BRICS Summit 2026: आतंकवाद के खिलाफ बड़ा संकल्प, UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता पर समर्थन

BRICS Summit 2026 में आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता और वैश्विक संस्थानों में सुधार पर जोर दिया गया। UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी को भी समर्थन मिला

ब्रिक्स समिट 2026 आज यानी शनिवार (12 सितंबर 2026) से शुरू हो रहा है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस शिखर सम्मेलन के दौरान कई अहम समझौतों और घोषणाओं की उम्मीद है। समिट के तहत चार प्रमुख स्तंभों—लचीलापन, इनोवेशन, सहयोग और स्थिरता—पर 50 से अधिक ठोस और व्यवहारिक नतीजे सामने आए हैं।

BRICS Summit 2026: भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से कई महत्वपूर्ण और ठोस परिणाम सामने आने की उम्मीद है। सम्मेलन में आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने, बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने और वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाएंगे। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को समर्थन मिलने की भी उम्मीद है।

भारतीय अधिकारियों के अनुसार, भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में 50 से अधिक ठोस परिणामों पर काम किया गया है। इनमें कई फ्रेमवर्क, एक्शन प्लान और सहयोग से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया को चार प्रमुख प्राथमिकताओं—लचीलापन (Resilience), नवाचार (Innovation), सहयोग (Cooperation) और स्थिरता (Sustainability)—के आधार पर आगे बढ़ाया गया है।

आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख

शिखर सम्मेलन के संभावित प्रमुख परिणामों में आतंकवाद की स्पष्ट और कड़ी निंदा शामिल है। भारत लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देता रहा है। ब्रिक्स मंच के जरिए आतंकवाद के सभी स्वरूपों के खिलाफ साझा प्रतिबद्धता को मजबूत करना भारत की अध्यक्षता की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहा है।

इसके साथ ही वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और प्रभावी बनाने की दिशा में भी चर्चा होने की संभावना है। भारत संयुक्त राष्ट्र सहित प्रमुख बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की मांग करता रहा है। इसी संदर्भ में UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए समर्थन भी सम्मेलन के महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणामों में शामिल हो सकता है।

पश्चिम एशिया पर मतभेद बड़ी चुनौती

हालांकि, शिखर सम्मेलन से पहले पश्चिम एशिया की स्थिति को लेकर ब्रिक्स देशों के बीच मतभेद एक चुनौती बने हुए हैं। विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अलग-अलग रुख के कारण साझा घोषणा-पत्र को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक भी पश्चिम एशिया के मुद्दे पर व्यापक सहमति वाले संयुक्त बयान के बिना समाप्त हुई थी। इसके बावजूद भारतीय सरकारी सूत्रों को उम्मीद है कि पूरे साल चली बातचीत और भारत की अध्यक्षता को मिले व्यापक समर्थन के कारण शिखर सम्मेलन सकारात्मक परिणामों के साथ समाप्त होगा।

भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में करीब 400 बैठकें आयोजित कर सदस्य देशों के बीच संवाद और सहमति बनाने पर जोर दिया है। अधिकारियों का मानना है कि इस प्रक्रिया से ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग मुद्दों पर सहयोग को आगे बढ़ाने में मदद मिली है।

ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती

भारत ने ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान खुद को ग्लोबल साउथ के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले देश के रूप में पेश किया है। विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े मुद्दों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावी स्थान दिलाना भारत की प्राथमिकताओं में रहा है। शिखर सम्मेलन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बहुपक्षवाद को मजबूत करने पर केंद्रित सत्र से होगी। इसमें बदलती वैश्विक व्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विकासशील देशों की भूमिका जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

भारत का जोर इस बात पर रहा है कि ब्रिक्स को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित न रखकर वैश्विक चुनौतियों पर संवाद और व्यावहारिक सहयोग का प्रभावी मंच बनाया जाए। विभिन्न मंत्रिस्तरीय बैठकों और एजेंसियों के बीच हुए समझौतों को इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

30 से ज्यादा शहरों में हुए कार्यक्रम

भारत सरकार के अनुसार, 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता को एक व्यापक राष्ट्रीय प्रयास के रूप में संचालित किया गया। केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा उद्योग, शिक्षा जगत, अनुसंधान संस्थानों, युवाओं, नागरिक समाज और अन्य समूहों को इस प्रक्रिया में शामिल किया गया। अध्यक्षता से जुड़े कार्यक्रम देश के 30 से अधिक शहरों में आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य ब्रिक्स सहयोग को नई दिल्ली तक सीमित रखने के बजाय देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाना और अलग-अलग क्षेत्रों की भागीदारी सुनिश्चित करना था।

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