बिहार में मेडिकल शिक्षा और रिसर्च को लेकर चौंकाने वाले आरोप सामने आए हैं। दावा है कि कुछ डॉक्टरों और मेडिकल संस्थानों से जुड़े लोगों के बीच ऐसी व्यवस्था चल रही है, जिसमें पैसे लेकर रिसर्च के लिए मरीजों का फर्जी डेटा तैयार कराया जाता है। आरोप के मुताबिक करीब 50 हजार रुपये में 50 मरीजों की रिसर्च तैयार कर दी जाती है। सबसे गंभीर दावा यह है कि कुछ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल छात्रों को वास्तविक मरीजों पर काम किए बिना ही रिसर्च पूरी करने में मदद मिलती है और इस तरह उनकी MS जैसी डिग्री की शैक्षणिक आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह दावा सामने आया है, लेकिन किसी खास डॉक्टर, कॉलेज या व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले आधिकारिक जांच और दस्तावेजों की पुष्टि जरूरी होगी। बिहार में पहले भी फर्जी मेडिकल डिग्री से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं, जिससे मेडिकल शिक्षा की निगरानी और प्रमाणिकता पर सवाल उठते रहे हैं।
बताया जा रहा है कि मेडिकल रिसर्च तैयार कराने का यह कथित नेटवर्क उन छात्रों और डॉक्टरों को निशाना बनाता है जिन्हें पोस्टग्रेजुएट डिग्री के दौरान शोध कार्य पूरा करना होता है। सामान्य तौर पर मेडिकल शिक्षा में रिसर्च केवल कागज तैयार करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके लिए मरीजों से संबंधित वास्तविक और सत्यापित आंकड़े, उचित शोध पद्धति, नैतिक स्वीकृति, डेटा विश्लेषण और निष्कर्ष की वैज्ञानिक जांच जरूरी होती है।
आरोप है कि इसी पूरी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए एक ऐसा कथित सिस्टम विकसित हो गया है, जिसमें वास्तविक मरीजों पर पर्याप्त काम किए बिना ही आंकड़े तैयार कर दिए जाते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह केवल शैक्षणिक नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मेडिकल रिसर्च की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सबसे ज्यादा चर्चा उस कथित मॉडल की है जिसमें 50 हजार रुपये लेकर 50 मरीजों का रिसर्च डेटा तैयार करने की बात कही जा रही है। यानी रिसर्च करने वाले छात्र को खुद मरीजों की पहचान, केस हिस्ट्री, जांच रिपोर्ट और फॉलोअप जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती। दावा है कि पैसे के बदले पूरा डेटा तैयार रूप में उपलब्ध कराया जाता है, जिसे शोध में इस्तेमाल किया जा सकता है।
अगर किसी शोध में मरीजों का डेटा वास्तविक नहीं है तो उस रिसर्च से निकाले गए निष्कर्ष भी भरोसेमंद नहीं माने जा सकते। मेडिकल रिसर्च का उद्देश्य किसी बीमारी, उपचार या सर्जिकल प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिक जानकारी विकसित करना होता है। फर्जी आंकड़ों के आधार पर तैयार रिसर्च इस उद्देश्य को ही कमजोर कर देती है।
मामले का सबसे गंभीर पहलू शवों और सर्जिकल प्रशिक्षण से जुड़ा दावा है। एक प्रोफेसर के हवाले से यह आरोप सामने आया है कि कुछ छात्र बिना वास्तविक डेडबॉडी पर चीरा लगाए भी MS की डिग्री पूरी कर लेते हैं। यदि यह दावा किसी संस्थान में प्रमाणित होता है तो यह मेडिकल प्रशिक्षण की गुणवत्ता को लेकर बेहद गंभीर सवाल होगा, क्योंकि सर्जिकल विशेषज्ञता में व्यावहारिक प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण स्थान होता है।
MS यानी Master of Surgery जैसी पोस्टग्रेजुएट डिग्री में केवल किताबों और लिखित परीक्षा के आधार पर विशेषज्ञ तैयार नहीं होते। छात्रों को संबंधित विभाग में क्लिनिकल और सर्जिकल अनुभव भी हासिल करना होता है। इसलिए यदि कोई छात्र आवश्यक व्यावहारिक प्रशिक्षण के बिना डिग्री हासिल कर लेता है तो इसका असर भविष्य में मरीजों के इलाज की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
