इलाहाबाद विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चिरौंजी से ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी विकसित की है। शुरुआती शोध में यह तकनीक कैंसर, बैक्टीरिया, फंगस और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियों के खिलाफ संभावनाएं दिखाती है।
प्रयागराज: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी डिग्री कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने चिरौंजी के पौधे की मदद से पर्यावरण-अनुकूल ग्रीन नैनो टेक्नोलॉजी विकसित की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रयोगशाला स्तर पर विकसित यह तकनीक भविष्य में चिकित्सा, कृषि और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई नए उपयोगों का आधार बन सकती है।
चिरौंजी से तैयार किए गए ग्रीन नैनोपार्टिकल्स
शोधकर्ताओं ने चिरौंजी के पौधे से प्राप्त लाभकारी कवक की सहायता से जिंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल्स तैयार किए हैं। इस प्रक्रिया में किसी भी विषैले रसायन का उपयोग नहीं किया गया, जिससे यह तकनीक पारंपरिक नैनोपार्टिकल निर्माण विधियों की तुलना में अधिक सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल मानी जा रही है।
वैज्ञानिकों ने 'सोल-जेल' तकनीक के साथ प्राकृतिक जैविक अर्क का उपयोग कर पूरी निर्माण प्रक्रिया को कम लागत वाली और हरित बनाया। तैयार किए गए नैनोपार्टिकल्स का आकार लगभग 17 नैनोमीटर पाया गया, जिससे उनकी जैविक सक्रियता अधिक प्रभावी मानी जा रही है।
शुरुआती परीक्षणों में मिले उत्साहजनक परिणाम
शोध के दौरान इन नैनोपार्टिकल्स ने प्रयोगशाला परीक्षणों में फ्री-रेडिकल्स को निष्क्रिय करने की क्षमता दिखाई। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से जुड़े फ्री-रेडिकल्स कई गंभीर बीमारियों, जैसे कैंसर, गठिया, अल्जाइमर और समय से पहले बुढ़ापे से जुड़े होते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह अभी शुरुआती शोध है और इसे किसी प्रत्यक्ष इलाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
परीक्षणों में इन नैनोपार्टिकल्स ने ई-कोलाई और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा जैसे बैक्टीरिया के खिलाफ भी प्रभावी परिणाम दिखाए। इसके अलावा, फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम फंगस की वृद्धि को लगभग 60 प्रतिशत तक नियंत्रित करने की क्षमता भी दर्ज की गई।
चिकित्सा और कृषि में बढ़ सकती हैं संभावनाएं
शोधकर्ताओं का मानना है कि आगे के विस्तृत अध्ययन और क्लिनिकल परीक्षण सफल रहने पर इस तकनीक का उपयोग एंटी-बैक्टीरियल दवाओं, मेडिकल कोटिंग, क्रीम, चिकित्सा उपकरणों, जल शोधन प्रणाली और कृषि क्षेत्र के लिए पर्यावरण-अनुकूल फफूंदनाशकों के विकास में किया जा सकता है।
यह शोध इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध सीएमपी डिग्री कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने किया है। अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जर्नल 3 Biotech (स्प्रिंगर नेचर समूह) में प्रकाशित किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को व्यावहारिक उपयोग में लाने से पहले सुरक्षा और प्रभावशीलता से जुड़े कई अतिरिक्त परीक्षण किए जाएंगे, जिसके बाद ही इसके चिकित्सीय या व्यावसायिक उपयोग पर आगे बढ़ा जाएगा।











