धनबाद में भगवान विश्वकर्मा के प्रति रेल कर्मचारियों की आस्था की एक अनोखी तस्वीर सामने आई है। पूर्व मध्य रेलवे के धनबाद कोचिंग डिपो के कैरेज एंड वैगन विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों ने मिलकर अपने वेतन से पैसे बचाए और उसी रकम से परिसर में भगवान विश्वकर्मा का भव्य मंदिर तैयार कराया। खास बात यह है कि मंदिर निर्माण के साथ-साथ कर्मचारियों ने जयपुर से सफेद संगमरमर की भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा भी मंगवाई है। अब तक जहां हर वर्ष विश्वकर्मा पूजा के लिए अस्थायी पंडाल तैयार किया जाता था, वहीं इस साल से रेलकर्मी स्थायी मंदिर में ही भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना करेंगे।
धनबाद कोचिंग डिपो में कैरेज एंड वैगन विभाग के रेल कर्मचारियों के लिए भगवान विश्वकर्मा की पूजा केवल एक वार्षिक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उनके काम और कार्यस्थल से जुड़ी आस्था का भी हिस्सा है। रेलवे में मशीनों, उपकरणों, कोचों और तकनीकी संसाधनों से जुड़े काम करने वाले कर्मचारियों के बीच विश्वकर्मा पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इसी भावना को स्थायी रूप देने के उद्देश्य से कर्मचारियों ने परिसर में मंदिर निर्माण का निर्णय लिया। इसके लिए किसी बाहरी व्यवस्था या बड़े स्तर पर अलग से चंदा जुटाने के बजाय कर्मचारियों ने अपने वेतन से ही धीरे-धीरे रकम बचाने का फैसला किया।
मंदिर निर्माण की योजना वर्ष 2024 में बनाई गई थी। इसके बाद नवंबर 2024 से कैरेज एंड वैगन विभाग के कर्मचारियों ने हर महीने अपने वेतन से थोड़ी-थोड़ी रकम बचाकर जमा करना शुरू किया। कर्मचारियों की ओर से नियमित रूप से की गई इस बचत का उद्देश्य धीरे-धीरे इतना धन जुटाना था कि परिसर में एक स्थायी मंदिर का निर्माण कराया जा सके। करीब दो साल तक इसी तरह पैसे बचाने के बाद मंदिर का निर्माण पूरा कराया गया। यह मंदिर कर्मचारियों की सामूहिक भागीदारी और लंबे समय तक की गई बचत का परिणाम है।
मंदिर तैयार होने के बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा के लिए भी विशेष तैयारी की गई। रेल कर्मचारियों का एक दल जयपुर गया और वहां से सफेद संगमरमर की भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा लेकर धनबाद पहुंचा। प्रतिमा को मंदिर में विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया। जयपुर से लाई गई संगमरमर की प्रतिमा मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। कर्मचारियों ने मंदिर निर्माण के साथ प्रतिमा की स्थापना को भी पूरे धार्मिक उत्साह और श्रद्धा के साथ पूरा किया।
भगवान विश्वकर्मा की इस प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा इसी वर्ष 16 जुलाई को रथ यात्रा के दिन की गई थी। इस अवसर पर कलश यात्रा भी निकाली गई और पूरे विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया गया। कर्मचारियों के लिए यह आयोजन इसलिए भी खास रहा क्योंकि वर्षों से विश्वकर्मा पूजा के दौरान अस्थायी व्यवस्था करने के बजाय अब उनके कार्यस्थल पर भगवान विश्वकर्मा का स्थायी मंदिर तैयार हो चुका है।
धनबाद कोचिंग डिपो के कैरेज एंड वैगन विभाग में विश्वकर्मा पूजा के लिए पहले हर साल पंडाल तैयार करने की जरूरत पड़ती थी। पूजा समाप्त होने के बाद पंडाल की व्यवस्था खत्म हो जाती थी और अगले वर्ष फिर से आयोजन की तैयारी करनी पड़ती थी। अब मंदिर निर्माण के बाद यह व्यवस्था स्थायी हो गई है। 17 सितंबर को होने वाली विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर इसी नवनिर्मित मंदिर में भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना की जाएगी। कर्मचारियों के लिए यह पहला ऐसा अवसर होगा, जब वे स्थायी मंदिर में एक साथ पूजा करेंगे।
इस मंदिर की सबसे खास बात इसकी निर्माण प्रक्रिया है। आमतौर पर किसी बड़े धार्मिक स्थल के निर्माण में किसी संस्था, ट्रस्ट या बाहरी सहयोग की भूमिका होती है, लेकिन यहां रेल कर्मचारियों ने अपनी क्षमता के अनुसार वेतन से रकम बचाकर मंदिर तैयार कराया। हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत ने लगभग दो साल में एक बड़े सामूहिक प्रयास का रूप ले लिया। इससे यह भी पता चलता है कि कर्मचारियों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि उनके सामूहिक सहयोग और कार्यस्थल से जुड़ी भावनाओं का प्रतीक बन गया है।
