भागलपुर में विक्रमशिला सेतु बंद होने के बाद गंगा के रास्ते आवागमन के लिए शुरू की गई फेरी सेवा के बीच शुक्रवार सुबह बियाडा घाट पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हैरान करने वाली घटना सामने आई। घाट पर पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और एसडीआरएफ की टीम की मौजूदगी के बावजूद एक पशुपालक दो भैंसों को देसी नाव पर लादकर गंगा की मुख्य धारा में निकल गया। जिस क्षेत्र को सुरक्षा कारणों से नियंत्रित और प्रतिबंधित रखा गया था, वहां से नाव के निकल जाने के बाद जब एसडीआरएफ की टीम की नजर उस पर पड़ी तो जवानों ने मोटरबोट से उसका पीछा शुरू किया। करीब 10 मिनट की मशक्कत के बाद नाव को बीच धारा में रोककर वापस घाट पर लाया गया।
यह घटना ऐसे समय हुई है जब विक्रमशिला सेतु बंद होने के कारण भागलपुर और नवगछिया के बीच आवागमन के लिए बियाडा घाट को बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक केंद्र बनाया गया है। सेतु बंद होने के बाद गंगा पार जाने वाले यात्रियों के लिए बड़े जहाज और अन्य जलयान संचालित किए जा रहे हैं। प्रशासन की ओर से घाट पर सुरक्षा व्यवस्था के लिए अस्थायी थाना, नियंत्रण कक्ष, पुलिस बल और एसडीआरएफ की टीम तैनात की गई है। इसके बावजूद पशुपालक का दो भैंसों के साथ नाव लेकर प्रतिबंधित क्षेत्र से निकल जाना सुरक्षा व्यवस्था के लिए सवाल खड़ा करता है।
जानकारी के अनुसार शुक्रवार सुबह पशुपालक अपनी दो भैंसों को लेकर बियाडा घाट पहुंचा। उसने दोनों मवेशियों को देसी नाव पर चढ़ाया और फिर नाव को गंगा की ओर रवाना कर दिया। उस समय घाट पर प्रशासनिक अधिकारी, पुलिसकर्मी और एसडीआरएफ के जवान मौजूद थे। इसके बावजूद नाव घाट से निकलकर गंगा की मुख्य धारा में पहुंच गई। जब नाव किनारे से काफी दूर निकल गई, तब एसडीआरएफ के जवानों की नजर उस पर पड़ी।
गंगा में उस समय तेज बहाव और उफान की स्थिति को देखते हुए नाव पर दो भारी मवेशियों को ले जाना जोखिम भरा माना गया। एसडीआरएफ की टीम ने तत्काल कार्रवाई शुरू की और मोटरबोट से देसी नाव का पीछा किया। जवानों ने नाव के पास पहुंचकर उसे रोका और पशुपालक को वापस घाट की ओर आने के लिए कहा। लगभग 10 मिनट की कार्रवाई के बाद नाव को सुरक्षित रूप से वापस बियाडा घाट लाया गया। इसके बाद दोनों भैंसों को भी एसडीआरएफ की निगरानी में नाव से उतारा गया।
घटना के बाद अधिकारियों ने पशुपालक से पूछताछ की। उससे यह जानने की कोशिश की गई कि उसने प्रतिबंधित क्षेत्र से मवेशियों को नाव पर लादकर ले जाने का प्रयास क्यों किया और क्या उसके पास इसके लिए कोई अनुमति थी। पूछताछ के दौरान पशुपालक ने अधिकारियों को बताया कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि फेरी सेवा वाले क्षेत्र से मवेशियों को नाव पर ले जाने के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता है।
अधिकारियों ने उसकी इस सफाई को स्वीकार करते हुए उसे कड़ी चेतावनी दी। उसे स्पष्ट रूप से कहा गया कि फेरी रूट या प्रतिबंधित घाट क्षेत्र से दोबारा मवेशियों को नाव पर लादकर ले जाने का प्रयास किया गया तो मवेशियों को जब्त किया जा सकता है और पशुपालक तथा नाविक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना ने बियाडा घाट की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, विक्रमशिला सेतु बंद होने के बाद यहां रोजाना बड़ी संख्या में यात्रियों और बाइक सवारों की आवाजाही हो रही है। पहले ही दिन 20 हजार से अधिक यात्रियों ने जलमार्ग के जरिए गंगा पार की थी। ऐसे में घाट और उसके आसपास किसी भी अनधिकृत नाव का संचालन सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मामला बन जाता है।
