DRDA के परियोजना निदेशक ने दिया इस्तीफा: बाबुओं पर वित्तीय अनियमितता और फाइलें रोकने के आरोप; डीएम को भेजा त्यागपत्र

DRDA परियोजना निदेशक ने बाबुओं पर वित्तीय अनियमितता और फाइलें रोकने के आरोप लगाते हुए डीएम को त्यागपत्र भेजा। मामले से विभाग में हलचल बढ़ी।
DRDA के परियोजना निदेशक ने दिया इस्तीफा: बाबुओं पर वित्तीय अनियमितता और फाइलें रोकने के आरोप; डीएम को भेजा त्यागपत्र
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जिला ग्राम्य विकास अभिकरण यानी DRDA के कामकाज को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। परियोजना निदेशक की ओर से इस्तीफा दिए जाने की खबर सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर हलचल बढ़ गई है। परियोजना निदेशक ने अपने त्यागपत्र में कार्यालय के कुछ बाबुओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि कार्यालय में फाइलों को रोका जा रहा था, जरूरी पत्रावलियों को समय पर आगे नहीं बढ़ाया जा रहा था और वित्तीय मामलों में भी अनियमितता की स्थिति बनी हुई थी। परियोजना निदेशक ने इन परिस्थितियों में काम करना मुश्किल बताते हुए अपना त्यागपत्र जिलाधिकारी को भेजा है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि DRDA ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, रोजगार, आजीविका और विकास से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं की निगरानी तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय में जिला स्तर पर DRDA की भूमिका रहती है। ऐसे कार्यालय में यदि फाइलों के निस्तारण में देरी या वित्तीय प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो इसका सीधा असर योजनाओं की गति पर पड़ सकता है।

परियोजना निदेशक की ओर से लगाए गए आरोपों के मुताबिक कार्यालय के कुछ कर्मचारी कामकाज में सहयोग नहीं कर रहे थे। फाइलों को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें रोककर रखने की शिकायत सामने आई। उनका आरोप है कि कई जरूरी मामलों में पत्रावलियां समय से निस्तारित नहीं हो पा रही थीं, जिससे विभागीय कार्य प्रभावित हो रहा था। वित्तीय मामलों को लेकर भी उन्होंने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि परियोजना निदेशक ने सीधे जिलाधिकारी को अपना त्यागपत्र भेजा है। इससे संकेत मिलता है कि उन्होंने कार्यालय के भीतर चल रही परिस्थितियों को गंभीर माना। अब जिलाधिकारी स्तर से त्यागपत्र पर क्या निर्णय लिया जाता है और लगाए गए आरोपों की जांच के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में DRDA कार्यालय में पहले से चल रहे कर्मचारी विवाद को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल ही में सुल्तानपुर में DRDA के परियोजना निदेशक अशोक कुमार सिंह ने दो कर्मचारियों को कार्यालय से कार्यमुक्त कर दिया था। अमर उजाला की 3 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारी मनोज श्रीवास्तव और सहायक लेखाकार अमित श्रीवास्तव को 30 अगस्त को DRDA से कार्यमुक्त किया गया था। परियोजना निदेशक ने जिला विकास अधिकारी को पत्र भेजकर उनके स्थान पर दो कर्मचारियों की मांग की थी।

उस रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना निदेशक ने दोनों कर्मचारियों पर गलत पत्रावली पर हस्ताक्षर कराने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था। आरोप है कि हस्ताक्षर करने से इनकार करने के बाद दोनों कर्मचारी उनके आवास तक पहुंचे और वहां अभद्रता की। इस मामले में परियोजना निदेशक की ओर से कोतवाली नगर में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर भी दी गई थी। बाद में कर्मचारियों को DRDA से कार्यमुक्त करने की कार्रवाई की गई।

परियोजना निदेशक ने उस समय यह भी कहा था कि कर्मचारियों की कमी के कारण DRDA का कामकाज प्रभावित हो रहा है और नए कर्मचारियों की आवश्यकता है। इसके लिए जिला विकास अधिकारी को पत्र भेजकर कर्मचारियों की मांग की गई थी।

अब इस्तीफे की खबर सामने आने के बाद कार्यालय के भीतर के कामकाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर चर्चा और तेज हो गई है। यदि परियोजना निदेशक ने वास्तव में वित्तीय अनियमितताओं और फाइलों को रोकने जैसे आरोप अपने त्यागपत्र में लगाए हैं तो इन आरोपों की जांच कराना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होगा। खासकर वित्तीय अनियमितता से जुड़े किसी भी आरोप की जांच दस्तावेजों, भुगतान रिकॉर्ड, फाइल मूवमेंट और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के बयानों के आधार पर की जा सकती है।

फाइलों के रोके जाने का आरोप भी प्रशासनिक कामकाज की दृष्टि से गंभीर है। किसी सरकारी कार्यालय में एक फाइल कई स्तरों से गुजरती है। संबंधित कर्मचारी दस्तावेजों की जांच करता है, टिप्पणी दर्ज होती है, अधिकारी के स्तर पर निर्णय लिया जाता है और उसके बाद आदेश या भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। किसी स्तर पर अनावश्यक देरी होने पर पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। यदि किसी फाइल को जानबूझकर रोके जाने का आरोप है तो फाइल की डायरी, प्राप्ति और निस्तारण की तारीखों की जांच से स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।