रेलवे में कार्यरत कर्मचारियों के लिए मशीनों और तकनीकी उपकरणों के साथ रोजाना काम करना पड़ता है। कोचिंग डिपो में ट्रेनों के कोच और उनसे जुड़े विभिन्न तकनीकी कार्यों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में विश्वकर्मा पूजा के दौरान कर्मचारी अपने काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों, मशीनों और उपकरणों की पूजा भी करते हैं। भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, निर्माण और तकनीकी कार्यों से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए कैरेज एंड वैगन विभाग के कर्मचारियों ने अपने कार्यस्थल पर ही भगवान विश्वकर्मा का स्थायी मंदिर बनाकर अपनी आस्था को एक स्थायी रूप दिया है।
मंदिर निर्माण के लिए नवंबर 2024 से शुरू हुई बचत की प्रक्रिया अपने आप में इस पूरे प्रयास की खास कहानी है। कर्मचारियों ने एक साथ बड़ी रकम जुटाने के बजाय अपनी मासिक आय में से छोटी-छोटी राशि अलग रखी। इससे किसी एक कर्मचारी पर आर्थिक भार नहीं पड़ा और सभी अपनी क्षमता के अनुसार इस काम में भागीदार बन सके। लंबे समय तक चलने वाली इसी सामूहिक बचत के बाद मंदिर निर्माण संभव हुआ। करीब दो वर्षों की मेहनत के बाद मंदिर तैयार हुआ और इसके बाद जयपुर से संगमरमर की प्रतिमा लाकर उसे स्थापित किया गया।
16 जुलाई को हुई प्राण प्रतिष्ठा के दौरान भी कर्मचारियों ने धार्मिक परंपराओं का पालन किया। कलश यात्रा के साथ आयोजन किया गया और पूरे विधि-विधान से भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था का रास्ता साफ हो गया। अब विश्वकर्मा पूजा के अलावा भी कर्मचारी इस मंदिर में भगवान विश्वकर्मा के दर्शन और पूजा कर सकेंगे।
इस वर्ष 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा के मौके पर धनबाद कोचिंग डिपो में विशेष उत्साह देखने को मिल सकता है। इसका कारण यह है कि कर्मचारियों ने जिस मंदिर के लिए लगभग दो साल तक अपने वेतन से बचत की, उसी मंदिर में पहली बार विश्वकर्मा पूजा आयोजित होगी। कर्मचारियों के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उनकी मेहनत से तैयार हुए मंदिर के प्रति सम्मान और अपनापन जताने का अवसर भी होगा।
धनबाद कोयलांचल क्षेत्र में रेलवे की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है और यहां बड़ी संख्या में कर्मचारी रेलवे की अलग-अलग इकाइयों में काम करते हैं। कोचिंग डिपो भी रेलवे की कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां ट्रेनों और कोचों से संबंधित कई तरह के कार्य होते हैं। ऐसे कार्यस्थल पर भगवान विश्वकर्मा का मंदिर होना कर्मचारियों की पेशेवर जिम्मेदारियों और धार्मिक आस्था के बीच एक जुड़ाव को भी दर्शाता है।
इस पूरे प्रयास की खासियत यह भी है कि मंदिर निर्माण की शुरुआत किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि विभाग के कर्मचारियों की सामूहिक सोच से हुई। सभी ने अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया और लंबे समय तक पैसे बचाए। इस तरह धीरे-धीरे जमा की गई रकम ने मंदिर का आकार लिया। इसके बाद जयपुर से सफेद संगमरमर की प्रतिमा लाने के लिए कर्मचारियों का दल गया। प्रतिमा धनबाद पहुंचने के बाद मंदिर में उसकी स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया पूरी की गई।
अब धनबाद कोचिंग डिपो परिसर में विश्वकर्मा पूजा के लिए हर वर्ष नया पंडाल बनाने की जरूरत नहीं होगी। स्थायी मंदिर के कारण पूजा का स्थान पहले से उपलब्ध रहेगा। इससे कर्मचारियों को आयोजन की तैयारी में भी सुविधा होगी और मंदिर परिसर में नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियां संचालित की जा सकेंगी। कर्मचारियों की करीब दो साल की बचत से तैयार हुआ यह मंदिर अब उनके लिए स्थायी आस्था केंद्र के रूप में मौजूद रहेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर निर्माण के पीछे कर्मचारियों की अपनी मेहनत और आर्थिक भागीदारी है। वेतन से बचाई गई छोटी-छोटी रकम से शुरू हुआ प्रयास करीब दो साल बाद मंदिर के रूप में सामने आया। जयपुर से लाई गई सफेद संगमरमर की प्रतिमा और जुलाई में हुई प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब मंदिर पूरी तरह पूजा के लिए तैयार है। विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर यहां रेल कर्मचारी एक साथ बाबा विश्वकर्मा की आराधना करेंगे और अपने काम, कार्यस्थल तथा तकनीकी संसाधनों के लिए आशीर्वाद की कामना करेंगे।










