Democratic Republic of the Congo में इबोला से मौत के बाद गुस्साई भीड़ ने अस्पताल पर हमला कर आइसोलेशन टेंट जला दिए। पुलिस को हालात काबू करने के लिए चेतावनी फायरिंग करनी पड़ी, जबकि संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया।
किंशासा: पूर्वी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DR Congo) में इबोला वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं। इटुरी प्रांत के बु्निया शहर के पास स्थित रवामपारा जनरल अस्पताल में गुस्साई भीड़ ने हमला कर दिया और इबोला मरीजों के लिए बनाए गए आइसोलेशन टेंट में आग लगा दी।
यह हिंसा उस समय शुरू हुई जब एक युवक की मौत के बाद उसके परिजन और समर्थक शव को पारंपरिक तरीके से दफनाने के लिए ले जाना चाहते थे, लेकिन स्वास्थ्य अधिकारियों ने संक्रमण रोकने के लिए ऐसा करने से मना कर दिया।
अस्पताल पर पथराव और आगजनी
स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, भीड़ ने अस्पताल परिसर पर पथराव शुरू कर दिया और बाद में आइसोलेशन वार्ड के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे टेंटों को आग के हवाले कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर हो गई, जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए पुलिस ने चेतावनी स्वरूप हवाई फायरिंग भी की।
घटना के बाद अस्पताल परिसर और चिकित्सा कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
मृतक युवक स्थानीय समुदाय में था लोकप्रिय
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, जिस युवक की मौत हुई थी वह क्षेत्र में काफी लोकप्रिय था और फुटबॉल से जुड़ा हुआ था। उसके परिवार और समुदाय के कई लोगों को विश्वास नहीं था कि उसकी मौत इबोला से हुई है।
मृतक की मां ने दावा किया कि उनके बेटे को टाइफाइड बुखार था, न कि इबोला संक्रमण। इसी अविश्वास ने लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया।
“लोग वायरस को सच नहीं मानते”
स्थानीय राजनीतिक नेता लुक मालेम्बे ने कहा कि क्षेत्र के कई दूरदराज इलाकों में अब भी लोग इबोला वायरस को वास्तविक बीमारी नहीं मानते।
उनके अनुसार, कुछ समुदायों में यह धारणा है कि अस्पताल और अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (NGOs) आर्थिक लाभ के लिए बीमारी का डर फैला रहे हैं।
उन्होंने कहा, “जागरूकता की कमी के कारण लोग यह समझ ही नहीं पा रहे कि यह बीमारी कितनी खतरनाक है।

सुरक्षित दफन प्रक्रिया क्यों जरूरी?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, इबोला से मृत व्यक्ति का शव बेहद संक्रामक होता है। इसलिए संक्रमित शवों को संभालने और दफनाने के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाना जरूरी होता है।
WHO “Safe and Dignified Burials” यानी सुरक्षित और सम्मानजनक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का पालन करने की सलाह देता है, जिसमें प्रशिक्षित टीमें सुरक्षा उपकरण पहनकर शव को संभालती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण फैलने के सबसे बड़े जोखिमों में से एक संक्रमित शव के सीधे संपर्क में आना है।
अस्पताल में इलाज करा रहे मरीजों को लेकर चिंता
हिंसा के दौरान खबरें सामने आईं कि अस्पताल में इलाज करा रहे कुछ मरीज अफरा-तफरी के बीच भाग गए। हालांकि मेडिकल संस्था अलिमा (Alima), जो कथित तौर पर अस्पताल के टेंट संचालित कर रही थी, ने बाद में स्पष्ट किया कि सभी मरीज सुरक्षित हैं और उनका इलाज जारी है।
फिर भी स्वास्थ्य अधिकारियों को आशंका है कि इस तरह की घटनाएं संक्रमण नियंत्रण के प्रयासों को कमजोर कर सकती हैं।
इबोला से मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में इस इबोला प्रकोप को “अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति” (Public Health Emergency of International Concern) घोषित किया है।
हालांकि WHO ने यह भी कहा है कि स्थिति अभी महामारी (Pandemic) स्तर तक नहीं पहुंची है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार:
- 600 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए हैं
- 139 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हुई
- स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक मृतकों की संख्या 150 से अधिक हो सकती है
युगांडा तक पहुंचा संक्रमण
डीआर कांगो से सटे युगांडा में भी इबोला संक्रमण के दो मामले सामने आने के बाद सीमा क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ा दी गई है।
युगांडा सरकार ने अस्थायी रूप से:
- सीमा पार बस सेवाएं
- उड़ानें
- सार्वजनिक परिवहन
- नदी परिवहन
- पर प्रतिबंध लगा दिया है।
दुर्लभ “Bundibugyo” प्रजाति से फैला संक्रमण
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रकोप इबोला वायरस की दुर्लभ “Bundibugyo” प्रजाति के कारण फैल रहा है।
चिंता की बात यह है कि इस प्रजाति के खिलाफ फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। WHO का कहना है कि प्रभावी टीका विकसित करने में कई महीने लग सकते हैं।
विद्रोही नियंत्रण वाले इलाकों में बढ़ी चिंता
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब M23 विद्रोही समूह ने दक्षिण किवू प्रांत में इबोला का पहला मामला मिलने की पुष्टि की।
यह इलाका विद्रोहियों के नियंत्रण में है और वहां स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सीमित है। विशेषज्ञों को डर है कि संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में संक्रमण नियंत्रण बेहद मुश्किल हो सकता है।
हालांकि M23 समूह ने दावा किया है कि वह अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर वायरस को रोकने में सहयोग करेगा।









