दरभंगा: साइबर अपराधियों ने अधिकारी बनकर एक बुजुर्ग को फोन किया और उन्हें 'डिजिटल अरेस्ट' का डर दिखाकर 35.74 लाख रुपये ठग लिए। ठगी की रकम जाने के बाद पीड़ित ने साइबर पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने मामले में तेजी से कार्रवाई करते हुए बैंकिंग चैनल और लेनदेन की कड़ियों को ट्रैक किया। करीब 6 महीने की कार्रवाई के बाद साइबर पुलिस ने बुजुर्ग की पूरी 35.74 लाख रुपये की रकम वापस करा दी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स विभाग या अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। इसके बाद पीड़ित को वीडियो कॉल पर बने रहने, किसी से संपर्क नहीं करने और कथित जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
दरभंगा के इस मामले में भी साइबर अपराधी ने कथित तौर पर अधिकारी बनकर बुजुर्ग को फोन किया। फोन पर उन्हें बताया गया कि उनका नाम किसी गंभीर मामले से जुड़ा है और उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। इसके बाद अपराधी ने गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें मानसिक दबाव में ले लिया।
पीड़ित को लगातार यह भरोसा दिलाया गया कि वह एक सरकारी जांच का हिस्सा हैं। इसी दौरान साइबर अपराधी ने उनसे बैंक खाते और पैसों से जुड़ी जानकारी हासिल की और कथित जांच के नाम पर रकम ट्रांसफर करने को कहा।
डर और दबाव में बुजुर्ग ने अलग-अलग लेनदेन के माध्यम से कुल 35.74 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। जब उन्हें ठगी का एहसास हुआ तो उन्होंने साइबर पुलिस से संपर्क किया और पूरे मामले की जानकारी दी।
शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने लेनदेन की जांच शुरू की। साइबर ठगी के मामलों में रकम कई बैंक खातों और डिजिटल माध्यमों से तेजी से दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दी जाती है। ऐसे में पुलिस के लिए पैसे को ट्रैक करना और उसे फ्रीज कराना समय के खिलाफ दौड़ जैसा होता है।
इस मामले में पुलिस ने बैंक खातों और ट्रांजैक्शन की जानकारी के आधार पर रकम की आवाजाही का पता लगाया। संबंधित बैंक और वित्तीय संस्थानों से संपर्क कर संदिग्ध खातों में मौजूद राशि को फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू की गई।
करीब छह महीने तक चली कार्रवाई के बाद पुलिस ने पीड़ित को उसकी पूरी 35.74 लाख रुपये की रकम वापस करा दी। साइबर ठगी के मामलों में पूरी रकम की रिकवरी बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, क्योंकि अपराधी रकम को कई खातों में भेजकर उसे निकालने या दूसरे डिजिटल माध्यमों में बदलने की कोशिश करते हैं।
इस मामले ने यह भी दिखाया कि साइबर ठगी की शिकायत जितनी जल्दी दर्ज कराई जाए, रकम वापस मिलने की संभावना उतनी अधिक हो सकती है। पैसे ट्रांसफर होने के तुरंत बाद बैंक और साइबर पुलिस को सूचना देने पर संदिग्ध खातों पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।
'डिजिटल अरेस्ट' साइबर अपराध का ऐसा तरीका है जिसमें अपराधी किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाते हैं कि वह पुलिस या किसी जांच एजेंसी की निगरानी में है। वे पीड़ित को घंटों या कई दिनों तक वीडियो कॉल पर रहने के लिए कहते हैं और दावा करते हैं कि कॉल काटने या किसी अन्य व्यक्ति से बात करने पर गिरफ्तारी हो सकती है।
असल में भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। कोई भी जांच एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए किसी नागरिक को घर में कैद नहीं कर सकती और न ही जांच के नाम पर निजी बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर कराने का अधिकार रखती है।
साइबर अपराधी अक्सर पुलिस अधिकारी की वर्दी, फर्जी दस्तावेज, सरकारी लोगो और वीडियो कॉल का इस्तेमाल करते हैं। इससे पीड़ित को लगता है कि सामने वाला वास्तव में सरकारी अधिकारी है। बुजुर्ग और तकनीकी रूप से कम परिचित लोग ऐसे मामलों में आसानी से मानसिक दबाव में आ सकते हैं।
दरभंगा के मामले में भी अधिकारी बनकर फोन करना इसी तरह की कथित रणनीति का हिस्सा था। अपराधी ने पहले डर पैदा किया और फिर उसी डर का इस्तेमाल कर बड़ी रकम ट्रांसफर कराई।
साइबर विशेषज्ञ लगातार लोगों को सलाह देते हैं कि फोन पर कोई भी व्यक्ति अगर खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है तो तुरंत सतर्क हो जाएं। किसी भी सरकारी जांच में बैंक खाते में पैसे जमा कराने की ऐसी प्रक्रिया नहीं होती।
अगर कोई व्यक्ति वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' करने की धमकी देता है तो कॉल काटकर संबंधित एजेंसी के आधिकारिक नंबर से स्वयं संपर्क करना चाहिए। परिवार के किसी सदस्य या भरोसेमंद व्यक्ति को भी तुरंत इसकी जानकारी देनी चाहिए।
ठगी होने की स्थिति में पीड़ित को इंतजार नहीं करना चाहिए। भारत सरकार की साइबर क्राइम रिपोर्टिंग व्यवस्था के जरिए शिकायत दर्ज की जा सकती है और बैंक को भी तुरंत जानकारी दी जानी चाहिए। जितनी जल्दी शिकायत होगी, रकम को संदिग्ध खाते में फ्रीज कराने की संभावना उतनी बेहतर होगी।
दरभंगा के इस मामले में छह महीने बाद पूरी रकम की वापसी यह बताती है कि साइबर ठगी में पैसा जाने के बाद भी पीड़ित को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। हालांकि हर मामले में पूरी रकम वापस मिले, यह जरूरी नहीं है। इसलिए शुरुआत में सावधानी सबसे महत्वपूर्ण है।
इस घटना के बाद बुजुर्गों और उनके परिवारों को विशेष रूप से जागरूक रहने की जरूरत है। घर के बुजुर्गों को यह समझाना जरूरी है कि फोन पर कोई भी सरकारी अधिकारी बनकर धमकाए, तो तुरंत परिवार के अन्य सदस्यों को बताएं और बिना सत्यापन के कोई पैसा ट्रांसफर न करें।
फिलहाल दरभंगा साइबर पुलिस की कार्रवाई से बुजुर्ग को उनकी पूरी 35.74 लाख रुपये की रकम वापस मिल गई है। वहीं पुलिस अब यह पता लगाने में जुट सकती है कि ठगी के पीछे कौन-कौन लोग थे और रकम किन-किन खातों में भेजी गई थी।
यह घटना साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के बीच एक अहम चेतावनी भी है डर के कारण कोई वित्तीय फैसला न लें। पुलिस या किसी जांच एजेंसी के नाम पर फोन आने पर पहले पहचान और सूचना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें।










