बाढ़ पीड़ितों को देखकर भावुक हुईं एक्ट्रेस पाखी, बेगूसराय में जलजमाव के विरोध में ग्रामीणों ने फीता-केक काटा

बेगूसराय में बाढ़ और जलजमाव से लोगों की परेशानी बढ़ी है। एक्ट्रेस पाखी पीड़ितों को देखकर भावुक हुईं, वहीं ग्रामीणों ने केक काटकर विरोध जताया।
बाढ़ पीड़ितों को देखकर भावुक हुईं एक्ट्रेस पाखी, बेगूसराय में जलजमाव के विरोध में ग्रामीणों ने फीता-केक काटा
Photo Credit / Attribution: Google

बिहार में बाढ़ और जलजमाव की स्थिति लगातार लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। कई इलाकों में पानी घरों, सड़कों और खेतों तक पहुंच चुका है। बेगूसराय में भी जलजमाव से परेशान ग्रामीणों ने प्रशासन और जिम्मेदार विभागों का ध्यान अपनी समस्या की ओर खींचने के लिए अनोखे तरीके से विरोध दर्ज कराया। छौड़ाही प्रखंड की ऐजनी पंचायत के राजोपुर वार्ड नंबर एक में ग्रामीणों ने सड़क पर जमा पानी के बीच फीता काटकर और केक काटकर सांकेतिक रूप से सड़क को ‘स्विमिंग पूल’ घोषित कर दिया। ग्रामीणों का कहना था कि यह किसी उत्सव का कार्यक्रम नहीं, बल्कि लंबे समय से बनी जलनिकासी की समस्या के खिलाफ विरोध का तरीका है।

इसी बाढ़ प्रभावित माहौल के बीच पीड़ित लोगों से मिलने पहुंचीं एक्ट्रेस पाखी भी लोगों की स्थिति देखकर भावुक हो गईं। बाढ़ के पानी से घिरे परिवारों, जलजमाव से परेशान ग्रामीणों और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की स्थिति ने उन्हें झकझोर दिया। बाढ़ के दौरान सबसे बड़ी परेशानी उन परिवारों के सामने होती है जिनके घरों के आसपास लगातार पानी जमा रहता है और सामान्य आवागमन तक मुश्किल हो जाता है।

बेगूसराय में जलजमाव को लेकर ग्रामीणों का फीता और केक काटकर विरोध सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। सड़क पर जमा पानी को ग्रामीणों ने प्रतीकात्मक तौर पर ‘स्विमिंग पूल’ बताते हुए केक काटा। उनका कहना था कि जब लंबे समय तक सड़क से पानी नहीं हटाया जा रहा है तो इसे स्विमिंग पूल ही मान लेना बेहतर है। विरोध का यह तरीका प्रशासन पर सीधे तौर पर सवाल उठाने के साथ-साथ लोगों की परेशानी को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का प्रयास था।

स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, राजोपुर वार्ड नंबर एक में बारिश के बाद पक्की सड़क पर कई जगह घुटने तक पानी जमा हो गया है। हालात ऐसे बताए गए कि सड़क से गुजरने वाली बाइक के साइलेंसर तक पानी में डूबने लगे। बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और अन्य राहगीरों को इसी पानी के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, करीब 500 लोगों की आबादी जलजमाव से प्रभावित है और लगभग 50 घरों में पानी प्रवेश करने की स्थिति बन गई है।

लंबे समय तक पानी जमा रहने से सिर्फ आवागमन की परेशानी नहीं होती, बल्कि आसपास गंदगी और मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ जाता है। ग्रामीणों ने मच्छरजनित और जलजनित बीमारियों को लेकर भी चिंता जताई है। पानी में लगातार आवाजाही करने से बच्चों और बुजुर्गों के लिए परेशानी और बढ़ जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था नहीं होने के कारण बारिश होते ही सड़क और आसपास के इलाकों में पानी जमा हो जाता है।

बाढ़ के समय ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ी चुनौती आवागमन की होती है। सड़कें पानी में डूब जाने पर बाजार, अस्पताल, स्कूल और दूसरे जरूरी स्थानों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। जिन परिवारों में छोटे बच्चे, बुजुर्ग या बीमार लोग हैं, उनके लिए स्थिति और गंभीर हो जाती है। कई जगह लोगों को जरूरी सामान लेने के लिए भी पानी से होकर गुजरना पड़ता है।