फेरी सेवा शुरू होने से पहले प्रशासन की ओर से घाट पर सुरक्षा के लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं। बियाडा घाट पर अस्थायी थाना बनाया गया है और करीब 60 पुलिसकर्मियों की चौबीस घंटे की शिफ्ट में तैनाती की गई है। इसके अलावा दो पुलिस इंस्पेक्टरों को थाना प्रभारी की भूमिका दी गई है और प्रत्येक शिफ्ट में अतिरिक्त पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी रखी गई है। प्रशासन ने यात्रियों की निगरानी और भीड़ प्रबंधन के लिए संयुक्त नियंत्रण कक्ष भी बनाया है।
इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच देसी नाव का गंगा की मुख्य धारा में निकल जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी में इस समय सामान्य से अधिक तेज बहाव बताया जा रहा है। प्रशासन पहले ही तेज धारा को देखते हुए सामान्य नावों के संचालन को लेकर सावधानी बरत रहा था। सेतु बंद होने से पहले वैकल्पिक जल परिवहन की योजना बनाते समय भी बड़े और सुरक्षित जलयानों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।
गंगा में मवेशियों को लेकर छोटी नाव चलाना कई स्तरों पर जोखिम पैदा कर सकता है। भैंस जैसे बड़े पशु नाव में अचानक हिलने-डुलने लगें तो नाव का संतुलन प्रभावित हो सकता है। अगर नाव तेज धारा में फंस जाए या पशु घबरा जाएं तो नाव पलटने की स्थिति भी बन सकती है। यही वजह है कि एसडीआरएफ की टीम ने नाव को बीच धार में देखते ही तत्काल उसका पीछा किया और उसे वापस घाट पर लाया।
इस घटना को उस समय की फेरी सेवा की व्यापक व्यवस्था से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। विक्रमशिला सेतु के बंद होने के बाद प्रशासन ने बियाडा घाट और नवगछिया के जाह्नवी चौक घाट के बीच जलमार्ग को सक्रिय किया है। करीब चार किलोमीटर के इस जलमार्ग पर बड़े जहाजों का परिचालन किया जा रहा है। पहले दिन आठ प्रमुख जहाजों ने लगभग 20 ट्रिप लगाए और 20 हजार से अधिक यात्रियों के गंगा पार करने की जानकारी सामने आई।
हालांकि गंगा की तेज धारा के कारण दोनों दिशाओं में जहाजों के यात्रा समय में काफी अंतर देखने को मिला। जाह्नवी चौक से बियाडा आने वाले जहाजों को धारा का साथ मिलने के कारण अपेक्षाकृत कम समय लगा, जबकि बियाडा से जाह्नवी चौक जाने वाले जहाजों को विपरीत धारा का सामना करना पड़ा। इसी वजह से 'स्वामी परमहंस' को बियाडा से जाह्नवी चौक पहुंचने में दो घंटे सात मिनट लगे।
ऐसे में बियाडा घाट पर सुरक्षा की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। यात्रियों के साथ-साथ बाइक, मालवाहक सामान और अन्य आवश्यक परिवहन भी इसी वैकल्पिक जलमार्ग पर निर्भर हो रहे हैं। यदि अनधिकृत छोटी नावें भी उसी क्षेत्र से आवाजाही करने लगें तो बड़े जहाजों और छोटी नावों के बीच टक्कर या अन्य दुर्घटना की आशंका बढ़ सकती है।
घटना के बाद घाट पर मौजूद लोगों के बीच भी चर्चा शुरू हो गई कि इतनी कड़ी निगरानी के बावजूद पशुपालक दो भैंसों के साथ नाव लेकर नदी में कैसे निकल गया। स्थानीय लोगों के लिए यह घटना इसलिए भी चिंता का विषय बनी क्योंकि फेरी सेवा का संचालन अभी शुरू ही हुआ है और प्रशासन की ओर से सुरक्षा को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए हैं।
दूसरी ओर, फेरी सेवा के पहले दिन यात्रियों को कई अन्य परेशानियों का भी सामना करना पड़ा। एक रिपोर्ट के अनुसार घाट पर कुछ यात्रियों को जहाज के इंतजार में लंबा समय बिताना पड़ा। अंतिम फेरे के बाद करीब 200 यात्री पीछे रह गए, जिसके बाद उन्होंने घाट पर हंगामा भी किया। एक जहाज में तकनीकी खराबी आने की वजह से भी परिचालन प्रभावित हुआ था।
