उत्तर बिहार के इतिहास में दरभंगा राज का नाम अक्सर वैभव, दानशीलता और सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में लिया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यही रियासत भारतीय रेलवे के इतिहास में भी एक संवेदनशील, दूरदर्शी और जनहितकारी प्रयोग की मिसाल रही है।
Tirhut Railway History: भारतीय रेल इतिहास में कई ऐसे उल्लेखनीय प्रयोग हुए हैं, जिन्होंने तकनीकी नवाचार के साथ-साथ समाजहित की मिसाल कायम की। ऐसा ही एक अनूठा उदाहरण है दरभंगा राज की तिरहुत रेलवे, जिसने 1873-74 के अकाल में जनता को राहत पहुंचाने के लिए केवल 62 दिनों में रेल लाइन बिछाई। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की दूरदर्शिता और जनहितकारी सोच इस रेल व्यवस्था में साफ झलकती है।
अकाल के समय रेल की स्थापना
वर्ष 1873–74 में उत्तर बिहार भयंकर अकाल की चपेट में था। भूख और संकट के बीच महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने तेजी से राहत पहुंचाने के लिए लिमात्र 62 दिनों में बाजितपुर (बरौनी के निकट) से दरभंगा तक 55 मील लंबी रेल लाइन बिछवा दी। 17 अप्रैल 1874 को पहली ट्रेन दरभंगा पहुंची, जो अनाज से लदी मालगाड़ी थी। यह दर्शाता है कि दरभंगा राज के लिए जनता पहले थी, वैभव बाद में। दरभंगा रेलवे ने सामाजिक और प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए स्टेशन बनाए:
हराही स्टेशन (वर्तमान दरभंगा जंक्शन): आम जनता के लिए
- लहेरियासराय स्टेशन: ब्रिटिश अधिकारियों और प्रशासनिक कार्यों के लिए
- नरगौना टर्मिनल: महाराजा का निजी स्टेशन, जो सीधे नरगौना पैलेस में स्थित था।
नरगौना टर्मिनल को उस समय 'पैलेस ऑन व्हील्स' कहा जाता था। इसमें सोने-चांदी की नक्काशी, मखमली फर्नीचर, शयनकक्ष और रसोई जैसी सुविधाएं थीं। 1934 के भूकंप के बाद भी महात्मा गांधी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस शाही ट्रेन का उपयोग कर चुके थे।

यात्री सुविधा में क्रांतिकारी बदलाव
दरभंगा राज रेलवे ने उस समय थर्ड क्लास डिब्बों में शौचालय जैसी सुविधा दी, जो पूरे देश में उस समय एक अनूठा प्रयोग था। यह दर्शाता है कि महाराजा ने रेल को सिर्फ विलासिता नहीं, बल्कि जनकल्याण का माध्यम बनाया। गंगा नदी को पार करने के लिए तिरहुत रेलवे के पास अपने चार विशाल स्टीमर थे—Eagle, Fence, Flox और Silph। ये स्टीमर सुल्तानपुर घाट से मोकामा–सिमरिया घाट तक रेल वैगनों को ले जाते थे। रेलवे का इंजीनियरिंग कौशल और प्रबंधन क्षमता उस समय की तकनीकी प्रगति की मिसाल थी।
भूकंप और विरासत का नुकसान
1934 के विनाशकारी भूकंप ने तिरहुत रेलवे की रीढ़ तोड़ दी। कई पटरियां क्षतिग्रस्त हो गईं, और पूर्णिया प्रमंडल का दरभंगा से रेलवे संपर्क बाधित हो गया। 1943 में तिरहुत रेलवे का विलय अवध–तिरहुत रेलवे में हुआ, जो बाद में भारतीय रेलवे का हिस्सा बना। नरगौना टर्मिनल और ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ जैसी विरासतों का संरक्षण नहीं हो पाया। 1975 में बरौनी में रखे गए शाही सैलून को आग के हवाले कर दिया गया। 2017 में नरगौना पैलेस परिसर का ऐतिहासिक द्वार तोड़ दिया गया। आज केवल कुछ अवशेष और संरक्षण बोर्ड ही उस गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं।