बेगूसराय में ग्रामीणों द्वारा किया गया विरोध इसी परेशानी को सामने लाता है। आमतौर पर सड़क का निर्माण लोगों को आवागमन की सुविधा देने के लिए किया जाता है, लेकिन यदि वही सड़क लंबे समय तक पानी में डूबी रहे तो उसका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों ने इसी स्थिति पर व्यंग्य करते हुए फीता काटकर ‘स्विमिंग पूल’ का उद्घाटन किया और केक काटकर अपना विरोध जताया।

इस विरोध के पीछे ग्रामीणों की नाराजगी केवल एक-दो दिन के जलजमाव को लेकर नहीं बताई गई है। उनका कहना है कि लंबे समय से जलनिकासी की समस्या बनी हुई है। बारिश के बाद पानी सड़क पर जमा हो जाता है और पर्याप्त निकासी नहीं होने के कारण काफी समय तक बना रहता है। इससे लोगों को रोजमर्रा के कामों के लिए परेशानी उठानी पड़ती है।

वहीं, बिहार के व्यापक बाढ़ संकट की बात करें तो राज्य के कई जिलों में नदियों के जलस्तर और बैकवाटर का असर दिखाई दे रहा है। कहीं गंगा का पानी खेतों में पहुंच रहा है तो कहीं स्थानीय नदियों और जलनिकासी व्यवस्था के कारण गांवों और सड़कों पर पानी जमा है। नालंदा के सरमेरा टाल क्षेत्र में भी गंगा के बैकवाटर ने किसानों की मुश्किल बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पेंदी और पुरानी इसुआ गांव के इलाके में करीब 200 बीघे धान की फसल पांच फीट तक पानी में डूब गई थी।

नालंदा के इस इलाके की स्थिति यह बताती है कि बाढ़ का प्रभाव सिर्फ नदी के किनारे बसे गांवों तक सीमित नहीं रहता। गंगा का बैकवाटर निचले इलाकों में फैलकर खेतों को भी प्रभावित कर सकता है। एक तरफ जिले की कई स्थानीय नदियों का जलस्तर शांत हुआ, तो दूसरी तरफ सरमेरा के टाल क्षेत्र में गंगा के लौटते पानी ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी।

बाढ़ और जलजमाव से सबसे ज्यादा असर किसानों और ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी पर पड़ता है। खेतों में पानी भरने से फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। किसान बीज, खाद, मजदूरी, जुताई और रोपाई पर पहले ही पैसा खर्च कर चुके होते हैं। ऐसे में फसल के डूब जाने का मतलब केवल अनाज का नुकसान नहीं बल्कि पूरी कृषि लागत और आने वाली आय पर असर होता है।

नालंदा के सरमेरा में किसानों ने फसल क्षति का सर्वे कराने और उचित मुआवजा देने की मांग भी उठाई है। स्थानीय स्तर पर प्रशासन से प्रभावित इलाकों का आकलन कराने की मांग की गई है।

उधर, बेगूसराय में जलजमाव से परेशान ग्रामीणों की समस्या का दूसरा पहलू स्वास्थ्य से जुड़ा है। लंबे समय तक पानी जमा रहने से मच्छरों की संख्या बढ़ सकती है और गंदगी के कारण संक्रमण का खतरा भी बढ़ता है। ग्रामीणों ने मच्छरों के बढ़ते प्रकोप के साथ सांप-बिच्छू जैसे जीवों के खतरे की भी बात कही है। ऐसे इलाकों में जलनिकासी के साथ-साथ नियमित सफाई और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी भी जरूरी हो जाती है।

एक्ट्रेस पाखी का बाढ़ पीड़ितों को देखकर भावुक होना भी इसी मानवीय पहलू को सामने लाता है। प्राकृतिक आपदा के दौरान आंकड़ों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उन परिवारों की स्थिति होती है जो अपने घरों और रोजमर्रा की जिंदगी के बीच पानी से जूझते हैं। किसी परिवार के लिए बाढ़ का मतलब घर में पानी भरना, सामान खराब होना, बच्चों की पढ़ाई रुकना, काम-धंधे पर असर और आने-जाने में परेशानी हो सकता है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच समन्वय भी बेहद जरूरी हो जाता है। जलस्तर बढ़ने की स्थिति में लोगों को समय पर जानकारी देना, संवेदनशील स्थानों की निगरानी करना, जरूरत पड़ने पर राहत शिविर की व्यवस्था करना और प्रभावित परिवारों तक भोजन तथा जरूरी सामग्री पहुंचाना राहत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

