सरकारी रिकॉर्ड में सर्किल रेट काफी अधिक है, उसी जमीन को सड़क निर्माण के लिए लेते समय कम दर पर मुआवजा कैसे निर्धारित किया जा सकता है। किसानों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में उन्हें उनकी जमीन के वास्तविक और निर्धारित मूल्य के अनुरूप उचित मुआवजा मिलना चाहिए।

अयोध्या में जमीन की कीमतों और सर्किल रेट में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव हुआ है। जून 2025 में अयोध्या में करीब आठ साल बाद सर्किल रेट में संशोधन किया गया था। अलग-अलग क्षेत्रों में जमीन की दरों में 30 से 200 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई थी। प्रशासन ने जमीन के इस्तेमाल और इलाके की स्थिति को दरों के निर्धारण का आधार बताया था।

ऐसे माहौल में जब अयोध्या में जमीन की सरकारी दरें भी पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी हैं, किसानों की ओर से मुआवजे को लेकर उठाए गए सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जमीन का सर्किल रेट केवल सामान्य खरीद-बिक्री के लिए निर्धारित न्यूनतम मूल्य से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में मुआवजे के निर्धारण की प्रक्रिया में भी जमीन के मूल्य और उसकी स्थिति से जुड़े कई कारकों को देखा जाता है।

किसानों की ओर से न्यायालय में रखी गई आपत्ति का केंद्र यही बताया जा रहा है कि एक तरफ जमीन का सर्किल रेट 83 हजार रुपये है और दूसरी तरफ PWD की ओर से करीब 10 हजार रुपये की दर पर भुगतान की बात सामने आई। किसानों के मुताबिक दोनों दरों के बीच इतना बड़ा अंतर उनकी जमीन के मूल्यांकन को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। उनका कहना है कि जमीन अधिग्रहित होने के बाद खेती या अन्य उपयोग से जुड़ी संभावनाएं समाप्त हो सकती हैं, इसलिए मुआवजे का निर्धारण नियमों और जमीन की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद सुनवाई के दौरान अधिकारियों से इस अंतर को लेकर जवाब मांगा गया। न्यायालय की ओर से अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताए जाने की बात सामने आई है। ऐसे मामलों में कोर्ट आम तौर पर संबंधित विभाग और प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कह सकता है कि भूमि का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया, किस नियम के तहत मुआवजे की दर तय हुई और किसानों की आपत्तियों पर विभाग ने क्या कार्रवाई की।

भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन के सही मूल्यांकन का होता है। किसी भी परियोजना के लिए जमीन लेने से पहले जमीन की प्रकृति, उपयोग, स्थान, आसपास का विकास, सड़क से दूरी, बाजार मूल्य, लागू सर्किल रेट और संबंधित सरकारी नियमों जैसे पहलुओं को देखा जाता है। इसके बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत मुआवजे का आकलन किया जाता है। इसलिए केवल एक दर के आधार पर पूरे मामले का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होता।

अयोध्या में जमीन के सर्किल रेट पहले भी किसानों और जमीन मालिकों के बीच चर्चा का विषय रहे हैं। 2025 में प्रशासन ने लंबे अंतराल के बाद सर्किल रेट में बदलाव किया था। कुछ क्षेत्रों में वृद्धि काफी अधिक रही थी, जबकि दूसरे इलाकों में अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी की गई।

इससे पहले भी अयोध्या में विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के लिए जमीन लेने के दौरान किसानों ने मुआवजे और जमीन के मूल्यांकन को लेकर आपत्तियां उठाई हैं। अलग-अलग परियोजनाओं में मुआवजा तय करने के नियम भी अलग परिस्थितियों के आधार पर लागू हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अयोध्या की कुछ परियोजनाओं से जुड़े पुराने मामलों में किसानों को सर्किल रेट के मुकाबले अधिक मुआवजा दिए जाने की व्यवस्था का उल्लेख भी सामने आया है।

