कर्नाटक में KPSC पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में निलंबित IAS अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार पर मुकदमा चलाने की मंजूरी मिल गई है। जांच में उम्मीदवारों से लाखों रुपये लेकर सवाल उपलब्ध कराने के आरोप हैं।
बेंगलुरु: कर्नाटक में सरकारी नौकरी की एक भर्ती परीक्षा से जुड़ा मामला अब निलंबित IAS अधिकारी के खिलाफ मुकदमे तक पहुंच गया है। कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) की पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक के मामले में ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी गई है। शनिवार, 24 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इसकी अनुमति दी। जांच एजेंसियों का आरोप है कि परीक्षा से पहले कुछ उम्मीदवारों को बेंगलुरु के बाहरी इलाके में एक रिसॉर्ट ले जाकर सवाल और उनके सही जवाब याद करवाए गए थे। इसके बदले प्रत्येक उम्मीदवार से 30 से 40 लाख रुपये तक लिए जाने की बात सामने आई है।
मुख्यमंत्री ने दी मुकदमा चलाने की अनुमति
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सरकार के फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सरकारी भर्ती में भ्रष्टाचार और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को संरक्षण नहीं दिया जाएगा। उनके मुताबिक, नौकरी के लिए मेहनत करने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को बराबर अवसर मिलना चाहिए।
सरकार ने गंगवार के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 218 के तहत अभियोजन की मंजूरी दी है। यह मंजूरी उन कानूनी प्रक्रियाओं का हिस्सा है, जिनके तहत कुछ मामलों में सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति जरूरी होती है।
गंगवार कर्नाटक कैडर के 2016 बैच के IAS अधिकारी हैं। वह जनवरी 2024 से मार्च 2026 तक KPSC में परीक्षा नियंत्रक रहे थे। पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद उन्हें अगस्त में गिरफ्तार किया गया था। सितंबर में राज्य सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में हैं।
400 पदों की भर्ती परीक्षा में कैसे सामने आया मामला?
KPSC ने सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारियों के 400 पदों पर भर्ती के लिए 8 और 9 जनवरी 2026 को परीक्षा आयोजित की थी। इसमें करीब 1,400 उम्मीदवार शामिल हुए थे। बाद में 329 अभ्यर्थियों का चयन किया गया।
जुलाई में चयन सूची सामने आने के बाद परीक्षा के नतीजों पर सवाल उठने लगे। असफल उम्मीदवार डॉ. एस. मंजूनाथ ने आरोप लगाया कि कमजोर शैक्षणिक रिकॉर्ड वाले कुछ अभ्यर्थियों ने परीक्षा में असामान्य रूप से अधिक अंक हासिल किए थे।
मंजूनाथ की शिकायत में 29 उम्मीदवारों का जिक्र था, जिन्हें 600 में से 450 से ज्यादा अंक मिले थे। उन्होंने चयन प्रक्रिया की जांच की मांग की। इसके बाद 24 जुलाई को बेंगलुरु के विधान सौधा थाने में मामला दर्ज हुआ। आगे की जांच कर्नाटक पुलिस के अपराध जांच विभाग यानी CID को सौंपी गई।
परीक्षा से पहले बिचौलिए को मिले थे सवाल-जवाब?
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में परीक्षा के गोपनीय दस्तावेज बाहर पहुंचने का आरोप सामने आया है। एजेंसी के मुताबिक, परीक्षा नियंत्रक रहते हुए गंगवार के पास प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी थी।
जांच एजेंसी का आरोप है कि गंगवार ने इसी पद का दुरुपयोग कर मुख्य बिचौलिए बसवराज कन्नाले को परीक्षा के सवाल और सही जवाब उपलब्ध कराए। रिपोर्टों के अनुसार, 7 जनवरी को एक पेन ड्राइव के जरिए गोपनीय सामग्री कन्नाले तक पहुंचाई गई थी।
कन्नाले पर आरोप है कि उसने पहले से संपर्क में मौजूद कुछ उम्मीदवारों को नौकरी दिलाने का भरोसा दिया था। इन अभ्यर्थियों को परीक्षा शुरू होने से पहले प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत की कार्यवाही में होगी। जांच में सामने आई सामग्री और आरोपियों की कथित भूमिका का न्यायिक परीक्षण अभी बाकी है।
बेंगलुरु के रिसॉर्ट में उम्मीदवारों को रटवाए गए जवाब
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप परीक्षा से ठीक पहले की गई तैयारियों को लेकर है। ED के अनुसार, कन्नाले और उसके साथियों ने पैसे देने वाले कुछ उम्मीदवारों को बेंगलुरु के बाहरी इलाके में स्थित रिसॉर्ट और दूसरे ठहरने के स्थानों पर बुलाया था।
वहां अभ्यर्थियों को कथित तौर पर लीक प्रश्नपत्र और उनके जवाब दिए गए। जांच में दावा किया गया कि कन्नाले के सहयोगियों ने उम्मीदवारों को जवाब याद करवाए, ताकि वे अगले दिन परीक्षा में उन्हें लिख सकें।