बेगूसराय के राजोपुर में ग्रामीणों का अनोखा प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि लोग अब जलजमाव की समस्या को लेकर लंबे समय तक इंतजार करने के बजाय अपनी आवाज अलग-अलग तरीकों से उठाने लगे हैं। फीता काटना और केक काटना देखने में भले ही हास्यपूर्ण या प्रतीकात्मक लगे, लेकिन इसके पीछे ग्रामीणों की वास्तविक परेशानी और नाराजगी छिपी है। सड़क पर जमा पानी के बीच यह प्रदर्शन जिम्मेदार विभागों से स्थायी समाधान की मांग के रूप में देखा जा रहा है।

बिहार में बाढ़ की स्थिति कई जगह अलग-अलग रूप में सामने आ रही है। कहीं नदी का पानी गांवों में पहुंच रहा है, कहीं खेत डूब रहे हैं और कहीं बारिश के बाद जलनिकासी नहीं होने से सड़कें तालाब में बदल रही हैं। यही वजह है कि बाढ़ से निपटने के लिए केवल नदी के जलस्तर पर निगरानी पर्याप्त नहीं है। स्थानीय जलनिकासी व्यवस्था, तटबंध, ग्रामीण सड़कें और निचले इलाकों की स्थिति पर भी लगातार नजर रखने की जरूरत होती है।

नालंदा के सरमेरा क्षेत्र में बाद की रिपोर्टों में स्थिति और गंभीर होने की जानकारी सामने आई। 11 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, पेंदी, सदहा और पुरानी इसुआ के खंधों में पानी 8 से 10 फीट तक पहुंच गया और 350 बीघे से अधिक धान की फसल डूबने की बात सामने आई। जमींदारी बांधों पर खतरे को देखते हुए प्रशासन ने संवेदनशील स्थानों पर सैंडबैग लगाने और 24 घंटे निगरानी के निर्देश दिए।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बाढ़ की स्थिति तेजी से बदल सकती है। किसी इलाके में एक दिन पानी कम होता दिखाई दे सकता है, जबकि दूसरे इलाके में बैकवाटर या तटबंध पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए स्थानीय स्तर पर लगातार निगरानी और समय रहते कार्रवाई बेहद जरूरी है।

बेगूसराय के लोगों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि जलजमाव से जल्द राहत मिले और पानी की निकासी की स्थायी व्यवस्था हो। ग्रामीणों का कहना है कि हर बार बारिश के बाद यदि सड़कें पानी में डूब जाती हैं तो केवल अस्थायी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। नाले, पुलिया और जलनिकासी की व्यवस्था को व्यवस्थित करना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।

बाढ़ पीड़ितों की परेशानी को देखकर भावुक हुईं पाखी और बेगूसराय के ग्रामीणों का अनोखा विरोध, दोनों घटनाएं अलग-अलग तरीके से एक ही बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचती हैं—बाढ़ और जलजमाव केवल पानी का संकट नहीं है, बल्कि यह लोगों के घर, स्वास्थ्य, रोजगार, खेती और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है। ऐसे में राहत के साथ-साथ स्थायी समाधान पर भी ध्यान देना जरूरी है।

फिलहाल प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने चुनौती प्रभावित इलाकों से पानी की निकासी, लोगों की सुरक्षा और किसानों की फसल क्षति का आकलन करने की है। जहां जलस्तर बढ़ रहा है, वहां लगातार निगरानी की जरूरत है और जहां जलजमाव लंबे समय से बना हुआ है, वहां स्वास्थ्य एवं स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। ग्रामीणों की मांग है कि उनकी समस्या को केवल तत्काल राहत के तौर पर नहीं बल्कि स्थायी जलनिकासी समाधान के साथ देखा जाए।

Leave a comment