फर्जी रिसर्च का एक और संभावित असर मेडिकल जर्नल और अकादमिक रिकॉर्ड पर पड़ता है। यदि गलत डेटा के आधार पर पेपर प्रकाशित हो जाए तो वह भविष्य के शोधकर्ताओं को भी गलत दिशा में ले जा सकता है। किसी दवा, उपचार पद्धति या सर्जिकल तकनीक के बारे में गलत निष्कर्ष आगे की रिसर्च में इस्तेमाल होने लगें तो समस्या और गंभीर हो सकती है।
मेडिकल रिसर्च में मरीजों की गोपनीयता और सहमति भी महत्वपूर्ण होती है। किसी मरीज के मेडिकल रिकॉर्ड का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। यदि बिना मरीज की जानकारी या वास्तविक इलाज के डेटा तैयार किया जाता है तो यह नैतिकता के स्तर पर भी गंभीर मामला बन सकता है।
इस कथित फर्जी रिसर्च इंडस्ट्री में कई स्तरों पर लोगों की भूमिका होने की आशंका जताई जा रही है। इसमें रिसर्च तैयार करने वाले लोग, डेटा उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति, छात्रों से संपर्क कराने वाले बिचौलिए और संस्थान से जुड़े लोग शामिल हो सकते हैं। हालांकि किसी की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
यदि पैसे लेकर रिसर्च तैयार कराने का आरोप सही साबित होता है तो जांच एजेंसियों को यह भी देखना होगा कि भुगतान किस माध्यम से किया जाता था। बैंक ट्रांसफर, UPI, नकद लेनदेन या किसी अन्य माध्यम से पैसे दिए गए या नहीं, इसकी जानकारी डिजिटल रिकॉर्ड से मिल सकती है।
इसी तरह यह भी जांचना जरूरी होगा कि कथित तौर पर तैयार किए गए 50 मरीजों के रिकॉर्ड में वास्तव में वे मरीज मौजूद थे या नहीं। अस्पताल के रजिस्टर, ओपीडी रिकॉर्ड, भर्ती रिकॉर्ड, ऑपरेशन थिएटर रजिस्टर और पैथोलॉजी रिपोर्ट से डेटा का मिलान किया जा सकता है। यदि रिसर्च में दर्ज मरीजों का अस्पताल के रिकॉर्ड में कोई अस्तित्व नहीं मिलता है तो फर्जीवाड़े का मजबूत संकेत मिल सकता है।
कथित रिसर्च में शामिल मरीजों के मोबाइल नंबर और पते भी जांच का हिस्सा बन सकते हैं। यदि एक ही नंबर कई मरीजों के नाम पर इस्तेमाल हुआ है या एक ही पता अलग-अलग मरीजों के रिकॉर्ड में दर्ज है तो इससे डेटा की सत्यता पर सवाल उठ सकते हैं।
इसी तरह ऑपरेशन और सर्जिकल प्रशिक्षण से जुड़े रिकॉर्ड भी जांचे जा सकते हैं। यदि किसी छात्र ने निर्धारित संख्या में सर्जरी या प्रैक्टिकल प्रशिक्षण पूरा करने का दावा किया है तो संबंधित अस्पताल के रिकॉर्ड से उसकी पुष्टि की जा सकती है।
मेडिकल कॉलेजों में होने वाली रिसर्च के लिए आम तौर पर शोध प्रोटोकॉल और नैतिक मानकों का पालन आवश्यक होता है। मरीजों से जुड़े अध्ययन में संस्थागत स्तर पर नैतिक स्वीकृति और निर्धारित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण होता है। इसलिए यदि फर्जी मरीजों या फर्जी डेटा का इस्तेमाल हुआ है तो यह कई स्तरों पर नियमों के उल्लंघन का मामला बन सकता है।
बिहार में मेडिकल डिग्री से जुड़े फर्जीवाड़े के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। 2020 में मुजफ्फरपुर में जांच के दौरान 50 डॉक्टरों की BHMS डिग्री फर्जी पाए जाने की खबर प्रकाशित हुई थी। ऐसे मामलों के सामने आने से मेडिकल शिक्षा में दस्तावेजों और योग्यता की जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
वहीं, 2025 में पटना से जुड़े एक मामले में फर्जी मेडिकल डिग्री बेचने और वास्तविक डिग्री को पैथोलॉजी लैब के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल करने के आरोपों की रिपोर्ट भी सामने आई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि मेडिकल क्षेत्र में फर्जी दस्तावेज और अकादमिक अनियमितताओं की समस्या को केवल एक संस्थान या एक तरह के फर्जीवाड़े तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
लेकिन मौजूदा मामले में फर्जी रिसर्च से जुड़े आरोपों की गंभीरता अलग है, क्योंकि यहां सीधे मेडिकल शिक्षा और भविष्य में डॉक्टर बनने वाले छात्रों के प्रशिक्षण पर सवाल उठ रहे हैं। यदि कोई छात्र वास्तविक रिसर्च के बिना डिग्री प्राप्त करता है तो वह विशेषज्ञता के उस स्तर तक पहुंच सकता है जिसके लिए उसे आवश्यक प्रशिक्षण मिला ही नहीं।
