संस्कृत विकसित भारत की राह दिखा सकती है: केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल

तिरुपति में उत्कर्ष महोत्सव 2026 का उद्घाटन करते हुए अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि संस्कृत ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर विकसित भारत में योगदान

तिरुपति में उत्कर्ष महोत्सव 2026 का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि संस्कृत विकसित भारत की राह दिखा सकती है। उन्होंने संस्कृत ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और तकनीक को जोड़कर समाज तथा देश के हित में शोध बढ़ाने पर जोर दिया।

तिरुपति: आँध्रप्रदेश के तिरुपति में आयोजित उत्कर्ष महोत्सव 2026 के उद्घाटन समारोह में केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संस्कृत की प्रासंगिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान को समझकर आधुनिक जरूरतों के साथ जोड़ा जाए तो यह विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (NSU) में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान उन्होंने संस्कृत शिक्षा, शोध और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय की जरूरत बताई।

तिरुपति में उत्कर्ष महोत्सव 2026 का शुभारंभ

राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, तिरुपति में बुधवार को उत्कर्ष महोत्सव 2026 की शुरुआत हुई। दो दिवसीय इस आयोजन का उद्घाटन केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने किया। कार्यक्रम में संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा, वेदांत और प्राच्य विद्या से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए मेघवाल ने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं है, बल्कि इसमें ज्ञान का एक व्यापक भंडार मौजूद है। इस ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में समझने और समाज के हित में इस्तेमाल करने की जरूरत है। उनके मुताबिक, संस्कृत में मौजूद ज्ञान और आधुनिक विषयों के बीच संवाद स्थापित करके देश के विकास के लिए नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।

विकसित भारत के लिए संस्कृत की भूमिका पर जोर

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य में संस्कृत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं से संस्कृत ग्रंथों में उपलब्ध ज्ञान का अध्ययन करने और उसे वर्तमान समय की जरूरतों से जोड़ने का आह्वान किया।

मेघवाल ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि संस्कृत के ज्ञान को केवल पारंपरिक अध्ययन तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बजाय, इसमें मौजूद वैज्ञानिक, दार्शनिक और तकनीकी अवधारणाओं का आधुनिक विषयों के साथ अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे शोध के नए क्षेत्र विकसित हो सकते हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर नए संदर्भ में प्रस्तुत किया जा सकता है।

संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए केंद्र के प्रयास

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयों के माध्यम से संस्कृत भाषा और इससे जुड़े अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न परियोजनाओं पर काम कर रही है। इन पहलों का उद्देश्य संस्कृत शिक्षा को मजबूत करना और अधिक विद्यार्थियों को इस भाषा तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत के अध्ययन को आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान के साथ जोड़े जाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान, विज्ञान और तकनीकी अवधारणाओं का आधुनिक विषयों के साथ संयुक्त शोध उपयोगी परिणाम दे सकता है।

यह दृष्टिकोण संस्कृत को केवल भाषा या साहित्य के अध्ययन तक सीमित रखने के बजाय इसे बहुविषयक शोध के लिए इस्तेमाल करने की संभावना को सामने रखता है।

वेदांत के विद्यार्थियों और शिक्षकों का सम्मान

उत्कर्ष महोत्सव के उद्घाटन समारोह में संस्कृत और भारतीय दर्शन के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल करने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों को सम्मानित भी किया गया।

अद्वैत वेदांत के विद्यार्थी वरदराजन को महापरीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद वेदांत विद्वन्मणि की उपाधि प्रदान की गई। उन्हें सम्मान के साथ नकद पुरस्कार भी दिया गया। उनके शिक्षक और अद्वैत वेदांत विभाग के प्रोफेसर श्रीहरि शिवराम दयागुडे को शास्त्र विद्वन्मणि की उपाधि से सम्मानित किया गया।

विश्वविद्यालय की ओर से प्राच्य विद्या के क्षेत्र में योगदान के लिए KVSS अवधानी और श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर प्रताप को प्राच्य विद्याभूषण पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

इन सम्मानों का उद्देश्य संस्कृत, वेदांत और भारतीय पारंपरिक ज्ञान के अध्ययन तथा संरक्षण में योगदान देने वाले विद्वानों और विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना है।

