भारत-अमेरिका डील का असर, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर बढ़ी बेचैनी

भारत-अमेरिका ट्रेड डील से भारतीय निर्यात को बढ़त। टैरिफ घटने से बांग्लादेश को RMG सेक्टर में अमेरिकी बाजार हिस्सेदारी खोने का डर सता रहा है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तहत भारतीय सामान पर टैरिफ घटने से बांग्लादेश में चिंता बढ़ गई है। बांग्लादेश को डर है कि रेडीमेड गारमेंट सेक्टर में अमेरिका में उसकी बाजार हिस्सेदारी भारत के पक्ष में जा सकती है।

World News: भारत-अमेरिका ट्रेड डील के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामान पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। बांग्लादेश को डर है कि अगर उसे भारत जैसी या उससे बेहतर शर्तें नहीं मिलीं, तो वह अमेरिका में अपनी बाजार हिस्सेदारी खो देगा।

रेडीमेड गारमेंट सेक्टर पर सबसे बड़ा खतरा

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक रेडीमेड गारमेंट (RMG) एक्सपोर्ट पर निर्भर है। अमेरिका को होने वाले बांग्लादेशी निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इसी सेक्टर से आता है। अगर भारतीय गारमेंट्स पर कम टैरिफ लागू होता है और बांग्लादेश को राहत नहीं मिलती, तो अमेरिकी खरीदार भारत की ओर रुख कर सकते हैं। यही चिंता बांग्लादेश को अमेरिका के साथ जल्दबाजी में डील करने के लिए मजबूर कर रही है।

अमेरिका ने पहले लगाया था भारी टैरिफ

यह पूरा मामला अप्रैल 2025 में शुरू हुआ था, जब वाशिंगटन ने बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद जुलाई में बातचीत के जरिए टैरिफ घटाकर 35 प्रतिशत किया गया। अगस्त में इसे और कम कर 20 प्रतिशत कर दिया गया। अब 9 फरवरी को होने वाली डील से उम्मीद जताई जा रही है कि टैरिफ को और घटाकर 15 प्रतिशत तक लाया जा सकता है।

नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर पहले ही साइन

2025 के मध्य में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अमेरिका के साथ एक औपचारिक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट साइन किया था। इसके तहत टैरिफ और व्यापार से जुड़ी सभी बातचीत को गोपनीय रखने का वादा किया गया। इस एग्रीमेंट का कोई भी ड्राफ्ट न जनता के सामने आया, न संसद में चर्चा हुई और न ही उद्योग जगत से सलाह ली गई।

डील में शामिल अमेरिकी शर्तें

इस प्रस्तावित ट्रेड डील में अमेरिका की कई अहम शर्तें शामिल बताई जा रही हैं। पहली शर्त है कि बांग्लादेश को चीन से इंपोर्ट कम करना होगा और उसकी जगह अमेरिका से मिलिट्री इंपोर्ट बढ़ाना होगा। दूसरी शर्त यह है कि अमेरिकी सामान बांग्लादेश में बिना किसी रुकावट के प्रवेश कर सके।

अमेरिकी स्टैंडर्ड और सर्टिफिकेशन अनिवार्य

डील के तहत बांग्लादेश को अमेरिकी स्टैंडर्ड और सर्टिफिकेशन को बिना सवाल स्वीकार करना होगा। इसका मतलब यह होगा कि बांग्लादेश अपने नियमों और जांच प्रक्रियाओं को सीमित कर देगा। खास तौर पर अमेरिका की गाड़ियों और ऑटो पार्ट्स के इंपोर्ट पर किसी तरह का इंस्पेक्शन नहीं किया जाएगा। वाशिंगटन चाहता है कि उसकी गाड़ियों को बांग्लादेशी बाजार में आसान एंट्री मिले।

पारदर्शिता की कमी पर उठे सवाल

प्राइवेट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन सेंटर फॉर पॉलिसी डायलॉग (CPD) के फेलो देवप्रिया भट्टाचार्य ने इस डील को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यह ट्रेड एग्रीमेंट पूरी तरह अपारदर्शी है। इसके फायदे और नुकसान पर विचार करने का कोई मौका जनता या उद्योग जगत को नहीं मिला।

नई सरकार पर पड़ेगा डील का बोझ

विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि यह डील एक अंतरिम सरकार द्वारा की जा रही है, इसलिए इसके परिणामों की जिम्मेदारी आने वाली चुनी हुई सरकार को उठानी पड़ेगी। अगर यह समझौता बांग्लादेश के हितों के खिलाफ साबित होता है, तो राजनीतिक और आर्थिक दबाव नई सरकार पर बढ़ेगा।

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