इसका सबसे बड़ा असर मरीजों पर पड़ सकता है। मरीज डॉक्टर की डिग्री और विशेषज्ञता पर भरोसा करके इलाज कराते हैं। यदि डिग्री हासिल करने की प्रक्रिया में ही गंभीर अनियमितता हो तो मरीज को यह पता लगाना मुश्किल होता है कि संबंधित डॉक्टर ने वास्तव में आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त किया है या नहीं।
ऐसे आरोपों के बीच मेडिकल कॉलेजों के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच की जरूरत महसूस होती है। खासकर उन शोध प्रबंधों की जांच की जा सकती है जिनमें बड़ी संख्या में मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया है। रिसर्च में दर्ज मरीजों को अस्पताल के मूल रिकॉर्ड से मिलाने पर वास्तविकता सामने आ सकती है।
सिर्फ पुराने रिकॉर्ड की जांच ही पर्याप्त नहीं होगी। जिन छात्रों ने हाल के वर्षों में MS या अन्य पोस्टग्रेजुएट डिग्री पूरी की है, उनके शोध प्रबंध, केस रिकॉर्ड और सर्जिकल लॉगबुक का भी ऑडिट किया जा सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि दस्तावेजों में दर्ज गतिविधियां वास्तव में हुई थीं या केवल कागजों पर पूरी की गईं।
अगर जांच में फर्जी मरीज, फर्जी डेटा या फर्जी सर्जिकल रिकॉर्ड मिलते हैं तो संबंधित छात्रों के साथ-साथ उन्हें तैयार करने और सत्यापित करने वाले लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है। संस्थागत स्तर पर जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी होगा।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत या आरोप लगाने वाले लोगों के पास किस तरह के दस्तावेज हैं। रिसर्च की कॉपी, मरीजों की सूची, भुगतान का रिकॉर्ड, चैट, ईमेल या अन्य दस्तावेज आरोपों की पुष्टि या खंडन करने में मदद कर सकते हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि आरोपों को जांच के जरिए सत्यापित किया जाए। बिना जांच किसी डॉक्टर या मेडिकल कॉलेज को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि 50 हजार रुपये में फर्जी मरीजों का डेटा तैयार करने और बिना आवश्यक प्रशिक्षण के डिग्री पूरी कराने जैसे आरोप सही पाए जाते हैं तो मेडिकल शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधार और सख्त कार्रवाई की जरूरत होगी।
मेडिकल शिक्षा में डिग्री केवल एक कागज नहीं होती। इसके साथ मरीजों की सुरक्षा और डॉक्टर की विशेषज्ञता जुड़ी होती है। इसलिए रिसर्च और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में किसी भी तरह की धोखाधड़ी का असर लंबे समय तक पड़ सकता है।
अब निगाह इस बात पर है कि संबंधित संस्थानों और नियामक अधिकारियों की ओर से इन आरोपों पर क्या कार्रवाई की जाती है। यदि रिकॉर्ड की जांच शुरू होती है तो इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि कितनी रिसर्च वास्तविक मरीजों पर आधारित थीं और कितने मामलों में डेटा की विश्वसनीयता संदिग्ध है।
कुल मिलाकर बिहार में मेडिकल रिसर्च को लेकर सामने आए ये आरोप बेहद गंभीर हैं। दावा है कि करीब 50 हजार रुपये लेकर 50 मरीजों की फर्जी रिसर्च तैयार की जाती है और कुछ छात्रों को वास्तविक सर्जिकल प्रशिक्षण के बिना MS डिग्री की आवश्यकताएं पूरी कराने का रास्ता मिलता है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है, लेकिन यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह मेडिकल शिक्षा, रिसर्च की विश्वसनीयता और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मामला बन सकता है। मेडिकल कॉलेजों के रिसर्च रिकॉर्ड, मरीजों के दस्तावेज और छात्रों की सर्जिकल ट्रेनिंग का स्वतंत्र ऑडिट इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।









