डिंडौरी के आदिवासी पूजा स्थल से मिला 6.5 करोड़ साल पुराना दुर्लभ कोरल जीवाश्म

डिंडौरी के जंगल में बैगा आदिवासियों के पूजा स्थल से करीब 6.5 करोड़ साल पुराना दुर्लभ कोरल जीवाश्म मिला है। जानें इस खोज का महत्व।

मध्य प्रदेश के डिंडौरी के जंगल में बैगा आदिवासियों के पूजा स्थल से करीब 6.5 करोड़ साल पुरानी दुर्लभ कोरल जीवाश्म संरचना की पहचान हुई है। यह खोज डायनासोर युग के अंतिम दौर से जुड़ी बताई जा रही है।

 डिंडौरी: मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले के घने जंगलों में बैगा आदिवासियों द्वारा लंबे समय से पूजे जा रहे एक पत्थर की पहचान दुर्लभ कोरल जीवाश्म के रूप में हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह संरचना करीब 6.5 करोड़ साल पुरानी हो सकती है और पृथ्वी के उस दौर से जुड़ी है, जब डायनासोर का युग अपने अंतिम चरण में था।

बैगा आदिवासी वर्षों से कर रहे थे इस पत्थर की पूजा

डिंडौरी के घने जंगलों में मौजूद इस अनोखी संरचना को बैगा आदिवासी लंबे समय से पवित्र मानते आए हैं। जंगल में बने मंदिर जैसे स्थल पर रखे इस पत्थर की पीढ़ियों से देखभाल और पूजा की जाती रही है। स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ एक पत्थर नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखने वाला स्थल रहा है।

हाल ही में मध्य प्रदेश के पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय निदेशालय की टीम ने क्षेत्र की भू-वैज्ञानिक संपदा के दस्तावेजीकरण के दौरान इस संरचना पर ध्यान दिया। पत्थर की सतह पर दिखाई देने वाली परतदार और कोरल जैसी बनावट ने विशेषज्ञों की दिलचस्पी बढ़ाई। इसके बाद मौके पर जाकर इसकी जांच की गई।

6.5 करोड़ साल पुरानी कोरल जीवाश्म संरचना

जांच के बाद इस संरचना को करीब 65 मिलियन यानी 6.5 करोड़ साल पुराना कोरल जीवाश्म बताया जा रहा है। यह समय पृथ्वी के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण दौर था, जब डायनासोर के प्रभुत्व का अंत हुआ था।

विशेषज्ञों के अनुसार, करीब 6.6 करोड़ साल पहले एक विशाल क्षुद्रग्रह मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप से टकराया था। इस घटना और उस दौर की व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियों का पृथ्वी के पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ा। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके बाद बड़े पैमाने पर जीव-जंतुओं का विलुप्तिकरण हुआ और गैर-एवियन डायनासोर का युग समाप्त हो गया।

डिंडौरी में मिला जीवाश्म इसी व्यापक भू-वैज्ञानिक कालखंड की कहानी को समझने में मदद कर सकता है।

पूजा स्थल की परंपरा हजारों साल पुरानी होने का अनुमान

इस खोज का महत्व सिर्फ जीवाश्म तक सीमित नहीं है। पुरातत्वविद् डॉ. मनोज कुमार कुर्मी के अनुसार, इस पत्थर से जुड़ी पूजा परंपरा 8,000 से 10,000 साल पुरानी हो सकती है।

उनका कहना है कि उस शुरुआती दौर में आज की तरह मंदिरों का निर्माण नहीं होता था। लोग प्रकृति से जुड़ी चीजों, जैसे पत्थर, पेड़, पहाड़ या अन्य प्राकृतिक संरचनाओं को पवित्र मानकर उनकी पूजा करते थे। संभव है कि समय के साथ इसी तरह के किसी प्राकृतिक पूजा स्थल ने बाद में मंदिर जैसा स्वरूप हासिल किया हो।

वैज्ञानिक उपकरण नहीं थे, फिर भी पत्थर को बचाकर रखा

पुरातत्व आयुक्त मदन कुमार नागरोगजे के अनुसार, बैगा समुदाय के पास इस पत्थर की उम्र या उसकी वैज्ञानिक संरचना निर्धारित करने के लिए आधुनिक उपकरण नहीं थे। इसके बावजूद समुदाय ने इस प्राकृतिक संरचना के महत्व को महसूस किया और उसे सुरक्षित रखा।

यह खोज स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच एक दिलचस्प संबंध भी सामने लाती है। बैगा समुदाय की प्रकृति के साथ गहरी जुड़ाव वाली जीवनशैली ने इस संरचना को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में भूमिका निभाई।

बैगा समुदाय और जंगल का गहरा संबंध

डिंडौरी और आसपास के वन क्षेत्रों में बैगा समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। जंगल उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पारंपरिक रूप से उन्हें भोजन, औषधीय संसाधन और रोजगार उपलब्ध कराते रहे हैं।

जंगल से जुड़े पारंपरिक ज्ञान में पेड़-पौधों, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय भूगोल की समझ भी शामिल है। यही कारण है कि डिंडौरी जैसी जगहों पर सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक विरासत कई बार एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं।

डिंडौरी की विरासत को मिलेगा नया मंच

डिंडौरी को मानव-विज्ञान और प्राकृतिक विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। जिले में सामने आने वाली ऐसी दुर्लभ वस्तुओं और संरचनाओं को दस्तावेजीकृत करने की प्रक्रिया जारी है।

जानकारी के अनुसार, डिंडौरी से जुड़ी कुछ चुनिंदा पुरातात्विक और सांस्कृतिक वस्तुओं को जल्द ही भोपाल के स्टेट म्यूजियम की नई गैलरी में प्रदर्शित किया जा सकता है। इससे क्षेत्र की प्राकृतिक, वैज्ञानिक और आदिवासी विरासत को व्यापक स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद है।

Leave a comment