इस पूरी स्थिति के बीच प्रशासन के सामने चुनौती केवल यात्रियों को गंगा पार कराने की नहीं है, बल्कि घाट की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह नियंत्रित रखने की भी है। फेरी सेवा के संचालन क्षेत्र में कौन-सी नाव चल सकती है, कौन-सी नाव प्रतिबंधित है, मवेशियों या अन्य सामान के परिवहन की अनुमति किसे मिलेगी और यात्रियों की आवाजाही किस रास्ते से होगी, इन सभी बिंदुओं पर स्पष्ट निगरानी जरूरी है।
बियाडा घाट पर यात्रियों के लिए जहाज सेवा शुरू होने के बाद प्रशासन ने पैदल यात्रियों के लिए इसे निशुल्क रखा है। बाइक और व्यावसायिक कार्गो के लिए निर्धारित शुल्क की व्यवस्था की गई है। घाट पर अस्थायी थाना और पुलिस बल की तैनाती का उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करने के साथ-साथ सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
इस घटना से यह भी स्पष्ट हुआ कि घाट पर केवल मुख्य जेट्टी या जहाज चढ़ने वाले स्थान की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। आसपास के उन हिस्सों पर भी नजर रखना जरूरी है जहां से छोटी नावें पानी में उतर सकती हैं। यदि किसी पशुपालक या स्थानीय नाविक को नदी पार मवेशी ले जाने की आवश्यकता है तो उसके लिए अलग और सुरक्षित व्यवस्था निर्धारित करनी होगी, ताकि वह मुख्य फेरी मार्ग में प्रवेश न करे।
प्रशासन ने घटना के बाद निगरानी और कड़ी करने की बात कही है। घाट के प्रवेश और नाव रवानगी वाले बिंदुओं पर अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत महसूस की गई है। सुरक्षा एजेंसियों की मौजूदगी के बावजूद हुई इस घटना के बाद आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रतिबंधित क्षेत्र में अनधिकृत नावों की आवाजाही रोकने के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जाते हैं।
पशुपालक को फिलहाल कड़ी चेतावनी देकर छोड़े जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि दोबारा ऐसा प्रयास करने पर मवेशियों को जब्त करने के साथ पशुपालक और नाविक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। इस चेतावनी का उद्देश्य अन्य लोगों को भी यह संदेश देना है कि फेरी सेवा के लिए निर्धारित क्षेत्र में बिना अनुमति किसी तरह का नाव परिचालन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
विक्रमशिला सेतु बंद रहने की अवधि में बियाडा घाट भागलपुर के लिए महत्वपूर्ण परिवहन केंद्र बना रहेगा। ऐसे में यहां सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत रखना जरूरी होगा। यात्रियों की संख्या अधिक होने, बड़े जहाजों के संचालन और गंगा की तेज धारा के बीच छोटी नावों की अनधिकृत आवाजाही किसी गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।
शुक्रवार की घटना में एसडीआरएफ ने समय रहते नाव को बीच धारा में रोक लिया और दोनों भैंसों समेत पशुपालक को सुरक्षित वापस घाट पर पहुंचा दिया। इस वजह से संभावित दुर्घटना टल गई। लेकिन इस घटना ने यह जरूर दिखा दिया कि गंगा में फेरी सेवा संचालित करने के साथ-साथ घाट के आसपास के पूरे क्षेत्र की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
अब प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि आने वाले दिनों में यात्रियों की बढ़ती संख्या के बीच घाट पर व्यवस्था सुचारु रहे और कोई अनधिकृत नाव मुख्य जलमार्ग में प्रवेश न करे। विक्रमशिला सेतु बंद होने के कारण फेरी सेवा पर निर्भरता बढ़ी है, इसलिए सुरक्षा में छोटी सी चूक भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती है। बियाडा घाट पर दो भैंसों को लेकर नाव के बीच धारा में पहुंचने की घटना इसी सुरक्षा चुनौती की ओर इशारा करती है।