इतना ही नहीं, परीक्षा के दिन इन उम्मीदवारों को समय पर केंद्रों तक पहुंचाने के लिए वाहनों की व्यवस्था भी किए जाने का आरोप है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इस पूरी व्यवस्था में कितने उम्मीदवार और दूसरे लोग शामिल थे।
एक उम्मीदवार से 80 लाख रुपये तक मांगने का आरोप
ED की जांच के मुताबिक, पेपर उपलब्ध कराने के बदले शुरुआत में प्रत्येक उम्मीदवार से करीब 80 लाख रुपये मांगे गए थे। बाद में बातचीत करके रकम 30 से 40 लाख रुपये के बीच तय की गई।
आरोप है कि कुछ उम्मीदवारों ने पैसे नकद दिए, जबकि बाकी भुगतान बैंक खातों के जरिए किया गया। जिन लोगों ने पूरी रकम तत्काल नहीं चुकाई, उनसे कथित तौर पर हस्ताक्षर किए हुए खाली चेक और वचनपत्र लिए गए।
जांच एजेंसियों को तलाशी के दौरान ऐसे कुछ दस्तावेज मिलने की जानकारी भी सामने आई है। इनका इस्तेमाल बकाया रकम वसूलने के लिए किए जाने का संदेह है।
मामले में सामने आए ये आंकड़े अलग-अलग उम्मीदवारों से कथित तौर पर मांगी या ली गई रकम से जुड़े हैं। अभी यह साबित नहीं हुआ है कि हर चयनित उम्मीदवार ने पैसे दिए थे या पूरी चयन प्रक्रिया में शामिल सभी लोग इस कथित घोटाले का हिस्सा थे।
₹1.30 करोड़ की रकम IAS अधिकारी तक पहुंचने का दावा
सितंबर में ED की जांच से जुड़े विवरण में दावा किया गया था कि बिचौलिए बसवराज कन्नाले ने उम्मीदवारों से करीब डेढ़ करोड़ रुपये जुटाए थे। एजेंसी के अनुसार, इसमें से लगभग 1.30 करोड़ रुपये गंगवार तक पहुंचाए गए।
पैसों के लेनदेन की जांच में बीदर स्थित ओम लक्ष्मी सौहार्दा सहकारी संस्था से जुड़े एक बैंक खाते का नाम भी सामने आया। आरोप है कि उम्मीदवारों से प्राप्त कुछ रकम इस खाते के जरिए जमा कराई गई थी।
जांच एजेंसी को सोने के आभूषण खरीदने और विमान यात्रा के टिकटों के लिए नकद भुगतान किए जाने के संकेत भी मिले हैं। कुछ लेनदेन दूसरे व्यक्तियों के नाम पर संचालित खातों के जरिए होने का संदेह है।
ED अब इन भुगतानों का स्रोत और अंतिम लाभार्थियों की भूमिका तलाश रही है। बैंक रिकॉर्ड, लेनदेन संबंधी दस्तावेज और बरामद सामग्री इस जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
CID और ED अलग-अलग किन पहलुओं की जांच कर रही हैं?
KPSC भर्ती मामले में दो जांच एजेंसियां सक्रिय हैं। CID की विशेष जांच टीम प्रश्नपत्र बाहर जाने, उम्मीदवारों को अनुचित लाभ मिलने और चयन प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की पड़ताल कर रही है।
वहीं ED संदिग्ध धन के लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग के पहलू की जांच कर रही है। एजेंसी यह पता लगा रही है कि रिश्वत के रूप में कथित तौर पर जुटाई गई रकम कहां गई और उसे किन माध्यमों से खर्च या छिपाया गया।
CID की जांच में कुछ उम्मीदवारों के उत्तरों में असामान्य समानता भी सामने आने की जानकारी मिली थी। जांचकर्ताओं ने करीब 60 से 80 सवाल पहले से उपलब्ध कराए जाने की आशंका जताई थी।
इस दौरान कुछ विशेषज्ञों और परीक्षा मूल्यांकन से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई है। हालांकि किसी व्यक्ति का नाम जांच में सामने आना उसे दोषी साबित नहीं करता।
मुकदमे की मंजूरी से अब क्या बदलेगा?
गंगवार के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी मिलने से जांच एजेंसियों को कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने का रास्ता मिला है। अब संबंधित मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत के सामने आरोप रखे जा सकेंगे।
यहां एक फर्क समझना जरूरी है। सरकार की ओर से मुकदमा चलाने की अनुमति मिलना और अदालत में दोष साबित होना अलग-अलग बातें हैं। अभियोजन की मंजूरी को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता।
आरोपी अधिकारी को भी कानूनी प्रक्रिया के दौरान अपना पक्ष रखने और आरोपों को चुनौती देने का अधिकार है। आगे की कार्रवाई जांच रिपोर्ट, आरोपपत्र और अदालत के फैसलों पर निर्भर करेगी।
भर्ती परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों के लिए क्या मायने?
इस मामले की वजह से उन अभ्यर्थियों के सामने भी सवाल खड़े हुए हैं, जिन्होंने परीक्षा की तैयारी की थी और निष्पक्ष चयन की उम्मीद रखी थी। अगर किसी उम्मीदवार को पहले से प्रश्नपत्र उपलब्ध कराया गया था, तो उससे बाकी प्रतियोगियों के अवसर प्रभावित हो सकते थे।
हालांकि पूरे भर्ती परिणाम पर क्या असर पड़ेगा, इस बारे में कोई नया आधिकारिक फैसला अभी सामने नहीं आया है। परीक्षा रद्द होगी, नए सिरे से आयोजित होगी या केवल संदिग्ध चयन की समीक्षा की जाएगी, इसका फैसला संबंधित अधिकारियों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।