वित्तीय अनियमितता का आरोप इससे भी अधिक संवेदनशील है। सरकारी योजनाओं के लिए जारी धनराशि के इस्तेमाल में नियमों का पालन अनिवार्य होता है। भुगतान से पहले संबंधित स्वीकृति, कार्य की प्रगति, बिल, माप और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की जांच की जाती है। यदि इन प्रक्रियाओं में नियमों की अनदेखी हुई है तो मामला विभागीय जांच के दायरे में आ सकता है। हालांकि केवल आरोप के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी मानना उचित नहीं होगा। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में किसी प्रकार की वित्तीय गड़बड़ी हुई थी या नहीं।

DRDA के कामकाज पर उठे सवालों का असर ग्रामीण विकास योजनाओं पर भी पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लाभार्थी सरकारी योजनाओं के लिए जिला और ब्लॉक स्तर के कार्यालयों पर निर्भर रहते हैं। किसी योजना की फाइल समय पर आगे न बढ़ने पर स्वीकृति, भुगतान या कार्यान्वयन में देरी हो सकती है। इससे आम लाभार्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इस पूरे मामले में प्रशासन के सामने अब दो स्तर पर चुनौती है। पहली चुनौती यह पता लगाने की है कि परियोजना निदेशक ने किन परिस्थितियों में इस्तीफा दिया और उनके आरोप कितने तथ्यात्मक हैं। दूसरी चुनौती कार्यालय के नियमित कामकाज को सुचारु रखना है, ताकि किसी प्रशासनिक विवाद का असर ग्रामीण विकास योजनाओं पर न पड़े।

परियोजना निदेशक और कर्मचारियों के बीच विवाद की स्थिति में उच्च अधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किसी अधिकारी को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से काम लेने में परेशानी हो रही है तो प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप कर विवाद को सुलझाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों की जिम्मेदारियां बदली जा सकती हैं या जांच बैठाई जा सकती है। इसी तरह यदि कर्मचारियों की ओर से अधिकारी पर कोई आरोप है तो उस पक्ष को भी जांच में सुना जाना जरूरी है।

हालिया घटनाक्रम से यह भी सामने आता है कि DRDA कार्यालय में कर्मचारियों की कमी और आपसी विवाद दोनों मुद्दे बने हुए हैं। परियोजना निदेशक ने पहले भी कर्मचारियों की कमी के कारण काम प्रभावित होने की बात कही थी। ऐसे में अब यदि त्यागपत्र के पीछे कार्यालयी विवाद और प्रशासनिक दबाव की बात सामने आती है तो पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी हो जाती है।

जिलाधिकारी को भेजे गए त्यागपत्र पर प्रशासन की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। यदि त्यागपत्र स्वीकार किया जाता है तो DRDA के परियोजना निदेशक का अतिरिक्त या नियमित प्रभार किसी अन्य अधिकारी को दिया जा सकता है। यदि त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया जाता तो परियोजना निदेशक द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच कराकर कार्यालय की स्थिति सामान्य करने की कोशिश की जा सकती है।

वहीं, यदि वित्तीय अनियमितता से जुड़े आरोप जांच में प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है। यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित कर्मचारियों को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा। सरकारी सेवा में किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई साक्ष्यों और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर ही होनी चाहिए।

इस मामले में फाइलों की आवाजाही भी जांच का अहम हिस्सा बन सकती है। किन फाइलों को कब प्राप्त किया गया, किस कर्मचारी के पास कितने समय तक रहीं, उन पर क्या टिप्पणी की गई और उन्हें अधिकारी के पास कब भेजा गया, इन सभी बातों का रिकॉर्ड प्रशासनिक जांच में महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी तरह वित्तीय मामलों में संबंधित भुगतान और स्वीकृति की पत्रावलियों को देखा जा सकता है।

DRDA कार्यालय में चल रहे विवाद का असर केवल अधिकारियों और कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ग्रामीण विकास योजनाओं से जुड़े लाभार्थियों को समय पर सेवाएं मिलना सबसे महत्वपूर्ण है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी अधिकारी-कर्मचारी विवाद या त्यागपत्र के कारण योजनाओं की फाइलें लंबित न हों और जरूरी भुगतान तथा विकास कार्य प्रभावित न हों।

फिलहाल परियोजना निदेशक के त्यागपत्र और उसमें लगाए गए आरोपों को लेकर प्रशासन की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। आरोपों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कार्यालय में वास्तव में वित्तीय अनियमितता हुई थी, फाइलों को जानबूझकर रोका गया था या विवाद की वजह कुछ अन्य प्रशासनिक परिस्थितियां थीं। तब तक किसी भी पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

मामले ने एक बार फिर सरकारी कार्यालयों में पारदर्शी फाइल निस्तारण, वित्तीय अनुशासन और अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत को सामने ला दिया है। अब निगाह जिलाधिकारी की कार्रवाई पर है कि वह त्यागपत्र पर क्या निर्णय लेते हैं और परियोजना निदेशक की ओर से लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच किस स्तर पर कराई जाती है।

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