असदुद्दीन ओवैसी ने 1 नवंबर को दिल्ली में होने वाली INDIA गठबंधन की रैली से दूरी बनाई है। उन्होंने कहा कि SIR के खिलाफ उनकी लड़ाई अलग है। ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं और जामिया विवाद पर भी प्रतिक्रिया दी।
नई दिल्ली: दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को होने वाली INDIA गठबंधन की रैली से AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने खुद को अलग कर लिया है। रविवार, 25 अक्टूबर को रैली के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनका इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि ओवैसी ने साफ किया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ उनका विरोध जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि इस मामले में वह अदालत का रास्ता भी अपना चुके हैं। ओवैसी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के साथ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के प्रदर्शन और शरजील इमाम के मामले पर भी उन्होंने अपनी राय रखी।
इंडिया गठबंधन की रैली पर ओवैसी ने क्या कहा?
दिल्ली में अगले रविवार को कांग्रेस और उसके सहयोगी दल बड़ी रैली करने जा रहे हैं। इसमें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोप और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को प्रमुख मुद्दा बनाया जाएगा। जब ओवैसी से पूछा गया कि क्या वह इस कार्यक्रम में शामिल होंगे, तो उनका जवाब था कि इस रैली से उनका कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने कहा, 'मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है। मेरी लड़ाई SIR के मामले पर अलग है।' ओवैसी के मुताबिक, वह पहले से इस प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और अदालत में भी इस मुद्दे को चुनौती दे रहे हैं। उनकी पार्टी AIMIM विपक्षी INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। ऐसे में ओवैसी ने दिल्ली के इस संयुक्त राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होने के बजाय अपना विरोध अलग तरीके से जारी रखने की बात कही है।
SIR पर कांग्रेस से अलग क्यों है ओवैसी का रास्ता?
ओवैसी ने कहा कि मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान पात्र नागरिकों के नाम हटने की आशंका को वह लंबे समय से उठा रहे हैं। उनके मुताबिक, चुनावी व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं पर सवाल उठाने के लिए किसी खास राजनीतिक गठबंधन में शामिल होना जरूरी नहीं है।
इसी महीने एक अन्य प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ओवैसी ने INDIA गठबंधन के रवैये पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि SIR के विरोध पर किसी एक दल या गठबंधन का अधिकार नहीं है। उनकी पार्टी इस मुद्दे को अदालत, राजनीतिक मंचों और जनता के बीच उठाती रहेगी।
उन्होंने इस प्रक्रिया की तुलना पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने की कोशिश से भी की थी। यह ओवैसी का राजनीतिक आरोप है। चुनाव आयोग SIR को मतदाता सूची की जांच और अद्यतन करने की प्रक्रिया बताता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पर भी उठाए सवाल
ओवैसी केवल SIR तक अपनी आपत्ति सीमित नहीं रखना चाहते। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चुनाव आयुक्तों के चयन की मौजूदा व्यवस्था में सरकार का प्रभाव अधिक है। वह चाहते हैं कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाए।
ओवैसी ने चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए दिए गए कानूनी संरक्षण पर भी आपत्ति जताई। उनके अनुसार, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा होना जरूरी है।
हालांकि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और उनके कानूनी संरक्षण से संबंधित प्रावधान संसद के बनाए कानून के अंतर्गत आते हैं। इन्हें बदलने के लिए विधायी प्रक्रिया या संबंधित न्यायिक फैसले की जरूरत होगी।
1 नवंबर को रामलीला मैदान में क्यों जुटेगा विपक्ष?
