CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई की मांग, शिक्षकों और संसाधनों की कमी पर उठे सवाल

CBSE Three Language Policy: सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई की मांग की गई है। याचिका में शिक्षकों और आवश्यक संसाधनों की कमी

सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के उस नियम के खिलाफ दायर याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई करने की अपील की गई, जिसमें कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया गया है।

नई दिल्ली: भारत में शिक्षा नीति को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा कक्षा 9 के छात्रों के लिए लागू की गई तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई की मांग सुप्रीम कोर्ट में की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नई व्यवस्था को लागू करने के लिए पर्याप्त शिक्षक, पाठ्यपुस्तकें और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जिससे लाखों छात्रों और स्कूलों को व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला?

मामला CBSE द्वारा जारी उस सर्कुलर से जुड़ा है, जिसके तहत 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होना आवश्यक है। यह नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के बहुभाषी शिक्षा दृष्टिकोण का हिस्सा मानी जा रही है। सरकार और शिक्षा संस्थानों का तर्क है कि इससे छात्रों में भाषाई विविधता की समझ विकसित होगी और देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूती मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई सुनवाई?

मंगलवार को याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष कहा कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, इसलिए मामले पर जल्द निर्णय आवश्यक है। वकील ने अदालत को बताया कि कई स्कूलों में नई नीति को लागू करने के लिए पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। 

इसके अलावा, आवश्यक पाठ्यपुस्तकों और अध्ययन सामग्री की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उनका तर्क था कि बिना तैयारी के नीति लागू करने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालत मामले पर विचार करेगी।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्तियां

याचिकाओं में दावा किया गया है कि तीन-भाषा नीति लागू करने की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक और कानूनी प्रश्न अनुत्तरित हैं। मुख्य आपत्तियां इस प्रकार हैं:

  • पर्याप्त भाषा शिक्षकों की कमी
  • कई क्षेत्रों में पाठ्यपुस्तकों का अभाव
  • छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव
  • विदेशी भाषा चुनने की सीमित स्वतंत्रता
  • शिक्षा के अधिकार से जुड़े संभावित प्रश्न

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भाषा सीखना महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी नीति को लागू करने से पहले आवश्यक बुनियादी ढांचा सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

केंद्र, CBSE और NCERT का पक्ष

दूसरी ओर केंद्र सरकार, CBSE और NCERT ने अदालत में दाखिल अपने जवाबों में इस नीति का समर्थन किया है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य भारत की भाषाई विरासत को संरक्षित करना और छात्रों को बहुभाषी कौशल से सशक्त बनाना है। संस्थानों के अनुसार तीन-भाषा ढांचा विद्यार्थियों को विभिन्न भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों से जोड़ने में मदद करेगा। सरकारी पक्ष ने यह भी कहा है कि यह नीति किसी एक भाषा को थोपने के लिए नहीं बल्कि भाषाई विविधता को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है।

तीन-भाषा नीति में क्या प्रावधान हैं?

CBSE के 15 मई 2026 के सर्कुलर के अनुसार:

  • कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा।
  • तीनों भाषाओं में कम से कम दो भारतीय भाषाएं होना जरूरी है।
  • विदेशी भाषा चुनने की अनुमति होगी, लेकिन उससे पहले दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन आवश्यक होगा।
  • नियम 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हो चुका है।

इस नीति का उद्देश्य छात्रों में बहुभाषी क्षमता विकसित करना और उन्हें भारतीय भाषाई परंपराओं से जोड़ना बताया गया है। तीन-भाषा नीति लंबे समय से भारत में चर्चा और विवाद का विषय रही है। समर्थकों का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा छात्रों के बौद्धिक विकास और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि विभिन्न राज्यों की भाषाई और शैक्षणिक परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना एक समान व्यवस्था लागू करना व्यावहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।

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