गुजरात में सीखी सिलाई, गांव लौटकर ₹50 हजार से अपना कारोबार खड़ा किया

बिहार के गया की अस्मिता कुमारी ने गुजरात में सिलाई सीखकर गांव में ₹50 हजार से कारोबार शुरू किया। आज रेडीमेड कपड़ों की दुकान और दूध संग्रह केंद्र भी चलाती हैं।

बिहार के गया जिले की अस्मिता कुमारी ने गुजरात में सिलाई सीखने के बाद अपने गांव में कपड़ों का कारोबार शुरू किया। महज 50 हजार रुपये की पूंजी से शुरू हुआ काम अब रेडीमेड कपड़ों की दुकान और दूध संग्रह केंद्र तक पहुंच चुका है।

Asmita Kumari Success Story: बिहार के गया जिले में शेरघाटी प्रखंड का नवादा गांव इन दिनों अस्मिता कुमारी के काम को लेकर चर्चा में है। कभी रोजगार के लिए पति के साथ गुजरात जाने वाली अस्मिता अब अपने गांव में कपड़ों की सिलाई और बिक्री का काम संभाल रही हैं। उन्होंने 2020 में करीब 50 हजार रुपये लगाकर शर्ट बनाने की छोटी इकाई खोली थी। आज वह कपड़ों के कारोबार के साथ दूध संग्रह केंद्र भी चलाती हैं। उनके काम से गांव की दूसरी महिलाओं को भी कमाई का मौका मिला है।

रोजगार की तलाश में पति के साथ पहुंचीं गुजरात

अस्मिता कुमारी ने स्नातक तक पढ़ाई की है। गांव में रोजगार के पर्याप्त साधन नहीं मिलने पर वर्ष 2017 में वह अपने पति अजित कुमार के साथ गुजरात चली गईं। दोनों ने गांधीधाम-अंजार में काम तलाशा और कलेक्शन इंडिया लिमिटेड से जुड़ गए।

गुजरात में सीखी सिलाई, गांव लौटकर ₹50 हजार से अपना कारोबार खड़ा किया

वहां अस्मिता ने कपड़ों की सिलाई सीखी। धीरे-धीरे उन्हें शर्ट बनाने और कपड़े तैयार करने के अलग-अलग काम समझ में आने लगे। उनके पति भी इसी काम से जुड़े थे। कुछ समय बाद दोनों की मिलाकर महीने की कमाई 30 से 40 हजार रुपये तक पहुंच गई।

गुजरात में काम करते हुए उन्हें कपड़ा कारोबार की जानकारी भी मिली। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने बाद में अपने गांव में काम शुरू करने का फैसला किया।

50 हजार रुपये से शुरू की शर्ट बनाने की फैक्ट्री

सितंबर 2019 में अस्मिता और अजित बिहार लौट आए। यहां उन्होंने नौकरी तलाशने के बजाय सिलाई के अपने अनुभव से कारोबार शुरू करने की योजना बनाई। इसके लिए अस्मिता जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं और ऋण की मदद से पूंजी जुटाई।

करीब 50 हजार रुपये लगाकर उन्होंने 3 फरवरी 2020 को 'पटेल शर्ट मेकर' नाम से कपड़े बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में उनके पास ज्यादा साधन नहीं थे। इसलिए सीमित संसाधनों से ही शर्ट तैयार की जाती थीं।

पहले महीने में उन्होंने 268 शर्ट बनाईं और उन्हें बाजार में बेचा। इससे कारोबार आगे बढ़ाने का रास्ता मिला। हालांकि, शुरुआत के कुछ ही समय बाद ऐसी परेशानी आ गई, जिससे उनका काम लगभग ठप पड़ गया।

कोरोना लॉकडाउन में बंद हुआ काम, फिर शुरू की सिलाई

साल 2020 में कोरोना संक्रमण फैलने के बाद देशभर में लॉकडाउन लग गया। इसका असर अस्मिता के नए कारोबार पर भी पड़ा। कपड़ा और दूसरी जरूरी सामग्री मिलनी मुश्किल हो गई। बाजार बंद होने से तैयार माल बेचने में भी परेशानी हुई।

कारोबार शुरू करने के तुरंत बाद आई इस मुश्किल ने परिवार की आर्थिक स्थिति पर असर डाला। लेकिन हालात सामान्य होने पर अस्मिता और उनके पति ने दोबारा काम शुरू किया।

इस बार उन्होंने केवल शर्ट बनाने तक खुद को सीमित नहीं रखा। स्कूली बच्चों की यूनिफॉर्म तैयार करने का काम भी शुरू किया। धीरे-धीरे सिलाई के लिए जरूरी मशीनें जुटाईं। फिलहाल उनकी इकाई में कपड़ों की कटिंग, सिलाई और प्रेस करने की मशीनें मौजूद हैं।

कपड़ों के साथ दूध संग्रह का काम भी संभाल रहीं

अस्मिता ने अपनी आमदनी के लिए कपड़ों के कारोबार के अलावा दूसरा रास्ता भी अपनाया। वह गांव में रेडीमेड कपड़ों की दुकान चलाने के साथ सुधा दूध संग्रह केंद्र का संचालन कर रही हैं।

इस केंद्र से आसपास के करीब दो दर्जन गांवों के पशुपालक और किसान जुड़े हैं। उन्हें अपना दूध बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर एक माध्यम मिला है।

कपड़े बनाने की इकाई से भी गांव की महिलाओं को फायदा हो रहा है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कुछ महिलाएं शर्ट में काज और बटन लगाने का काम करती हैं। इससे उन्हें घर के खर्च के लिए अतिरिक्त कमाई हो जाती है।

कारोबार बढ़ाने के लिए चाहिए 10 लाख रुपये

अस्मिता अपने कपड़ों के कारोबार को और बड़ा करना चाहती हैं, लेकिन इसके लिए मशीनों और पूंजी की जरूरत है। उनके मुताबिक, काम का विस्तार करने के लिए करीब 10 लाख रुपये चाहिए।

उनके पति अजित कुमार बताते हैं कि शर्ट बनाने का कपड़ा कोलकाता से मंगवाना पड़ता है। वहीं, सिलाई की मशीनें और अन्य सामान गुजरात से खरीदना होता है। बाहर से सामग्री मंगाने के कारण खर्च भी बढ़ जाता है।

काज-बटन और कढ़ाई से जुड़े काम के लिए आधुनिक मशीन खरीदने की योजना है। ऐसी मशीन की कीमत करीब तीन से पांच लाख रुपये बताई गई है। फिलहाल सीमित पूंजी के कारण यह खरीद संभव नहीं हो पाई है।

अब अपना ब्रांड रजिस्टर कराने की तैयारी

अस्मिता अपनी कपड़ा निर्माण इकाई का पंजीकरण कराने और 'पटेल शर्ट मेकर' के लिए ट्रेडमार्क हासिल करने की कोशिश कर रही हैं। उनकी योजना उत्पादन बढ़ाने के साथ गांव की और महिलाओं को काम देने की है।

अस्मिता का सफर गुजरात में मजदूरी करने से शुरू हुआ था। वहां सीखे हुनर को उन्होंने गांव लौटकर रोजगार में बदल दिया। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती कारोबार के लिए पर्याप्त पूंजी जुटाने की है।

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