कांग्रेस ने नवंबर की शुरुआत में दिल्ली में बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम करने की तैयारी की है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने विपक्षी दलों के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं से इसमें शामिल होने की अपील की है।
रैली का मुख्य मुद्दा SIR और कथित 'वोट चोरी' है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों के कारण योग्य नागरिकों के मतदान अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठा रहा है।
दिल्ली पुलिस ने 1 नवंबर के कार्यक्रम के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया है। पुलिस के मुताबिक, आयोजन स्थल की उपलब्धता 25 अक्टूबर से 3 नवंबर तक सुनिश्चित की गई है। सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर संबंधित एजेंसियां आयोजकों के संपर्क में हैं।
ओवैसी ने भले ही इस रैली से दूरी बनाई है, लेकिन SIR पर उनकी आपत्तियों और कांग्रेस के उठाए सवालों में कुछ समानताएं हैं। फर्क इन मुद्दों पर आंदोलन करने के राजनीतिक तरीके का है।
समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं पर साधा निशाना
दिल्ली की रैली के अलावा ओवैसी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी खुलकर बात की। उन्होंने समाजवादी पार्टी के मुस्लिम नेताओं पर आरोप लगाया कि वे अपने समुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व के बजाय पार्टी नेतृत्व के फैसलों को प्राथमिकता देते हैं।
ओवैसी ने कहा कि समाजवादी पार्टी में मौजूद मुस्लिम नेता समुदाय की अगुवाई करने का दावा नहीं कर सकते, क्योंकि वे सपा की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने अपने पुराने बयान को दोहराते हुए कहा कि मुसलमान अब केवल दूसरे दलों के लिए 'दरी बिछाने' की भूमिका नहीं निभाएंगे। उनका कहना था कि मुस्लिम समुदाय को अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करनी चाहिए और ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहिए जो सीधे जनता के प्रति जवाबदेह हों।
ओवैसी की यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आई है। उनकी पार्टी भी राज्य में संगठन बढ़ाने और अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
इकरा हसन और नाहिद हसन पर क्या बोले ओवैसी?
ओवैसी ने समाजवादी पार्टी से जुड़े इकरा हसन और नाहिद हसन का नाम लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों नेताओं में सार्वजनिक मंच से 'अस्सलामुअलैकुम' कहने तक का साहस नहीं है।
यह बयान ओवैसी की राजनीतिक आलोचना है, किसी नेता की वास्तविक धार्मिक मान्यता या व्यक्तिगत व्यवहार का प्रमाण नहीं। दोनों नेताओं के बारे में इस टिप्पणी पर उनका पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
ओवैसी ने कहा कि लोकतंत्र में उन्हें देश के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार उतारने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। उनका इशारा उन राजनीतिक दलों की तरफ था, जो AIMIM के चुनाव लड़ने से विपक्षी वोटों के बंटने की आशंका जताते हैं।
इससे पहले भी वह कह चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को रोकने के लिए उनकी पार्टी विपक्षी दलों के साथ गठबंधन पर बातचीत करने को तैयार है। हालांकि अभी कोई औपचारिक चुनावी समझौता घोषित नहीं हुआ है।
जामिया और JNU के विवाद पर भी दी प्रतिक्रिया
ओवैसी ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से जुड़े नारेबाजी विवाद पर भी सवाल उठाए।
जामिया परिसर की दीवारों पर कुछ विवादित नारे लिखे मिलने के बाद विश्वविद्यालय में तनाव बढ़ा है। छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर छात्र पहले से प्रदर्शन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने दीवारों पर लिखे नारों की निंदा की है और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने की बात कही है।
ओवैसी ने सवाल किया कि यदि परिसर में आपत्तिजनक नारे लिखे गए हैं, तो प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। उन्होंने कुलपति और रजिस्ट्रार की भूमिका पर सवाल उठाए तथा उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
उन्होंने दोनों अधिकारियों को RSS से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से संबद्ध बताया। हालांकि इस राजनीतिक आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
ओवैसी ने जामिया में छात्रसंघ चुनाव की मांग को जायज बताया। उनका कहना था कि छात्रों की लोकतांत्रिक मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
शरजील इमाम को लेकर न्यायिक प्रक्रिया की बात कही
जामिया विवाद के संदर्भ में शरजील इमाम का नाम भी चर्चा में आया। इस पर ओवैसी ने कहा कि किसी व्यक्ति की विचारधारा से असहमति होना अलग बात है, लेकिन उसके कारण उसे निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया से वंचित नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि किसी मामले में दोष या निर्दोष होने का फैसला अदालत को करना चाहिए। किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचारों को पसंद नहीं करने के आधार पर उसके कानूनी अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।
शरजील इमाम के खिलाफ मामले अदालत में विचाराधीन हैं। ऐसे में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
यूपी की राजनीति और SIR पर ओवैसी का अलग रुख
ओवैसी के ताजा बयानों में दो बातें प्रमुखता से सामने आई हैं। पहली, वह SIR और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर अपना विरोध जारी रखना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए INDIA गठबंधन की रैली में शामिल होना जरूरी नहीं मानते। दूसरी, उत्तर प्रदेश में वह मुस्लिम समुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए समाजवादी पार्टी को चुनौती दे रहे हैं।
हाल के महीनों में AIMIM ने उत्तर प्रदेश में कई राजनीतिक कार्यक्रम किए हैं। ओवैसी का कहना है कि उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने और गठबंधन पर फैसला लेने का उतना ही अधिकार है जितना दूसरे दलों को।










