खजूर की खेती से बढ़ रही किसानों की आय, जानिए पौधा लगाने का सही समय और कमाई का गणित

खजूर की खेती से किसान लाखों की कमाई कर सकते हैं। जानें पौधारोपण का सही समय, उपयुक्त किस्में, उत्पादन और एक हेक्टेयर से होने वाली संभावित आय।

पश्चिमी राजस्थान में खजूर की खेती किसानों के लिए लाभदायक विकल्प बन रही है। खारे पानी और गर्म जलवायु में भी इसकी अच्छी पैदावार होती है। सही देखभाल के साथ एक पौधा सालाना 150 किलोग्राम से अधिक फल दे सकता है।

खजूर की खेती: खजूर की खेती पश्चिमी राजस्थान के किसानों के लिए आय का नया और लाभदायक साधन बनकर उभर रही है। कम पानी, खारी मिट्टी और अधिक गर्मी वाले क्षेत्रों में भी इसकी सफल खेती संभव है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सही किस्म, उचित दूरी और समय पर रोपाई करने से किसान लंबे समय तक बेहतर उत्पादन और अच्छी कमाई हासिल कर सकते हैं।

पश्चिमी राजस्थान में तेजी से बढ़ रहा खजूर की खेती का रुझान

कुछ साल पहले तक खजूर की खेती मुख्य रूप से गुजरात के कच्छ क्षेत्र तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब पश्चिमी राजस्थान के किसान भी इस फसल को बड़े स्तर पर अपना रहे हैं। जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर और आसपास के जिलों में इसकी खेती लगातार बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि खजूर का पौधा खारे पानी और गर्म जलवायु में भी अच्छी तरह विकसित हो जाता है।

जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) ने वर्ष 2015 में गुजरात के आनंद कृषि विश्वविद्यालय से एडीपी-1 किस्म के पौधे लाकर उन पर शोध शुरू किया था। सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद किसानों को इसकी खेती के लिए जागरूक किया गया। आज बड़ी संख्या में किसान संस्थान से तकनीकी जानकारी लेकर व्यावसायिक स्तर पर खजूर की खेती कर रहे हैं।

गर्म जलवायु और खारे पानी में भी देता है बेहतर उत्पादन

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार खजूर उन चुनिंदा फलदार पौधों में शामिल है, जो अधिक तापमान और खारे पानी में भी अच्छी पैदावार देते हैं। इस पौधे की जड़ों को पर्याप्त पानी और ऊपर तेज धूप मिले तो इसका विकास बेहतर होता है। यही कारण है कि पश्चिमी राजस्थान का मौसम इसकी खेती के लिए अनुकूल माना जाता है।

राजस्थान की सरकारी मान्यता प्राप्त नर्सरियों में वरही, मेघजूल, अल्लावी और अन्य उन्नत किस्मों के पौधे उपलब्ध हैं। किसान अपनी जमीन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त किस्म का चयन कर सकते हैं।

एक हेक्टेयर में 156 पौधे, लाखों की कमाई की संभावना

विशेषज्ञों के अनुसार खजूर के पौधों को 8×8 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। इस आधार पर एक हेक्टेयर भूमि में लगभग 156 पौधे लगाए जा सकते हैं। टिश्यू कल्चर से तैयार पौधों की कीमत सामान्यतः 3,500 से 5,000 रुपये प्रति पौधा होती है, जो किस्म के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

पौधे लगाने के लगभग 6 से 8 वर्ष बाद एक पौधा औसतन 120 किलोग्राम तक फल देने लगता है। जैसे-जैसे पौधे की उम्र बढ़ती है, उत्पादन भी बढ़ता जाता है। यदि बाजार में खजूर का औसत मूल्य 100 रुपये प्रति किलोग्राम भी मिले, तो किसान एक हेक्टेयर से 12 से 15 लाख रुपये तक की आय प्राप्त कर सकते हैं।

40 से 50 साल तक देता है उत्पादन

खजूर एक दीर्घायु फलदार पौधा माना जाता है। इसकी खास बात यह है कि यह रोपाई के लगभग तीन वर्ष बाद फल देना शुरू कर देता है। शुरुआती वर्षों में उत्पादन कम रहता है, लेकिन 12 से 14 वर्ष की आयु में एक पौधा 150 से 180 किलोग्राम तक फल दे सकता है।

उचित देखभाल और वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर खजूर का पौधा 40 से 50 वर्ष तक लगातार उत्पादन देता रहता है। यही वजह है कि इसे लंबे समय तक स्थायी आय देने वाली फसल माना जाता है।

जुलाई से सितंबर तक है पौधारोपण का सही समय

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जुलाई से सितंबर के बीच खजूर का पौधा लगाना सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में मिट्टी में पर्याप्त नमी रहती है, जिससे पौधों की जड़ें आसानी से विकसित हो जाती हैं।

खजूर के पौधों में नर (मेल) और मादा (फीमेल) पौधे अलग-अलग होते हैं। बेहतर उत्पादन के लिए प्रत्येक 10 मादा पौधों पर एक नर पौधा लगाने की सलाह दी जाती है। यदि किसान के पास नर पौधा उपलब्ध नहीं है, तो कृत्रिम परागण (Artificial Pollination) के माध्यम से भी अच्छी गुणवत्ता और अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

वैज्ञानिक तरीके से खेती बनेगी अधिक लाभदायक

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खजूर की खेती शुरू करने से पहले किसानों को प्रमाणित नर्सरी से ही पौधे खरीदने चाहिए और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से तकनीकी सलाह जरूर लेनी चाहिए। उचित सिंचाई, समय पर खाद प्रबंधन, परागण और पौधों की नियमित देखभाल से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार किया जा सकता है।

कम पानी में बेहतर उत्पादन, लंबी उत्पादन अवधि और बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए खजूर की खेती पश्चिमी राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के अन्य शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के किसानों के लिए भी आय बढ़ाने का एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है।

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