विश्वविद्यालय की 25 से अधिक पुस्तकों का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर से प्रकाशित 25 से अधिक पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इन पुस्तकों को भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत अध्ययन से जुड़े अकादमिक कार्यों के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुस्तकों के विमोचन के जरिए विश्वविद्यालय ने संस्कृत में हो रहे शोध और प्रकाशन कार्य को भी सामने रखा। ऐसे प्रकाशन विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और संस्कृत के अध्येताओं के लिए अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं।

संस्कृत के व्यापक अध्ययन की अपील

राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जीएसआर कृष्ण मूर्ति ने कार्यक्रम में शामिल होने के लिए केंद्रीय मंत्री का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की अकादमिक गतिविधियों और संस्कृत शिक्षा के विस्तार के लिए संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डाला।

नई दिल्ली स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मुरली मनोहर पाठक ने भी संस्कृत के व्यापक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने संस्कृत को जनसामान्य की भाषा के रूप में समझने और इसके ज्ञान की गहराई तक पहुंचने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया।

उनका कहना था कि संस्कृत के अध्ययन को केवल परीक्षा या डिग्री तक सीमित रखने के बजाय भाषा और उसमें मौजूद ज्ञान की व्यापकता को समझना जरूरी है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा का मेल

उत्कर्ष महोत्सव 2026 में संस्कृत शिक्षा को आधुनिक संदर्भ से जोड़ने का मुद्दा प्रमुख रहा। भारत में प्राचीन ग्रंथों में दर्शन, भाषा विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खगोल, व्याकरण और अन्य क्षेत्रों से जुड़े ज्ञान की लंबी परंपरा रही है। ऐसे में आधुनिक शोध पद्धतियों के जरिए इस सामग्री का अध्ययन किए जाने से नए अकादमिक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं।

मेघवाल का संबोधन इसी व्यापक विचार पर केंद्रित रहा कि संस्कृत में मौजूद ज्ञान को वर्तमान सामाजिक और तकनीकी जरूरतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। यदि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच शोध आधारित संवाद विकसित होता है, तो इससे शिक्षा और अनुसंधान दोनों क्षेत्रों में नई संभावनाएं बन सकती हैं।

विश्वविद्यालय के अधिकारियों और शिक्षकों की मौजूदगी

कार्यक्रम में राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के. वेंकट नारायण राव, अकादमिक डीन प्रोफेसर राजनिकांत शुक्ला और छात्र कल्याण डीन प्रोफेसर दक्षिणामूर्ति शर्मा समेत विश्वविद्यालय के कई अधिकारी, शिक्षक और अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।

कार्यक्रम का समन्वय प्रोफेसर के. गणपति भट्ट ने किया। इसमें अतिरिक्त समन्वयकों डॉ. भरत भूषण रथ और डॉ. नागराजू भट्ट ने भी सहयोग दिया।

दो दिवसीय उत्कर्ष महोत्सव में संस्कृत शिक्षा, भारतीय दर्शन, प्राच्य विद्या और अकादमिक शोध से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होने की उम्मीद है। आयोजन का उद्देश्य संस्कृत के अध्ययन को व्यापक बनाना और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयासों को गति देना है।

संस्कृत अध्ययन को नई दिशा देने की कोशिश

तिरुपति में आयोजित यह कार्यक्रम ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शिक्षा और शोध के साथ जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। संस्कृत के माध्यम से उपलब्ध ऐतिहासिक और दार्शनिक सामग्री का आधुनिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने की संभावनाएं लगातार चर्चा में हैं।

केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल का संदेश भी इसी दिशा में रहा कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके ज्ञान को वर्तमान समय में उपयोगी बनाने के लिए शोध, तकनीक और आधुनिक विषयों के साथ इसका संबंध विकसित करना जरूरी है।

उत्कर्ष महोत्सव 2026 इस प्रयास के लिए एक मंच के रूप में सामने आया है, जहां संस्कृत के विद्वानों, विद्यार्थियों और शिक्षकों को एक साथ लाकर भारतीय ज्ञान परंपरा के भविष्य पर विचार किया जा रहा है। इससे संस्कृत अध्ययन को अकादमिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

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