वर्तमान मामले में किसानों की मांग का मूल आधार यही है कि उनकी जमीन की कीमत तय करते समय सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सर्किल रेट और जमीन की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसानों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि उससे उनकी खेती, आय और परिवार की आजीविका भी जुड़ी होती है। इसलिए भूमि अधिग्रहण के समय मिलने वाला मुआवजा उनके भविष्य पर सीधे असर डाल सकता है।

PWD की ओर से सड़क निर्माण के लिए जमीन लिए जाने की प्रक्रिया में भी संबंधित अधिनियम और सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। विभाग को यह तय करना होता है कि किस जमीन की कितनी आवश्यकता है और उसके अधिग्रहण या खरीद के लिए किस प्रक्रिया को अपनाया जाएगा। किसानों की ओर से आपत्ति होने पर प्रशासन और विभाग के स्तर पर उसका निस्तारण किया जाना भी जरूरी होता है।

हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बाद अब इस बात पर नजर रहेगी कि संबंधित विभाग जमीन के मूल्यांकन और मुआवजे की दर को लेकर न्यायालय के सामने क्या दस्तावेज रखता है। किसानों की ओर से भी जमीन के सर्किल रेट, राजस्व अभिलेख और अन्य संबंधित दस्तावेज अदालत के सामने रखे जा सकते हैं। इन्हीं दस्तावेजों और लागू नियमों के आधार पर अदालत मामले में आगे का रुख तय करेगी।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अयोध्या में पिछले कुछ वर्षों में सड़क, पर्यटन, आवास और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई परियोजनाओं के कारण जमीन से संबंधित गतिविधियां बढ़ी हैं। जमीन की कीमतों में बदलाव के बीच सरकारी परियोजनाओं के लिए भूमि लेने पर किसानों और विभागों के बीच मुआवजे को लेकर विवाद की संभावना भी बढ़ जाती है।

किसानों का कहना है कि यदि उनकी जमीन का सरकारी सर्किल रेट 83 हजार रुपये है तो करीब 10 हजार रुपये की दर से मुआवजा निर्धारित करने का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए। वहीं अंतिम रूप से यह तय होना अभी बाकी है कि संबंधित जमीन के अधिग्रहण पर कौन-सा कानूनी प्रावधान लागू होता है और उसी के तहत मुआवजे की गणना किस तरह की जानी चाहिए।

अदालत की फटकार के बाद अधिकारियों के सामने अब इस मामले में रिकॉर्ड और मूल्यांकन प्रक्रिया को स्पष्ट करने की जिम्मेदारी होगी। यदि किसानों की आपत्ति के मुताबिक मूल्यांकन में कोई विसंगति पाई जाती है तो संबंधित विभाग को उस पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। दूसरी ओर यदि विभाग के पास कम दर निर्धारित करने का वैधानिक आधार है तो उसे न्यायालय के सामने स्पष्ट करना होगा।

अयोध्या में जमीन के सर्किल रेट में हालिया बदलाव के बाद इस तरह के भूमि विवादों में सरकारी दर और बाजार मूल्य के बीच अंतर का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। प्रशासन ने 2025 में अलग-अलग इलाकों में जमीन के उपयोग और स्थान को ध्यान में रखते हुए नई दरें लागू की थीं।

फिलहाल किसानों और PWD के बीच मुआवजे की दर को लेकर विवाद न्यायालय के सामने है। किसानों की आपत्ति सर्किल रेट और प्रस्तावित मुआवजे के बीच बड़े अंतर पर केंद्रित है, जबकि इस अंतर का अंतिम कानूनी औचित्य संबंधित रिकॉर्ड और लागू नियमों के आधार पर ही तय होगा। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकारियों को फटकार लगाए जाने के बाद मामले में आगे की कार्रवाई और न्यायालय के निर्देश पर किसानों की नजर बनी हुई है।

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