इस साल जुलाई का मानसून कई मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों से अलग साबित हुआ। जून महीने में देश में करीब 40 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई थी और अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित होने के कारण भारतीय मौसम विभाग (IMD) समेत कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने जुलाई में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई थी।
नई दिल्ली: भारत में इस साल मानसून ने मौसम वैज्ञानिकों और आधुनिक तकनीक दोनों को हैरान कर दिया है। जून महीने में भारी बारिश की कमी और तेजी से विकसित होते अल नीनो के कारण जुलाई में कमजोर मानसून की आशंका जताई गई थी, लेकिन महीने के अंत तक बारिश सामान्य स्तर पर पहुंच गई। इस बदलाव ने एक बार फिर साबित किया है कि भारतीय मानसून की जटिल प्रकृति को समझना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब केवल अल नीनो जैसे वैश्विक जलवायु संकेतकों के आधार पर मानसून का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून के व्यवहार में तेजी से बदलाव आ रहे हैं, जिसके लिए पारंपरिक मौसम विज्ञान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित मॉडल दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
जून में बारिश की भारी कमी, जुलाई ने बदल दी तस्वीर
इस साल जून में देशभर में मानसून कमजोर रहा। भारत में जून के दौरान करीब 99.5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत लगभग 165.4 मिलीमीटर रहता है। यानी जून में वर्षा में करीब 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। यह 1901 के बाद सबसे सूखे जून महीनों में से एक रहा। इसी स्थिति को देखते हुए भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने जुलाई में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई थी। अंतरराष्ट्रीय मौसम संगठनों ने भी अल नीनो के प्रभाव के कारण भारतीय मानसून पर दबाव रहने की चेतावनी दी थी।
हालांकि, जुलाई के दौरान मानसून की गतिविधियों में तेजी आई और देश में बारिश सामान्य श्रेणी तक पहुंच गई। इस बदलाव ने मौसम पूर्वानुमान से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बदल रहा है अल नीनो और मानसून का संबंध
पहले वैज्ञानिकों के बीच यह धारणा मजबूत थी कि अल नीनो की स्थिति भारतीय मानसून को कमजोर कर सकती है। लेकिन हाल के वर्षों में यह संबंध उतना स्पष्ट नहीं रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र और वायुमंडल के तापमान में बदलाव आया है। गर्म वातावरण अधिक नमी जमा कर सकता है, जिसके कारण लंबे समय तक सूखे के बाद अचानक भारी बारिश की घटनाएं देखने को मिलती हैं। यही वजह है कि एक ही मौसम में कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं, जबकि दूसरे इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।

AI मॉडल भी मानसून की जटिलता को नहीं समझ पाए
मौसम पूर्वानुमान में अब AI आधारित तकनीकों का तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन नए शोध बताते हैं कि ये मॉडल भी भारतीय मानसून के सभी पहलुओं को पूरी तरह पकड़ने में सक्षम नहीं हैं। आईआईटी मद्रास, आईआईटी गुवाहाटी और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने "समुद्रऐस" नामक एक अत्याधुनिक AI पृथ्वी प्रणाली मॉडल विकसित किया है। इस मॉडल को करीब 150 वर्षों के वैश्विक जलवायु आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया गया है।
यह मॉडल महासागर और वायुमंडल के बीच होने वाली प्रक्रियाओं का विश्लेषण करके मौसम का अनुमान लगाने की कोशिश करता है। हालांकि, शोध में पाया गया कि यह भारतीय मानसून की वास्तविक परिवर्तनशीलता को पूरी तरह पकड़ नहीं पाया। वैज्ञानिकों के अनुसार, वास्तविक भारतीय मानसून वर्षा में उतार-चढ़ाव लगभग 83.2 मिलीमीटर देखा गया, जबकि AI मॉडल ने इसे करीब 64 मिलीमीटर ही अनुमानित किया। यानी मॉडल ने मानसून की असली विविधता को लगभग 23 प्रतिशत कम आंका।
Google का GraphCast मॉडल भी रहा सीमित
एक अन्य अध्ययन में Google के AI मौसम मॉडल GraphCast की क्षमता का परीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों ने 2021 से 2024 के बीच के मानसून मौसम के आंकड़ों का विश्लेषण किया और AI पूर्वानुमान की तुलना वास्तविक मौसम परिस्थितियों से की। अध्ययन में पाया गया कि GraphCast सामान्य बारिश के पैटर्न को समझने में कुछ हद तक सफल रहा, लेकिन अत्यधिक बारिश की घटनाओं का सही अनुमान लगाने में कमजोर साबित हुआ।
मॉडल कई क्षेत्रों में वास्तविकता से अधिक बारिश का अनुमान लगाता रहा, जबकि भारी वर्षा जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं को कम आंकता पाया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह मॉडल वास्तविक वर्षा परिवर्तनशीलता का केवल सीमित हिस्सा ही समझ सका।













