भारत में महिला आरक्षण कानून लागू: संसद में 33% सीटें महिलाओं के लिए, परिसीमन पर छिड़ी नई बहस

केंद्र सरकार ने संसद में महिला आरक्षण कानून लागू किया, संसद में 33% सीट आरक्षण पर बहस तेज। थरूर ने परिसीमन को लेकर दक्षिण राज्यों के साथ अन्याय बताया है ।

केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण अधिनियम 2023 लागू कर संसद में महिलाओं को 33% आरक्षण का रास्ता साफ किया। लोकसभा में इस पर बहस जारी है, जबकि विपक्ष ने परिसीमन और लागू करने के समय पर सवाल उठाए हैं।

नई दिल्ली: भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने ‘महिला आरक्षण अधिनियम-2023’ को आधिकारिक रूप से लागू कर दिया है। यह कानून संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है।

सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह कानून 16 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो गया है। इसे पहले सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान पारित किया गया था।

क्या है महिला आरक्षण कानून?

‘महिला आरक्षण अधिनियम-2023’ का उद्देश्य देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। इसके तहत लोकसभा और विधानसभा की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

हालांकि, यह आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा। इसे लागू करने के लिए परिसीमन (Delimitation) और नई जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किया जाएगा।

भारत में महिला आरक्षण कानून लागू: संसद में 33% सीटें महिलाओं के लिए, परिसीमन पर छिड़ी नई बहस

कब से लागू होगा आरक्षण?

सरकार के अनुसार, महिलाओं को 33% आरक्षण का लाभ 2026-27 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही मिलेगा।

इसका मतलब है कि यह व्यवस्था संभवतः 2034 के बाद ही पूरी तरह लागू हो पाएगी।

यदि सरकार चाहती है कि यह आरक्षण 2029 के आम चुनाव से ही लागू हो, तो इसके लिए अतिरिक्त संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराना होगा।

संसद में जारी है बहस

इस मुद्दे पर Lok Sabha में लगातार दूसरे दिन भी चर्चा जारी है। पहले दिन करीब 13 घंटे तक बहस चली।

आज भी विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता इस कानून और उससे जुड़े परिसीमन मुद्दे पर अपने-अपने विचार रख रहे हैं। शाम 4 बजे इस पर मतदान होने की संभावना है।

परिसीमन को लेकर उठे सवाल

कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने इस कानून के साथ जुड़े परिसीमन मुद्दे पर चिंता जताई है।

उन्होंने कहा कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करने से उन राज्यों को अधिक लाभ मिल सकता है, जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है।

थरूर के अनुसार, यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जैसे दक्षिण भारत के राज्य।

विपक्ष का आरोप: जल्दबाजी में लागू किया गया कानून

विपक्षी दलों का आरोप है कि जब संसद में इस विषय पर चर्चा जारी है, तब कानून को इतनी जल्दी लागू करना उचित नहीं है।

हालांकि, सरकार का कहना है कि कानून लागू करने की तारीख तय करने का अधिकार उसके पास है और यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है।

विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं

समाजवादी पार्टी के नेता Akhilesh Yadav ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन परिसीमन के जरिए राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

वहीं, DMK सांसद Kanimozhi ने इसे केंद्र सरकार की राजनीतिक रणनीति बताया और कहा कि राज्यों के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कानून महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने के लिए आवश्यक है और यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक ऐतिहासिक पहल है।

भारत में अब तक संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहा है। इस कानून के लागू होने से भविष्य में महिला नेताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

चुनौतियां और आगे का रास्ता

हालांकि, इस कानून के पूर्ण कार्यान्वयन में कई चुनौतियां भी हैं। परिसीमन, जनगणना और राजनीतिक सहमति जैसे मुद्दे इसकी राह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि राजनीतिक दल अपने स्तर पर महिलाओं को टिकट देने और नेतृत्व में अवसर देने के लिए कितनी प्रतिबद्धता दिखाते हैं।

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