कावेरी जल विवाद फिर गरमाया: तमिलनाडु CM विजय पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, कर्नाटक पर लगाया पानी रोकने का आरोप

कावेरी जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कर्नाटक पर तय हिस्से का पानी नहीं छोड़ने का आरोप

कावेरी जल बंटवारे को लेकर एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद बढ़ गया है। तमिलनाडु सरकार ने सोमवार (3 अगस्त) को सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए कर्नाटक पर कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के आदेशों का कथित उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।

नई दिल्ली: दक्षिण भारत के सबसे लंबे समय से चले आ रहे अंतरराज्यीय जल विवादों में से एक कावेरी नदी जल बंटवारा मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। तमिलनाडु सरकार ने कर्नाटक पर कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के निर्देशों का पालन नहीं करने का आरोप लगाते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। राज्य सरकार ने मांग की है कि अदालत कर्नाटक को तमिलनाडु के हिस्से का पानी निर्धारित मात्रा और समय सीमा के भीतर छोड़ने का निर्देश दे।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब कावेरी बेसिन में मानसूनी गतिविधियां तेज हैं और दोनों राज्यों में कृषि गतिविधियों के लिए जल उपलब्धता एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। तमिलनाडु का कहना है कि उसे निर्धारित हिस्से के अनुरूप पानी नहीं मिल रहा है, जिससे किसानों और सिंचाई व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

मुख्यमंत्री विजय के निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार

तमिलनाडु सरकार के अनुसार, मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने राज्य प्रशासन को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का निर्देश दिया। सरकार का आरोप है कि कर्नाटक ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण और कावेरी जल विनियमन समिति द्वारा जारी आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया है। राज्य का कहना है कि कावेरी जल विवाद के समाधान के लिए स्थापित संस्थागत व्यवस्था के तहत जारी निर्देश बाध्यकारी हैं और उनका पालन सभी संबंधित राज्यों को करना चाहिए। ऐसे में यदि किसी राज्य द्वारा निर्धारित जलराशि जारी नहीं की जाती है, तो इससे जल बंटवारे की पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है।

क्या है विवाद की पृष्ठभूमि?

कावेरी जल विवाद फिर गरमाया: तमिलनाडु CM विजय पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, कर्नाटक पर लगाया पानी रोकने का आरोप

कावेरी नदी कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। नदी के जल बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद चलता रहा है। कई बार यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक तनाव का कारण भी बना है। वर्तमान विवाद की शुरुआत तब हुई जब कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) ने 28 जुलाई 2026 को कर्नाटक को निर्देश दिया कि वह कृष्णराज सागर (KRS) और काबिनी जलाशयों से पानी छोड़कर 29 जुलाई से 12 अगस्त 2026 के बीच बिलिगुंडलू माप केंद्र पर प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक जल प्रवाह सुनिश्चित करे।

इसके बाद 30 जुलाई को आयोजित कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) की 54वीं आपात बैठक में भी इस निर्णय को मंजूरी प्रदान की गई। तमिलनाडु का आरोप है कि इन आदेशों के बावजूद अपेक्षित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा गया।

तमिलनाडु का दावा: अधिक पानी मिलने का है अधिकार

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि वर्तमान जलवैज्ञानिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए उसे निर्धारित मात्रा से अधिक जल मिलना चाहिए। राज्य का तर्क है कि कृष्णराज सागर और काबिनी जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों में इस वर्ष अच्छी बारिश हुई है, जिससे जल भंडारण में पर्याप्त वृद्धि हुई है।सरकार के अनुसार, उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तमिलनाडु को आनुपातिक व्यवस्था के तहत बिलिगुंडलू में लगभग 26.954 टीएमसी (थाउजेंड मिलियन क्यूबिक फीट) पानी मिलने का अधिकार है। 

यह मात्रा प्राधिकरण द्वारा निर्देशित 4.536 टीएमसी जलराशि से भी काफी अधिक बताई जा रही है। तमिलनाडु का कहना है कि जब जल उपलब्धता पर्याप्त है, तब निर्धारित हिस्से का पानी छोड़ने में कोई व्यावहारिक बाधा नहीं होनी चाहिए।

किसानों और सिंचाई पर पड़ सकता है असर

कावेरी नदी का पानी तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों में कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धान सहित कई प्रमुख फसलें इस नदी के जल पर निर्भर हैं। यदि समय पर पानी नहीं पहुंचता, तो खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसी कारण राज्य सरकार ने अदालत से शीघ्र हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि किसानों को सिंचाई के लिए आवश्यक जल उपलब्ध कराया जा सके और कृषि गतिविधियां प्रभावित न हों।

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